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रेशमा की पुण्यतिथि: 'लंबी जुदाई' से अमर हुई वो आवाज़ जिसने दो मुल्कों के दिल जोड़े

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रेशमा की पुण्यतिथि: 'लंबी जुदाई' से अमर हुई वो आवाज़ जिसने दो मुल्कों के दिल जोड़े

सारांश

एक बंजारे परिवार में जन्मी, बिना किसी संगीत की तालीम के मज़ारों पर गाती रेशमा ने 'लंबी जुदाई' से दो देशों के करोड़ों दिल जीते। उनकी पुण्यतिथि पर याद करिए वह किस्सा — जब एक मटके की थाप पर ज़मीन पर बैठकर गाई गई एक आवाज़ हमेशा के लिए अमर हो गई।

मुख्य बातें

रेशमा का जन्म 1 जनवरी 1947 को राजस्थान के बीकानेर के निकट लोहा गाँव में एक बंजारा परिवार में हुआ था।
विभाजन के बाद परिवार कराची चला गया; रेशमा ने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली।
1968 में रेडियो पाकिस्तान के लिए 'लाल मेरी पत रखियो…' गाकर उन्होंने सूफ़ी गायिका के रूप में पहचान बनाई।
निर्देशक सुभाष घई की फ़िल्म 'हीरो' (1983) के लिए गाया 'लंबी जुदाई' उनकी अमर पहचान बना।
गाने की रिकॉर्डिंग में रेशमा ने मटके की थाप पर ज़मीन पर बैठकर गाया; शब्दों को लेकर संगीतकार प्यारेलाल से मतभेद हुआ।
3 नवंबर 2013 को गले के कैंसर से जूझते हुए रेशमा का निधन हुआ।

लोक गायिका रेशमा की आवाज़ उन विरली आवाज़ों में से थी जो सरहदों को नहीं मानतीं। 3 नवंबर 2013 को दुनिया को अलविदा कह गईं रेशमा की पुण्यतिथि पर आज भी करोड़ों भारतीय और पाकिस्तानी उन्हें उसी भावना से याद करते हैं, जिस भावना से उन्होंने 1983 में फ़िल्म 'हीरो' के गाने 'लंबी जुदाई' को गाया था। उनकी आवाज़ में मिट्टी की सोंधी खुशबू, दर्द और एक अनोखी रूहानियत थी जो श्रोता को भीतर तक छू जाती थी।

बंजारे परिवार से रेडियो की दुनिया तक

रेशमा का जन्म 1 जनवरी 1947 को राजस्थान के बीकानेर के निकट लोहा गाँव में एक बंजारा परिवार में हुआ था। भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय वे मात्र एक महीने की थीं जब उनका परिवार कराची जा बसा। संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा न लेने के बावजूद रेशमा ने बचपन से ही मज़ारों पर सूफ़ी गीत गाना शुरू कर दिया था। उनकी आवाज़ में ऐसा जादू था कि राहगीर रुककर सुनने लगते।

बड़ा मोड़ तब आया जब महज़ 12 वर्ष की उम्र में पाकिस्तानी रेडियो और टेलीविज़न के प्रोड्यूसर सलीम गिलानी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें एक व्यापक मंच दिया। 1968 में उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के लिए 'लाल मेरी पत रखियो…' गाया, जो एक सूफ़ी क्लासिक बन गया और रेशमा को पाकिस्तान में घर-घर पहचान दिलाई। इसके बाद उनकी लोकप्रियता भारत तक भी फैल गई।

'लंबी जुदाई' की अनोखी रिकॉर्डिंग का किस्सा

1982 में निर्देशक सुभाष घई ने राज कपूर की एक पार्टी में पहली बार रेशमा को गाते सुना। कहा जाता है कि उनकी आवाज़ सुनकर घई इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत अपनी अगली फ़िल्म 'हीरो' के लिए उन्हें साइन करने का फ़ैसला कर लिया। रेशमा शुरू में स्टूडियो में गाने को तैयार नहीं थीं — उनकी प्राथमिकता खुले माहौल की थी। घई ने उन्हें आश्वस्त किया कि रिकॉर्डिंग के दौरान उनकी सहजता और पसंद का पूरा ध्यान रखा जाएगा।

रिकॉर्डिंग का किस्सा भी उतना ही दिलचस्प है। रेशमा ने संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से अनुरोध किया कि गाने में बहुत कम साज़ रहें। उन्होंने एक मटका मँगवाया और ज़मीन पर बैठकर उसकी थाप पर गाना शुरू किया। गाने के बोलों में एक शब्द — 'बनाई' की जगह वे बार-बार 'गिराई' गाती रहीं। प्यारेलाल ने कई बार सुधार की कोशिश की, लेकिन रेशमा नहीं बदलीं, जिससे नाराज़ होकर वे स्टूडियो से बाहर चले गए। लक्ष्मीकांत ने रेशमा के जज़्बे को समझा और गाना उसी स्वाभाविक अंदाज़ में रिकॉर्ड करने का फ़ैसला किया। रेशमा ने सादगी से स्वीकार किया कि औपचारिक पढ़ाई न होने के कारण शब्दों में चूक हो जाती है।

