बांग्लादेश में खसरा संकट: टीकाकरण दर 60%25 तक गिरी, स्वास्थ्य तंत्र की बड़ी विफलता उजागर
सारांश
Key Takeaways
- 2025 में बांग्लादेश की राष्ट्रीय टीकाकरण कवरेज घटकर 60 प्रतिशत पर आई — एक दशक का सबसे निम्नतम स्तर।
- 2010-2022 के बीच यही दर 85 से 92 प्रतिशत के बीच थी, जो अब तेजी से गिरी है।
- 37 जिलों में ईपीआई के लगभग 45 प्रतिशत फील्ड पद रिक्त हैं, जिससे 1.5 लाख टीकाकरण केंद्र प्रभावित हैं।
- कोल्ड चेन वैक्सीन पोर्टरों को महीनों वेतन न मिलने के कारण देशव्यापी हड़ताल हुई।
- एचपीएनएसपी कार्यक्रम को 2025 में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बंद करना गंभीर नीतिगत भूल बताई गई।
- विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि समय रहते कदम न उठाए गए तो यह संकट बड़ी मानवीय और आर्थिक त्रासदी में बदल सकता है।
बांग्लादेश में खसरा वैक्सीन संकट ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की गहरी खामियों को उजागर कर दिया है। द डेली स्टार की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में बांग्लादेश की राष्ट्रीय टीकाकरण कवरेज दर घटकर मात्र 60 प्रतिशत रह गई है, जो पिछले करीब एक दशक का सबसे निम्नतम स्तर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट किसी एक घटना का नतीजा नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता की लंबी श्रृंखला का परिणाम है।
टीकाकरण दर में ऐतिहासिक गिरावट
2010 से 2022 के बीच बांग्लादेश की राष्ट्रीय टीकाकरण कवरेज 85 से 92 प्रतिशत के बीच बनी रही थी। इसे दक्षिण एशिया के सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में एक मॉडल उपलब्धि माना जाता था। लेकिन 2025 में यही दर 60 प्रतिशत पर आ गई — यानी महज कुछ वर्षों में 25-32 प्रतिशत अंकों की भारी गिरावट।
यह गिरावट इसलिए और चिंताजनक है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार खसरे जैसी बीमारियों को नियंत्रित रखने के लिए कम से कम 95 प्रतिशत टीकाकरण कवरेज आवश्यक है। इससे कम कवरेज पर बीमारी के प्रकोप का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
ईपीआई कार्यक्रम की बदहाली
बांग्लादेश का विस्तारित टीकाकरण कार्यक्रम (ईपीआई) दशकों तक देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति की रीढ़ रहा। सरकारी प्रतिबद्धता, अंतरराष्ट्रीय विकास साझेदारों के सहयोग और जमीनी स्तर पर स्वास्थ्यकर्मियों के सघन नेटवर्क के बल पर इस कार्यक्रम ने पोलियो, खसरा और डिप्थीरिया जैसी बीमारियों को काफी हद तक नियंत्रित किया था।
रिपोर्ट के अनुसार, अब यह मॉडल चरमरा रहा है। 37 जिलों में ईपीआई के लगभग 45 प्रतिशत फील्ड पद रिक्त पड़े हैं। ये कर्मचारी देशभर के करीब 1.5 लाख टीकाकरण केंद्रों का संचालन करते हैं। इनके अभाव में टीकाकरण सत्र या तो रद्द हो रहे हैं या अनियमित हो गए हैं।
नीतिगत विफलताएं और वेतन संकट
2025 में हेल्थ, पॉपुलेशन एंड न्यूट्रिशन सेक्टर प्रोग्राम (एचपीएनएसपी) को बिना किसी ठोस वैकल्पिक व्यवस्था के अचानक समाप्त कर दिया गया। रिपोर्ट इसे एक गंभीर नीतिगत भूल करार देती है, क्योंकि इसने वित्तपोषण और समन्वय की पूरी श्रृंखला को बाधित कर दिया।
इसके साथ ही, कोल्ड चेन बनाए रखने वाले वैक्सीन पोर्टरों को महीनों तक वेतन नहीं मिला, जिससे व्यापक असंतोष फैला और देशव्यापी हड़ताल हुई। टीकाकरण प्रणाली जिन चार स्तंभों पर टिकी होती है — समन्वित खरीद, स्थिर वित्तपोषण, सक्षम नेतृत्व और भरोसेमंद कार्यबल — वे सभी एक साथ प्रभावित हुए।
विशेषज्ञों की सिफारिशें और आगे की राह
रिपोर्ट में सुधार के लिए कई ठोस कदम सुझाए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं — संस्थागत स्थिरता की बहाली, वैक्सीन खरीद प्रक्रिया का पुनर्गठन, रिक्त पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरना, अनुसंधान एवं निगरानी तंत्र में निवेश, और सतत जनसंवाद के जरिए जनता का भरोसा पुनः अर्जित करना।
गौरतलब है कि यह संकट ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक दबाव झेल रहा है। 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद अंतरिम सरकार के समक्ष स्वास्थ्य क्षेत्र को पटरी पर लाना एक बड़ी चुनौती बन गई है। तुलनात्मक रूप से देखें तो भारत, श्रीलंका और वियतनाम जैसे देशों ने समान आर्थिक स्तर पर भी 90 प्रतिशत से अधिक टीकाकरण कवरेज बनाए रखी है — जो दर्शाता है कि यह संकट अपरिहार्य नहीं, बल्कि नीतिगत इच्छाशक्ति की कमी का परिणाम है।
रिपोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अभी कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्वास्थ्य संकट एक बड़ी मानवीय और आर्थिक त्रासदी में बदल सकता है। आने वाले महीनों में बांग्लादेश सरकार की प्राथमिकताएं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि यह संकट नियंत्रण में आएगा या और गहरा होगा।