रविंद्र जैन पुण्यतिथि: जन्मांध संगीतकार जिन्होंने 'रामायण' से 'राम तेरी गंगा मैली' तक रोशन किया हिंदी सिनेमा
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार, गीतकार और गायक रविंद्र जैन की 9 अक्टूबर 2025 को 10वीं पुण्यतिथि है। 9 अक्टूबर 2015 को मुंबई में उनका निधन हुआ था। जन्म से दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने भक्ति, प्रेम और रिश्तों से ओतप्रोत ऐसे गीत रचे जो आज भी करोड़ों लोगों की यादों में बसे हैं — यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
अलीगढ़ से मुंबई तक: संगीत की अटूट यात्रा
28 फरवरी 1944 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जन्मे रविंद्र जैन की आँखों में जन्म से ही रोशनी नहीं थी। बचपन से ही वे मंदिरों में भजन और कविताएँ गाते थे, जिससे परिवार ने उनकी संगीत-प्रतिभा को पहचाना और उसे निखारने में सहयोग किया। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ली।
मुंबई आने से पहले उन्होंने कोलकाता में संगीत सिखाया और रेडियो से भी जुड़े रहे। दृष्टिहीनता को उन्होंने कभी अपनी राह की रुकावट नहीं बनने दिया — यह उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश था।
फिल्मी करियर की शुरुआत और 'सौदागर' से मिली पहचान
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनकी पहली रिलीज फिल्म 'कांच और हीरा' रही, जिसमें उन्होंने मोहम्मद रफी से 'नज़र आती नहीं मंज़िल' गवाया। हालाँकि इस फिल्म से उन्हें विशेष पहचान नहीं मिली।
असली सफलता 1973 में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'सौदागर' से मिली। इस फिल्म में उन्होंने संगीत देने के साथ-साथ सभी गानों के बोल भी स्वयं लिखे — 'तेरा मेरा साथ रहे', 'हर हसीन चीज़ का', 'क्यों लाए सैंया पान' और 'हुस्न है या कोई कयामत है' जैसे गीत आज भी सुने जाते हैं। 'सौदागर' ने उनके करियर के दरवाज़े हमेशा के लिए खोल दिए।
यादगार फिल्में और राजश्री से दीर्घ जुड़ाव
'सौदागर' की सफलता के बाद रविंद्र जैन ने 'चोर मचाए शोर', 'गीत गाता चल', 'चितचोर', 'अँखियों के झरोखों से' और 'नदिया के पार' जैसी फिल्मों में अपनी सुरीली छाप छोड़ी। इन फिल्मों की सादगी और भारतीय शास्त्रीय संगीत की मिठास ने उन्हें एक अलग पहचान दी।
राजश्री प्रोडक्शंस के साथ उनका जुड़ाव 'सौदागर' से लेकर 'विवाह' और 'एक विवाह ऐसा भी' तक दशकों लंबा रहा। उनकी धुनों में भारतीयता और पारिवारिक संवेदनाओं की झलक उनकी विशिष्ट पहचान बनी।
फिल्मफेयर पुरस्कार और 'रामायण' की अमर धुनें
उनके करियर की शीर्ष उपलब्धियों में राज कपूर निर्देशित फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' का संगीत शामिल है, जिसके लिए उन्हें 1986 में फिल्मफेयर बेस्ट म्यूज़िक डायरेक्टर अवॉर्ड से नवाज़ा गया।
फिल्मों से परे रामानंद सागर के बहुचर्चित धारावाहिक 'रामायण' का संगीत तैयार कर उन्होंने अपना नाम भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज करा लिया। इसके अलावा 'श्री कृष्ण' और 'जय हनुमान' जैसे धार्मिक धारावाहिकों के लिए भी उन्होंने संगीत रचा।
पद्म श्री सम्मान और अंतिम विदाई
भारत सरकार ने 2015 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया — यह सम्मान उनके समग्र संगीत योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति थी। गौरतलब है कि पद्म श्री मिलने के उसी वर्ष 9 अक्टूबर 2015 को मुंबई में उनका निधन हो गया।
रविंद्र जैन ने फिल्मी संगीत के साथ-साथ धार्मिक और निजी म्यूज़िक एल्बमों पर भी उल्लेखनीय काम किया। उनका संगीत आने वाली पीढ़ियों को भारतीय लोकजीवन और आस्था की गहराई से परिचित कराता रहेगा।