विनय पाठक: MBA टॉपर से BFA तक का सफर, 4 साल पिता से छुपाया करियर का सबसे बड़ा राज
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के भोजपुर जिले के एक अनुशासित पुलिस अधिकारी के बेटे विनय पाठक की जीवन-यात्रा किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं है। 1990 के दशक की शुरुआत में MBA की पढ़ाई के दौरान कक्षा के शीर्ष 10 मेधावियों में शुमार यह छात्र एक दिन कैंपस थियेटर में पीटर शेफर का नाटक 'ऐकव्स' देखने के बाद इतना बदल गया कि उसने चुपचाप बैचलर ऑफ फाइन आर्ट्स (BFA) में दाखिला ले लिया — और यह राज पूरे 4 साल तक परिवार से छुपाए रखा।
थियेटर ने बदल दी जिंदगी की दिशा
रामधारी सिंह दिनकर की 'रश्मिरथी' और हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' की पंक्तियाँ कंठस्थ रखने वाले विनय के भीतर कलाकार पहले से जी रहा था। लेकिन कैंपस में 'ऐकव्स' देखने के बाद उन्होंने बिना घर को सूचित किए MBA छोड़कर BFA में प्रवेश ले लिया। यह निर्णय उनके जीवन का सबसे बड़ा और सबसे गुप्त मोड़ साबित हुआ।
दीक्षांत समारोह से महज कुछ दिन पहले उन्होंने अपने पिता सच्चिदानंद पाठक — जो बिहार पुलिस में पुलिस उपाधीक्षक के पद पर कार्यरत थे — को यह सच बताया। उल्लेखनीय है कि एक सख्त पुलिस अधिकारी होने के बावजूद पिता ने बेटे की कलात्मक रुचि का पूर्ण समर्थन किया।
बचपन और शिक्षा: रांची से इलाहाबाद तक
12 जुलाई 1968 को बिहार के भोजपुर जिले के बिहिया में जन्मे विनय पाठक का पालन-पोषण परंपरागत और अनुशासित परिवेश में हुआ। उनकी माता किशोरी पाठक गृहिणी थीं और बड़े भाई शशि शेखर पाठक प्राध्यापक बने। पिता के विभागीय तबादलों के चलते बचपन रांची और धनबाद में बीता।
प्रारंभिक शिक्षा रांची के एक बोर्डिंग स्कूल में हुई। इसके बाद सेंट कोलंबा कॉलेज, हजारीबाग और फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेज़ी ऑनर्स की डिग्री हासिल की। यह वही पृष्ठभूमि थी जिसने उनके भीतर साहित्य और मंच के प्रति गहरी संवेदनशीलता जगाई।
मुंबई में संघर्ष और पहचान
थियेटर गुरु डॉ. फारले रिचमंड की सलाह पर 1995 में विनय ने भारतीय रंगमंच की राह पकड़ी। इसी दौरान विज्ञापन फिल्मों की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात सोनिका सहाय से हुई, जिनसे बाद में उन्होंने विवाह किया।
1990 के दशक के उत्तरार्ध में मुंबई आने के बाद उन्हें कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा। विज्ञापनों और टेलीविजन से शुरुआत करते हुए 1998 में धारावाहिक 'हिप हिप हुर्रे' में 'विन्नी सर' के किरदार ने उन्हें घर-घर पहचान दिलाई। रणवीर शौरी के साथ 'रणवीर, विनय और कौन?' और 'द ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो' ने उनकी हास्य प्रतिभा को और धार दी।
फिल्मों में बहुआयामी पहचान
सिनेमाई पर्दे पर 2006 में 'खोसला का घोसला' के आसिफ इकबाल और 2007 में 'भेजा फ्राई' के सीधे-सादे टैक्स इंस्पेक्टर 'भारत भूषण' के किरदारों ने उन्हें स्टारडम की ऊँचाइयों पर पहुँचाया। विनय पाठक ने कभी खुद को किसी एक शैली में नहीं बाँधा।
'जॉनी गद्दार' में नकारात्मक भूमिका प्रकाश, 'रब ने बना दी जोड़ी' में विश्वस्त दोस्त बॉबी, और 'गौर हरि दास्तान' में अपनी पहचान के लिए संघर्ष करते वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी — हर किरदार में उन्होंने चरित्र की भीतरी संवेदनशीलता को जीवंत रखा। सुधीर मिश्रा की 'खोया खोया चांद' में उनके अभिनय को विशेष सराहना मिली। उनका यह सफर इस बात का प्रमाण है कि जब जुनून सच्चा हो, तो कोई भी मोड़ गलत नहीं होता।