राजपाल यादव के चेक बाउंस मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, सीजेआई बोले- 'आदेश नहीं माने तो अपील होगी खारिज'
सारांश
मुख्य बातें
बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव की मुसीबतें एक बार फिर गहरी होती दिख रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 6 अक्टूबर 2026 को उनके रवैये पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि आदेश का पालन नहीं हुआ तो उनकी अपील खारिज की जा सकती है। यह मामला 2013 में बाउंस हुए ₹1.05 करोड़ के सात चेकों से जुड़ा है।
सुनवाई में क्या हुआ
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सोमवार को कहा कि अभिनेता को रकम जमा करने के लिए बार-बार अवसर दिए गए, परंतु कोर्ट के आदेशों का पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ। सीजेआई सूर्य कांत ने स्पष्ट किया कि यदि शिकायतकर्ता को रकम वापस मिलने की कोई संभावना न होती, तो अदालत दोषसिद्धि के विरुद्ध दायर अपील को निरस्त करने पर गंभीरता से विचार कर सकती थी।
कोर्ट ने राजपाल यादव को आदेश का अनुपालन करने के लिए मंगलवार तक की अंतिम समय-सीमा दी है। मामले में बुधवार को अगली सुनवाई निर्धारित है।
मामले की पृष्ठभूमि
राजपाल यादव ने 2010 में अपनी फ़िल्म 'अता पता लापता' के निर्माण हेतु मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से करीब ₹5 करोड़ की वित्तीय सहायता ली थी। फ़िल्म अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी और रकम की वापसी को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया।
शिकायतकर्ता कंपनी के अनुसार, 2012 में हुए एक समझौते के तहत राजपाल यादव, उनकी पत्नी राधा यादव और उनकी कंपनी ने ब्याज सहित करीब ₹11 करोड़ लौटाने पर सहमति व्यक्त की थी। तत्पश्चात 2013 में ₹1.05 करोड़ के सात चेक जारी किए गए, जो सभी अनादरित हो गए।
न्यायिक यात्रा
इसके बाद मुरली प्रोजेक्ट्स ने चेक बाउंस के सात पृथक मामले दर्ज कराए। अप्रैल 2018 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने राजपाल यादव को दोषी ठहराते हुए छह महीने की सज़ा सुनाई। मामला क्रमशः सेशंस कोर्ट और फिर दिल्ली उच्च न्यायालय तक पहुँचा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने जुलाई 2026 में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सातों मामलों में तीन-तीन महीने की साधारण कारावास की सज़ा सुनाई।
फरवरी 2026 में भी राजपाल यादव को जेल जाना पड़ा था, जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने बार-बार भुगतान के आश्वासन पूरे न होने पर उनकी सज़ा पर मिली राहत वापस ले ली और सरेंडर का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में ताज़ा घटनाक्रम
राजपाल यादव ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। 8 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सरेंडर से अंतरिम राहत तो दी, परंतु इसके लिए ₹5 करोड़ की रकम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करने की शर्त रखी। 15 सितंबर को अगली सुनवाई में राजपाल यादव की ओर से और समय माँगा गया; कोर्ट ने अंतिम अवसर देते हुए दो सप्ताह में ₹2 करोड़ जमा करने और शेष रकम के भुगतान का ठोस प्रस्ताव देने को कहा। साथ ही सरेंडर से मिली राहत 5 अक्टूबर तक बढ़ाई गई थी।
अब सोमवार की सुनवाई में कोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। गौरतलब है कि यह ऐसी स्थिति है जहाँ अदालत ने बारंबार नरमी बरतने के बावजूद भुगतान की प्रतिबद्धता पूरी नहीं हुई।
आगे क्या होगा
यदि मंगलवार तक आदेश का पालन नहीं हुआ तो सर्वोच्च न्यायालय बुधवार की सुनवाई में अपील खारिज करने पर विचार कर सकता है, जिससे राजपाल यादव को तीन-तीन महीने की सज़ा भुगतनी पड़ सकती है। यह मामला दर्शाता है कि न्यायिक धैर्य की भी एक सीमा होती है।