दो देशों का साझा संगीत-विरासत

'लंबी जुदाई' के रिलीज़ होते ही यह गाना भारत और पाकिस्तान दोनों में एक साथ अमर हो गया। यह ऐसे समय में आया जब दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान सीमित था, फिर भी रेशमा की आवाज़ ने वह दूरी पाट दी जो राजनीति नहीं पाट सकी। गौरतलब है कि रेशमा ने अपने पूरे करियर में भारत और पाकिस्तान दोनों के संगीत प्रेमियों के दिलों में जगह बनाई — बिना किसी विवाद के, बिना किसी राजनीतिक बयानबाज़ी के।

उनकी गायकी में दिखावा नहीं था। लोक और सूफ़ी परंपरा से निकली उनकी आवाज़ ने यह साबित किया कि सच्चा कलाकार सिर्फ़ एक देश का नहीं होता।

आखिरी साल और विदाई

रेशमा ने अपनी गायकी से ख्याति तो अर्जित की, लेकिन जीवन के अंतिम वर्ष उनके लिए कठिन रहे। वे गले के कैंसर से पीड़ित थीं और परिवार आर्थिक संकट से भी जूझ रहा था। 3 नवंबर 2013 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। उनकी मृत्यु पर भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के संगीत जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

आज, उनकी पुण्यतिथि पर, 'लंबी जुदाई' की वह धुन फिर से हवाओं में गूँजती है — और याद दिलाती है कि कुछ आवाज़ें मरती नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसकी ज़िंदगी के आखिरी साल गले के कैंसर और आर्थिक तंगी में बीते — जो इस बात की याद दिलाता है कि हम अपने कलाकारों की कितनी कम कद्र करते हैं जब वे ज़िंदा होते हैं। 'लंबी जुदाई' की रिकॉर्डिंग का वह प्रसंग — जहाँ एक अनपढ़ गायिका ने प्रशिक्षित संगीतकार को चुनौती दी और जीती — यह बताता है कि सच्ची कला को नियमों की ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ आत्मा की।
RashtraPress
2 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रेशमा कौन थीं और वे किस देश की गायिका थीं?
रेशमा एक पाकिस्तानी लोक और सूफ़ी गायिका थीं, जिनका जन्म भारत के राजस्थान के बीकानेर के निकट हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया और वे कराची में बस गईं। उन्होंने अपनी आवाज़ से भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में अपार लोकप्रियता हासिल की।
'लंबी जुदाई' गाना किस फ़िल्म का है और रेशमा को यह कैसे मिला?
'लंबी जुदाई' 1983 में निर्देशक सुभाष घई की फ़िल्म 'हीरो' का गाना है। कहा जाता है कि घई ने 1982 में राज कपूर की एक पार्टी में पहली बार रेशमा को गाते सुना और तत्काल उनसे यह गाना गवाने का फ़ैसला किया।
'लंबी जुदाई' की रिकॉर्डिंग के दौरान क्या हुआ था?
रिकॉर्डिंग के दौरान रेशमा ने एक मटका मँगवाया और ज़मीन पर बैठकर उसकी थाप पर गाया। गाने के एक शब्द 'बनाई' की जगह वे 'गिराई' गाती रहीं, जिससे संगीतकार प्यारेलाल नाराज़ होकर स्टूडियो से चले गए। लक्ष्मीकांत ने रेशमा का पक्ष समझा और गाना उसी स्वाभाविक अंदाज़ में रिकॉर्ड करवाया।
रेशमा का निधन कब और किस कारण हुआ?
रेशमा का निधन 3 नवंबर 2013 को हुआ। वे गले के कैंसर से पीड़ित थीं और जीवन के अंतिम वर्षों में परिवार आर्थिक कठिनाइयों से भी जूझ रहा था।
रेशमा ने संगीत में अपनी पहचान कैसे बनाई?
रेशमा ने कोई औपचारिक संगीत प्रशिक्षण नहीं लिया था। उन्होंने बचपन से मज़ारों पर सूफ़ी गीत गाए। 12 वर्ष की उम्र में प्रोड्यूसर सलीम गिलानी ने उनकी प्रतिभा पहचानी और 1968 में रेडियो पाकिस्तान के लिए 'लाल मेरी पत रखियो…' गाने के बाद वे सूफ़ी गायिका के रूप में स्थापित हो गईं।
राष्ट्र प्रेस
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