स्लिप डिस्क क्यों होती है? आयुर्वेद से जानें इसके कारण और बचाव के उपाय
सारांश
Key Takeaways
- स्लिप डिस्क पीठ दर्द का बड़ा कारण है।
- आयुर्वेद इसके कारणों और उपचार पर जोर देता है।
- व्यायाम और सही आदतें महत्वपूर्ण हैं।
- वात दोष का असंतुलन इस समस्या को बढ़ाता है।
- सही उठाने के तरीके अपनाना आवश्यक है।
नई दिल्ली, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आजकल पीठ दर्द की शिकायतें आम हो गई हैं और इसका मुख्य कारण स्लिप डिस्क बन रहा है। आयुर्वेद इस समस्या के कारण और उपायों का विस्तार से वर्णन करता है।
सरल शब्दों में, हमारी रीढ़ की हड्डियों के बीच की इंटरवर्टिब्रल डिस्क कभी-कभी अपनी जगह से खिसक जाती है या दब जाती है, जिससे नसों पर दबाव पड़ता है। इसका असर पीठ और पैरों में दर्द, झनझनाहट या कमजोरी के रूप में प्रकट होता है। आयुर्वेद इसे कटिग्रह या कटिशूल जैसी अवस्थाओं से जोड़ता है और इसके कारणों को शरीर की दोष संरचना से समझता है।
स्लिप डिस्क अक्सर गलत आदतों और जीवनशैली के कारण होती है। लंबे समय तक एक ही पोजीशन में बैठना, विशेषकर कंप्यूटर या मोबाइल पर काम करते हुए, रीढ़ की हड्डियों पर दबाव डालता है। भारी सामान उठाते समय गलत तरीके से उठाना भी डिस्क को खिसकने पर मजबूर कर सकता है।
उम्र बढ़ने के साथ डिस्क का प्राकृतिक रूप से कमजोर होना, मोटापा और शरीर पर अतिरिक्त भार, चोट या झटका, और मांसपेशियों की कमजोरी जैसी बातें इसे और बढ़ा देती हैं।
आयुर्वेद में इसका कारण वात दोष का असंतुलन माना जाता है। जब वात दोष बढ़ता है, तो शरीर की लचक और सहनशीलता कम हो जाती है। इसीलिए रीढ़ की हड्डियां और डिस्क कमजोर हो जाती हैं। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से इसे सुधारने के लिए केवल दर्द को कम करना ही नहीं, बल्कि शरीर की लचीलापन और मांसपेशियों को मजबूत करना भी आवश्यक है।
बचाव के लिए कुछ आसान उपाय अपनाए जा सकते हैं। लंबे समय तक बैठने से बचें और हर 30-40 मिनट पर थोड़ा चलें। नियमित हल्का व्यायाम, स्ट्रेचिंग, योग और प्राणायाम जैसे भुजंगासन, मकरासन और शवासन रीढ़ को मजबूत और स्थिर रखते हैं। आयुर्वेदिक तेल मालिश और गर्म सिकाई भी मांसपेशियों को आराम देती हैं और नसों पर दबाव कम करती हैं।