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करौंदा: आयरन और विटामिन-सी से भरपूर यह जंगली फल आयुर्वेद में है बहुरोगनाशक

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करौंदा: आयरन और विटामिन-सी से भरपूर यह जंगली फल आयुर्वेद में है बहुरोगनाशक

सारांश

करौंदा — यह छोटा, कांटेदार जंगली फल रसोई की चटनी से कहीं आगे है। आयुर्वेद में एसिडिटी से लेकर मधुमेह के अल्सर तक दर्जनों बीमारियों में इसका उपयोग होता है। पर्यावरण विभाग ने इसे आयरन और विटामिन-सी का उत्कृष्ट स्रोत बताया है — एक उपेक्षित फल जो पोषण और औषधि दोनों का खज़ाना है।

मुख्य बातें

करौंदा ( कैरिसा कैरेंडस ) आयरन और विटामिन-सी का प्राकृतिक स्रोत है, जिसकी पुष्टि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने की है।
पौधे की ऊँचाई 8 से 12 फीट तक होती है; कच्चे फल हरे और पकने पर लाल से बैंगनी-काले रंग के होते हैं।
आयुर्वेद में इसके फल का उपयोग एसिडिटी, अपच, त्वचा रोग, मूत्र विकार, एनीमिया और मधुमेह के अल्सर में होता है।
पत्तियों का काढ़ा बुखार, दस्त और कान दर्द में; जड़ें कृमिनाशक और कीटनाशक के रूप में उपयोगी हैं।
कांटेदार प्रकृति के कारण यह प्राकृतिक बाड़े के रूप में भी काम आता है और कम देखभाल में पनपता है।

खट्टे-मीठे स्वाद वाला करौंदा (कैरिसा कैरेंडस) एक छोटा जंगली फल ज़रूर है, लेकिन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के अनुसार यह आयरन और विटामिन-सी का उत्कृष्ट प्राकृतिक स्रोत है और प्राचीन भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा में दशकों से बहुरोगनाशक माना जाता रहा है। गुच्छों में उगने वाला यह फल रसोई में अचार, चटनी और मुरब्बे की शान बढ़ाता है, साथ ही औषधीय उपयोग की दृष्टि से भी इसका महत्त्व असाधारण है।

पौधे की पहचान और विशेषताएँ

विभाग द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, करौंदे के पौधे की ऊँचाई 8 से 12 फीट तक होती है। इसकी पत्तियाँ छोटी, मोटी और विपरीत क्रम में लगी होती हैं। तने और शाखाओं पर मज़बूत कांटे होते हैं, जो इसे प्राकृतिक बाड़े के रूप में उपयोगी बनाते हैं। फूल छोटे, सुगंधित और सफ़ेद रंग के होते हैं। फल कच्चे होने पर हरे रंग के और पकने पर लाल से बैंगनी-काले रंग में बदल जाते हैं।

विभाग ने यह भी बताया कि यह पौधा कम देखभाल में आसानी से पनपता है, जिससे इसे घर के बगीचे या खेत की मेड़ पर उगाना सरल है। कांटेदार प्रकृति के कारण यह सुरक्षा बाड़े का भी काम करता है।

पोषण और रसोई में उपयोग

करौंदे के ताज़े फल सीधे खाए जा सकते हैं और इनसे अचार, जैम तथा जेली भी तैयार की जाती है। विभाग के अनुसार यह फल आयरन और विटामिन-सी का अच्छा स्रोत है, जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और रक्त की कमी दूर करने में सहायक माना जाता है। यह ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब शहरी आबादी में एनीमिया और पोषण की कमी की समस्या बढ़ रही है।

आयुर्वेद में औषधीय महत्त्व

प्राचीन भारतीय हर्बल चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद में करौंदे के फल का उपयोग कई बीमारियों के प्राकृतिक उपचार के लिए किया जाता है। इनमें एसिडिटी, अपच, ताज़े और संक्रमित घाव, त्वचा रोग, मूत्र संबंधी विकार और मधुमेह के अल्सर शामिल हैं। इसके अतिरिक्त पित्त की समस्या, पेट दर्द, कब्ज़, एनीमिया और भूख न लगने जैसी स्थितियों में भी इसके फल का उपयोग पारंपरिक रूप से होता आया है।

