शफी इनामदार की खलनायक भूमिका का सफर: जावेद अख्तर के ऑफर से मिली नई पहचान
सारांश
Key Takeaways
- शफी इनामदार ने खलनायक की भूमिका से अपनी पहचान बनाई।
- जावेद अख्तर का ऑफर उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ था।
- उन्होंने विविधता बनाए रखी और विभिन्न भूमिकाएँ निभाईं।
- स्टेज पर उनका अनुभव उन्हें फिल्म में मददगार रहा।
- उनका अभिनय दर्शकों के बीच लोकप्रिय रहा है।
मुंबई, 12 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। शफी इनामदार का नाम सुनते ही दर्शकों के मन में ईमानदार पुलिस अधिकारी और कॉमेडी टाइमिंग वाले किरदार की छवि उभरती है। लेकिन उनके खलनायक किरदार की शुरुआत की कहानी काफी दिलचस्प है। जब जावेद अख्तर ने उन्हें रमेश सिप्पी की फिल्म ‘सागर’ में मुख्य विलेन की भूमिका का प्रस्ताव दिया, तो शफी ने त्वरित सहमति जताई। अभिनेता ने इस निर्णय के पीछे की वजह भी साझा की।
एक साक्षात्कार में, शफी ने कहा कि उन्हें लगा कि ‘अर्धसत्य’ और ‘आज की आवाज’ जैसी फिल्मों में पुलिस अफसर की भूमिकाओं के बाद, यह एक अलग छवि बनाने का सुनहरा अवसर है, इसलिए इसे स्वीकार करना चाहिए। यह प्रस्ताव उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, और उन्होंने दोनों प्रकार की भूमिकाओं को संतुलित करने का विचार किया।
उनकी ईमानदारी और वास्तविक अभिनय ने उन्हें दर्शकों का प्रिय बना दिया। ‘अर्धसत्य’ में उनका इंस्पेक्टर का किरदार इतना पसंद किया गया कि कई फिल्मों में उन्हें उसी तरह की भूमिकाएँ दी गईं, लेकिन शफी ने हमेशा विविधता बनाए रखी। उन्होंने टेलीविजन पर ‘ये जो है जिंदगी’ और ‘मिर्जा गालिब’ में भी काम किया।
शफी इनामदार ने एक साक्षात्कार में अपनी शुरुआत के बारे में बताया कि उनका रुझान बचपन से ही स्टेज की ओर था। कॉलेज के दिनों में साइंस ग्रेजुएट होने के बावजूद, उनका झुकाव स्टेज की ओर बढ़ा। उन्होंने कहा, “पहले इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन फिर सोचा कि अगर इसे प्रोफेशन बनाना है तो पूरी मेहनत करनी होगी।” उनका पहला और सबसे प्रभावशाली माध्यम स्टेज ही था। 1983-84 में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। उनकी पहली फिल्म ‘विजेता’ थी, जिसके निर्देशक गोविंद निहलानी थे। उसी समय निहलानी विजय तेंदुलकर के साथ ‘अर्धसत्य’ की स्क्रिप्ट पर कार्य कर रहे थे। निहलानी ने शफी को एक दिलचस्प और प्रभावशाली भूमिका की पेशकश की, एक सीनियर ऑफिसर का बड़ा भाई। शफी को स्क्रिप्ट बहुत पसंद आई। यह एक ऑफबीट और आर्ट फिल्म थी, जिसमें ओम पुरी और स्मिता पाटिल मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म ने वाणिज्यिक और कलात्मक दोनों स्तरों पर सफलता प्राप्त की। इसके बाद, बी.आर. चोपड़ा की ‘आज की आवाज’ में उन्होंने एक अलग प्रकार के इंस्पेक्टर का किरदार निभाया और फिर रमेश सिप्पी की ‘सागर’ में मुख्य विलेन की भूमिका मिली।
शफी ने बताया कि शबाना आजमी ने उन्हें बताया था कि एक बड़ी फिल्म में विलेन का रोल है। जावेद अख्तर ने प्रस्ताव दिया और शफी ने तुरंत हां कर दी। ‘सागर’ में उन्होंने ऋषि कपूर, कमल हासन और डिंपल कपाड़िया के साथ काम किया। यह उनके लिए नई छवि बनाने का अवसर था।
इनामदार का मानना है कि एक्टिंग हर माध्यम में समान होती है, बस उसे अपनाने की आवश्यकता होती है। शफी ने स्टेज पर लगभग 14-15 साल काम किया। वे पृथ्वी थिएटर्स और आईपीटीए से जुड़े रहे। उन्होंने कहा कि स्टेज लाइव आर्ट है, जहां दर्शक तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। फिल्मों में फुटेज सीमित होती है, इसलिए हर लाइन और एक्सप्रेशन सटीक होना आवश्यक है। टीवी में अधिक फुटेज मिलने के कारण उन्हें वहाँ अधिक सहजता महसूस होती है, लेकिन उनके लिए सबसे पसंदीदा माध्यम थिएटर ही रहा। फिल्मों में उन्होंने कई प्रकार की भूमिकाएँ निभाईं, जैसे पुलिस इंस्पेक्टर, विलेन, कॉमेडी, और पारिवारिक सदस्य आदि।
उन्होंने बताया कि ‘अर्धसत्य’ में पहली बार खुद को स्क्रीन पर देखकर जोश और खुशी का अनुभव हुआ। ट्रायल शो में उन्होंने ज्यादातर खुद को ही देखा, तो पंडित सत्यदेव दुबे ने कहा कि बाकी कलाकारों को भी देखो। शफी ने कहा कि पहली फिल्म में गोविंद निहलानी के साथ काम करने का अनुभव अद्वितीय था।