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एआरएफआईडी से पीड़ित बच्चों के इलाज में सफलता, स्टैनफोर्ड मेडिसिन के रैंडमाइज्ड ट्रायल में दोनों थेरेपी कारगर

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एआरएफआईडी से पीड़ित बच्चों के इलाज में सफलता, स्टैनफोर्ड मेडिसिन के रैंडमाइज्ड ट्रायल में दोनों थेरेपी कारगर

सारांश

एआरएफआईडी को अब तक 'नखरे' कहकर टाला जाता रहा — स्टैनफोर्ड के पहले रैंडमाइज्ड ट्रायल ने साबित किया कि यह एक वास्तविक विकार है और इसका इलाज संभव है। 98 बच्चों पर परखी गई दोनों थेरेपी कारगर रहीं, फैमिली-बेस्ड थेरेपी में वज़न और स्वास्थ्य सुधार सबसे तेज़ रहा।

मुख्य बातें

स्टैनफोर्ड मेडिसिन ने पहली बार रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल के ज़रिए एआरएफआईडी के उपचार का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया।
अध्ययन 6 से 12 वर्ष की आयु के 98 बच्चों पर किया गया; नतीजे 'जर्नल ऑफ द अमेरिकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री' में प्रकाशित।
फैमिली-बेस्ड थेरेपी और इंडिविजुअल मोटिवेशनल थेरेपी — दोनों ऑनलाइन , 4 महीने में 14 सेशन — दोनों में लक्षणों में सुधार देखा गया।
फैमिली-बेस्ड थेरेपी में बच्चों का वज़न अधिक तेज़ी से बढ़ा और स्वास्थ्य में स्पष्ट सुधार हुआ।
एआरएफआईडी एंग्जायटी , एडीएचडी और ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में अधिक देखा जाता है।
प्रमुख शोधकर्ता जेम्स लॉक के अनुसार यह अध्ययन साक्ष्य-आधारित उपचार की दिशा में पहला ठोस कदम है।

स्टैनफोर्ड मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने एआरएफआईडी (अवायडेंट रेस्ट्रिक्टिव फ़ूड इनटेक डिसऑर्डर) के उपचार में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है — यह पहली बार है जब इस खान-पान विकार के इलाज का मूल्यांकन रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल के ज़रिए किया गया है। 6 से 12 वर्ष की आयु के 98 बच्चों पर किए गए इस अध्ययन के नतीजे 'जर्नल ऑफ द अमेरिकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री' में प्रकाशित हुए हैं। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि सही थेरेपी और परिवार के सहयोग से बच्चों की खाने की आदतों में बड़ा बदलाव संभव है।

एआरएफआईडी क्या है और यह कितना गंभीर है

एआरएफआईडी को अक्सर 'पिकी ईटिंग' यानी चुन-चुनकर खाने की सामान्य आदत समझ लिया जाता है, लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार यह एक वास्तविक मानसिक और शारीरिक विकार है। इससे पीड़ित बच्चे भोजन में बेहद कम रुचि दिखाते हैं या खाने से डर महसूस करते हैं। समय पर उपचार न मिलने पर बच्चों में पोषण की कमी, कमज़ोरी और शारीरिक विकास से जुड़ी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि यह विकार उन बच्चों में अधिक देखा जाता है जिन्हें एंग्जायटी, एडीएचडी या ऑटिज्म जैसी सहवर्ती स्थितियाँ होती हैं। कई मामलों में बच्चे किसी पूर्व के बुरे अनुभव — जैसे गला अटकने की घटना — के कारण भी खाने से परहेज करने लगते हैं।

अध्ययन में किन दो थेरेपी का परीक्षण हुआ

शोध में दो उपचार पद्धतियों की तुलना की गई। पहली, फैमिली-बेस्ड थेरेपी में माता-पिता को केंद्रीय भूमिका दी गई — उन्हें यह सिखाया गया कि बच्चे की खाने की आदतें धीरे-धीरे कैसे बदली जाएँ। पूरा परिवार — माता-पिता, भाई-बहन और थेरेपिस्ट — एक साथ सेशन में भाग लेते थे। परिवार को यह समझाना भी इस थेरेपी का अहम हिस्सा था कि बच्चे का व्यवहार जानबूझकर नहीं, बल्कि एक मेडिकल कंडीशन के कारण है।

दूसरी, इंडिविजुअल मोटिवेशनल थेरेपी में बच्चे को स्वयं प्रेरित किया जाता था। इसमें गेम्स, गतिविधियाँ और कल्पना-आधारित अभ्यास — जैसे काल्पनिक रेस्टोरेंट बनाना या विभिन्न देशों के व्यंजनों के बारे में सोचना — शामिल थे, ताकि खाने के प्रति बच्चे की जिज्ञासा और रुचि बढ़े। दोनों थेरेपी ऑनलाइन माध्यम से दी गईं और प्रत्येक बच्चे को चार महीनों में 14 सेशन मिले।