गौरतलब है कि करौंदे का उपयोग केवल फल तक सीमित नहीं है — इसके पत्तियों का काढ़ा बुखार, दस्त और कान दर्द में राहत देने के लिए प्रयोग किया जाता है। वहीं, इसकी जड़ें पेट की बीमारियों, खुजली और कृमि-संक्रमण के लिए कृमिनाशक दवा के रूप में तथा कीटनाशक के रूप में भी उपयोगी मानी जाती हैं।

विशेषज्ञ और सरकारी दृष्टिकोण

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने अपनी एक्स पोस्ट में कहा, 'करौंदा छोटे, सुगंधित फूलों और रंग-बिरंगे फलों वाला एक उपयोगी और कम देखभाल में पनपने वाला पौधा है। इसके फलों का उपयोग अचार, जैम और जेली बनाने में किया जाता है। वहीं, यह आयरन और विटामिन-सी का भी अच्छा स्रोत माना जाता है।' यह जानकारी ऐसे समय में प्रासंगिक है जब देशभर में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने के प्रयास तेज़ हो रहे हैं।

आगे की संभावनाएँ

करौंदे की व्यावसायिक खेती और इसके औषधीय अर्क के प्रसंस्करण में व्यापक संभावनाएँ हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस उपेक्षित जंगली फल को किसानों की आय से जोड़ा जाए और आयुर्वेदिक उद्योग में इसके उपयोग को बढ़ावा दिया जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। एनीमिया और विटामिन की कमी जब भी चर्चा में आती है, समाधान के रूप में महँगे सप्लीमेंट्स की बात होती है — जबकि करौंदा जैसे स्थानीय, कम लागत वाले फल उसी पोषण की पूर्ति कर सकते हैं। सरकारी विभाग का इस फल को सार्वजनिक रूप से रेखांकित करना सराहनीय है, लेकिन असली ज़रूरत इसे कृषि नीति और पोषण कार्यक्रमों में शामिल करने की है — केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

करौंदा क्या है और यह कहाँ पाया जाता है?
करौंदा (वैज्ञानिक नाम: कैरिसा कैरेंडस) एक छोटा जंगली फल है जो भारत में व्यापक रूप से पाया जाता है। यह 8 से 12 फीट ऊँचे कांटेदार पौधे पर गुच्छों में उगता है और कच्चे में हरा तथा पकने पर लाल से बैंगनी-काला हो जाता है।
करौंदे के स्वास्थ्य लाभ क्या हैं?
करौंदा आयरन और विटामिन-सी का अच्छा स्रोत है। आयुर्वेद में इसका उपयोग एसिडिटी, अपच, एनीमिया, त्वचा रोग, मूत्र विकार, मधुमेह के अल्सर, पेट दर्द और कब्ज़ के उपचार में होता है।
करौंदे के पत्ते और जड़ें किस काम आती हैं?
करौंदे की पत्तियों का काढ़ा बुखार, दस्त और कान दर्द में उपयोगी माना जाता है। इसकी जड़ें पेट की बीमारियों में, कृमिनाशक दवा के रूप में और कीटनाशक के रूप में पारंपरिक रूप से प्रयोग की जाती हैं।
करौंदे का रसोई में क्या उपयोग होता है?
करौंदे के फलों से अचार, जैम, जेली और चटनी बनाई जाती है। ताज़े फल भी खाए जा सकते हैं। खट्टे-मीठे स्वाद के कारण यह भारतीय रसोई में मुरब्बे और चटनी के लिए लोकप्रिय है।
करौंदे का पौधा घर में कैसे उगाया जा सकता है?
करौंदे का पौधा कम देखभाल में आसानी से पनपता है, इसलिए इसे घर के बगीचे या खेत की मेड़ पर लगाया जा सकता है। कांटेदार होने के कारण यह प्राकृतिक बाड़े का काम भी करता है, जो इसे किसानों के लिए दोहरे उपयोग का पौधा बनाता है।
राष्ट्र प्रेस
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