नाना पाटेकर के निधन पर रजा मुराद भावुक: 'दिल के बादशाह, तबीयत के फकीर थे'
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता रजा मुराद ने 8 अक्टूबर 2026 को दिवंगत अभिनेता नाना पाटेकर के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया और उन्हें एक ऐसे इंसान के रूप में याद किया जो पर्दे पर शेर और दिल से फकीर थे। मुराद ने इंस्टाग्राम पर एक भावुक वीडियो साझा करते हुए कहा कि नाना का जाना हिंदी फिल्म उद्योग के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
मुराद ने क्या कहा
अपने वीडियो संदेश में रजा मुराद ने कहा, 'आज का दिन बेहद दुखद है क्योंकि नाना पाटेकर हमें छोड़कर चले गए। वे कैमरे के सामने और पीछे शेर थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी शेरों की तरह जी और उनकी ज़ुबान कई बार सख्त हो जाती थी, लेकिन दिल बहुत नरम था।' उन्होंने यह भी बताया कि नाना अपनी आय की 90 प्रतिशत रकम ज़रूरतमंदों की मदद में लगा दिया करते थे।
मुराद ने कहा, 'वे दिल के बादशाह और तबीयत के फकीर थे।' उनके शब्दों में नाना का यह परिचय उनकी उदारता और सादगी दोनों को एकसाथ बयान करता था।
अपूरणीय क्षति का एहसास
रजा मुराद ने आगे कहा, 'ये हमारे लिए बहुत बड़ा नुकसान है, जो कभी पूरी नहीं हो पाएगी। उन्होंने अपने हिसाब से ज़िंदगी जी। अपने हिसाब से काम करते थे और वो कभी पैसे के लोभी नहीं रहे।' उन्होंने बताया कि कई लोग करोड़ों रुपये लेकर नाना पाटेकर के पास जाते थे, लेकिन अगर उन्हें स्क्रिप्ट अच्छी नहीं लगती थी, तो वे काम करने से साफ मना कर देते थे।
सादगी और सच्चाई की मिसाल
मुराद ने नाना पाटेकर की जीवनशैली का ज़िक्र करते हुए कहा, 'पजामा-कुर्ता पहनते थे और छोटे से घर में रहते थे। चाहते तो बड़ी बिल्डिंग या बंगला बना लेते, लेकिन दिल से सच्चे थे। उन्हें इतनी शोहरत, इज्जत और दौलत मिली, लेकिन कभी इसका उन पर गलत असर नहीं पड़ा।' यह वर्णन नाना की उस छवि को और पक्का करता है जो दशकों से उनके प्रशंसकों के दिलों में बसी थी।
व्यक्तिगत रिश्ते की याद
रजा मुराद ने बताया कि वे हर साल गणपति उत्सव पर बप्पा के दर्शन करने के लिए नाना पाटेकर के घर जाते थे। उन्होंने कहा, 'इस बार इसलिए नहीं जा पाया क्योंकि उन्होंने बप्पा की मूर्ति पुणे में रखी थी, लेकिन फोन पर बात होती थी।' दोनों के बीच यह वर्षों पुरानी दोस्ती और आपसी सम्मान उनके अंतिम संवाद में भी झलकता था। मुराद ने कहा, 'वे सदा हमारे दिलों में रहेंगे।'
नाना पाटेकर का निधन हिंदी सिनेमा के उस दौर के अंत का प्रतीक है जब अभिनेता अपनी कला और सिद्धांतों को पैसे से ऊपर रखते थे — एक विरासत जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।