शोध के नतीजे क्या रहे

अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता जेम्स लॉक ने कहा कि यह पहली बार है जब एआरएफआईडी के उपचार का वैज्ञानिक तरीके से परीक्षण किया गया है। उनके अनुसार, अब ऐसा डेटा उपलब्ध है जिससे खासकर उस आयु वर्ग के बच्चों का बेहतर इलाज किया जा सकता है जिसमें यह समस्या सबसे अधिक पाई जाती है।

नतीजों के अनुसार, फैमिली-बेस्ड थेरेपी लेने वाले बच्चों का वज़न अधिक तेज़ी से बढ़ा और उनके स्वास्थ्य में स्पष्ट सुधार देखा गया। हालाँकि, दोनों ही समूहों में एआरएफआईडी के लक्षणों में उल्लेखनीय कमी आई — अर्थात दोनों उपचार पद्धतियाँ काफी हद तक प्रभावी पाई गईं।

एक बच्ची का अनुभव

अध्ययन में शामिल एक बच्ची ने बताया कि पहले वह बेहद सीमित चीज़ें ही खाती थी। थेरेपी के बाद धीरे-धीरे उसने नए खाद्य पदार्थ आज़माने शुरू किए। जिन चीज़ों से वह पहले परहेज करती थी — जैसे अंडा, एवोकाडो, दही और फल — अब वह उन्हें पसंद करने लगी है।

आगे क्या होगा

यह शोध इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण आधार तैयार करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एआरएफआईडी को 'नखरे' समझकर नज़रअंदाज़ करना बच्चे के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। यह अध्ययन भविष्य में और बड़े नैदानिक परीक्षणों और साक्ष्य-आधारित उपचार प्रोटोकॉल विकसित करने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

98 बच्चों का नमूना अपेक्षाकृत छोटा है और अध्ययन पश्चिमी संदर्भ में हुआ है, इसलिए भारतीय बच्चों पर इसकी प्रयोज्यता के लिए स्थानीय शोध ज़रूरी है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि दोनों थेरेपी ऑनलाइन दी गईं — जो भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में डिजिटल पहुँच की सीमाओं को देखते हुए एक बड़ी चुनौती है। बाल मनोचिकित्सा में प्रशिक्षित विशेषज्ञों की भारी कमी के बीच, यह शोध नीति-निर्माताओं को बाल मानसिक स्वास्थ्य ढाँचे में खान-पान विकारों को शामिल करने का संकेत देता है।
RashtraPress
30 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एआरएफआईडी (ARFID) क्या है और यह सामान्य पिकी ईटिंग से कैसे अलग है?
एआरएफआईडी यानी अवायडेंट रेस्ट्रिक्टिव फ़ूड इनटेक डिसऑर्डर एक मान्यता प्राप्त मानसिक और शारीरिक विकार है, जिसमें बच्चा भोजन में अत्यंत कम रुचि दिखाता है या खाने से डरता है। यह सामान्य पिकी ईटिंग से इसलिए अलग है क्योंकि इसके कारण पोषण की कमी, वज़न न बढ़ना और शारीरिक विकास में बाधा जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
स्टैनफोर्ड के अध्ययन में किन बच्चों को शामिल किया गया और नतीजे क्या रहे?
यह अध्ययन 6 से 12 वर्ष की आयु के 98 बच्चों पर किया गया। दोनों थेरेपी — फैमिली-बेस्ड और इंडिविजुअल मोटिवेशनल — में एआरएफआईडी के लक्षणों में सुधार देखा गया, जबकि फैमिली-बेस्ड थेरेपी में बच्चों का वज़न अधिक तेज़ी से बढ़ा।
फैमिली-बेस्ड थेरेपी और इंडिविजुअल थेरेपी में क्या फर्क है?
फैमिली-बेस्ड थेरेपी में पूरा परिवार — माता-पिता, भाई-बहन और थेरेपिस्ट — मिलकर सेशन में भाग लेता है और माता-पिता को बच्चे की खाने की आदतें बदलने में मदद करना सिखाया जाता है। इंडिविजुअल मोटिवेशनल थेरेपी में बच्चे को गेम्स और कल्पना-आधारित गतिविधियों के ज़रिए खुद प्रेरित किया जाता है।
किन बच्चों में एआरएफआईडी का खतरा अधिक होता है?
शोध के अनुसार, एआरएफआईडी उन बच्चों में अधिक देखा जाता है जिन्हें एंग्जायटी, एडीएचडी या ऑटिज्म जैसी सहवर्ती स्थितियाँ होती हैं। इसके अलावा, जिन बच्चों ने पहले गला अटकने जैसा कोई बुरा अनुभव किया हो, वे भी खाने से परहेज करने लगते हैं।
क्या एआरएफआईडी का इलाज घर पर या ऑनलाइन हो सकता है?
स्टैनफोर्ड के अध्ययन में दोनों थेरेपी ऑनलाइन माध्यम से दी गईं और प्रत्येक बच्चे को चार महीनों में 14 सेशन मिले, जो प्रभावी रहे। हालाँकि, किसी भी उपचार को शुरू करने से पहले प्रशिक्षित बाल मनोचिकित्सक या विशेषज्ञ की सलाह लेना आवश्यक है।
राष्ट्र प्रेस
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