25 अगस्त 2026
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एथेनॉल नीति पर प्रियांक खड़गे का वार: '40% सस्ते में चावल बेचकर किसे हो रहा है फायदा?'

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एथेनॉल नीति पर प्रियांक खड़गे का वार: '40% सस्ते में चावल बेचकर किसे हो रहा है फायदा?'

सारांश

कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने केंद्र की एथेनॉल नीति की परत-दर-परत पड़ताल की — करदाताओं का पैसा, FCI का सस्ता चावल, और महंगे दाम पर एथेनॉल की वापसी खरीद। सवाल सीधा है: इस पूरे चक्र में आम उपभोक्ता कहाँ है?

मुख्य बातें

कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने 25 अगस्त को केंद्र की एथेनॉल नीति पर सवाल उठाए।
आरोप: करदाताओं के पैसे से खरीदा चावल एथेनॉल कंपनियों को लागत से करीब 40% कम दाम पर बेचा जा रहा है।
भारतीय खाद्य निगम (FCI) के ज़रिए यह अनाज एथेनॉल उत्पादकों तक पहुँचाया जाता है।
खड़गे ने पूछा — एथेनॉल मिश्रण से पेट्रोल सस्ता हुआ या नहीं , और वाहनों के माइलेज पर असर का आकलन हुआ या नहीं।
माँग: केंद्र खाद्य सुरक्षा के अनाज को एथेनॉल में लगाने के आर्थिक व सामाजिक प्रभाव का पारदर्शी हिसाब दे।

कर्नाटक सरकार के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने मंगलवार, 25 अगस्त को केंद्र सरकार की एथेनॉल नीति पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार करदाताओं के पैसे से खरीदा गया चावल एथेनॉल उत्पादक कंपनियों को उसकी वास्तविक लागत से करीब 40 प्रतिशत कम दाम पर बेच रही है — और यह पूरी व्यवस्था आम उपभोक्ता के हित में नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा उद्योगों के हित में काम कर रही है।

क्या है विवाद का मूल

खड़गे ने स्पष्ट किया कि सरकार पहले किसानों से करदाताओं के धन से धान खरीदती है, फिर उसके भंडारण और परिवहन पर अतिरिक्त व्यय करती है। इसके बाद भारतीय खाद्य निगम (FCI) के माध्यम से वही चावल एथेनॉल उत्पादकों को खरीद मूल्य से काफी कम दाम पर उपलब्ध करा दिया जाता है।

उन्होंने कहा, 'अनाज पर करदाताओं के पैसे से सब्सिडी दी जाती है, सरकार खरीद, भंडारण और ढुलाई का खर्च उठाती है और फिर वही अनाज डिस्काउंट पर एथेनॉल कंपनियों को बेच दिया जाता है। तो इस पूरी व्यवस्था से असल में फायदा किसे हो रहा है?'

खाद्य सुरक्षा बनाम ईंधन उत्पादन

खड़गे ने यह भी सवाल उठाया कि क्या खाद्य सुरक्षा के लिए आरक्षित बड़ी मात्रा में अनाज को एथेनॉल उत्पादन में इसलिए मोड़ा जा रहा है ताकि तेज़ी से स्थापित की गई एथेनॉल फैक्ट्रियों को कच्चा माल सुनिश्चित हो सके। उन्होंने इसे 'भारत के एथेनॉल गणित' की बुनियादी समस्या बताया।

यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही है और एथेनॉल खरीद के लिए बड़े बजटीय प्रावधान किए जा रहे हैं।

उपभोक्ताओं पर असर का सवाल

खड़गे ने पूछा कि यदि अनाज सस्ते में दिया जा रहा है और उसी उद्योग से एथेनॉल महंगे दाम पर खरीदा जा रहा है, तो आम उपभोक्ता को इसका क्या लाभ मिल रहा है। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि एथेनॉल मिश्रण से पेट्रोल के दाम कम हुए हैं या नहीं, और वाहनों के माइलेज व रखरखाव पर इसके प्रभाव का समुचित मूल्यांकन किया गया है या नहीं।

पारदर्शिता की माँग

कर्नाटक के गृह मंत्री ने केंद्र सरकार से माँग की कि वह खाद्यान्न को एथेनॉल उत्पादन में लगाने के आर्थिक, सामाजिक और जनहित से जुड़े प्रभावों का पारदर्शी हिसाब जनता के सामने रखे। उन्होंने कहा, 'कौन किसे सब्सिडी दे रहा है? इस सिस्टम के असली फायदेमंद कौन हैं? केंद्र को इसका साफ जवाब देना चाहिए।'

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने एथेनॉल नीति पर सवाल उठाए हों — लेकिन FCI की भूमिका और सब्सिडी की परतों को इस विस्तार से रेखांकित करना इस बहस को नई धार देता है। केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

दूसरी तरफ उसी सब्सिडाइज़्ड अनाज को निजी एथेनॉल उद्योग को और सस्ते में देती है — और फिर उसी उद्योग से बाज़ार भाव पर एथेनॉल वापस खरीदती है। यह 'दोहरी सब्सिडी' का मॉडल है जिसका लाभ-हानि का सार्वजनिक लेखा-जोखा अब तक पेश नहीं हुआ। जब तक FCI की बिक्री दरें, एथेनॉल खरीद मूल्य और उपभोक्ता स्तर पर ईंधन बचत के आँकड़े एक साथ सार्वजनिक नहीं होते, यह नीति जवाबदेही के दायरे से बाहर बनी रहेगी।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रियांक खड़गे ने केंद्र की एथेनॉल नीति पर क्या आरोप लगाए?
खड़गे ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार करदाताओं के पैसे से खरीदा गया चावल एथेनॉल उत्पादक कंपनियों को उसकी लागत से करीब 40 प्रतिशत कम दाम पर बेच रही है। उनका कहना है कि खरीद, भंडारण और परिवहन का खर्च सरकार उठाती है, फिर भी अनाज रियायती दर पर निजी कंपनियों को दिया जाता है।
FCI की एथेनॉल नीति में क्या भूमिका है?
भारतीय खाद्य निगम (FCI) वह माध्यम है जिसके ज़रिए सरकारी भंडार का चावल एथेनॉल उत्पादकों तक पहुँचाया जाता है। खड़गे के अनुसार यही चावल खरीद मूल्य से काफी कम दाम पर इन कंपनियों को उपलब्ध कराया जाता है।
क्या एथेनॉल मिश्रण से पेट्रोल सस्ता हुआ है?
खड़गे ने यही सवाल उठाया है — उन्होंने पूछा कि एथेनॉल मिश्रण के बाद पेट्रोल के दाम कम हुए हैं या नहीं। साथ ही उन्होंने वाहनों के माइलेज और रखरखाव पर पड़ने वाले असर के समुचित आकलन की भी माँग की।
खड़गे ने केंद्र से क्या माँग की है?
उन्होंने माँग की है कि केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा के लिए आरक्षित अनाज को एथेनॉल उत्पादन में लगाने के आर्थिक, सामाजिक और जनहित से जुड़े प्रभावों का पारदर्शी हिसाब जनता के सामने रखे।
यह विवाद भारत की एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के लिए क्यों अहम है?
केंद्र सरकार पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य की ओर तेज़ी से बढ़ रही है, जिसके लिए बड़े पैमाने पर अनाज का उपयोग होता है। यदि खड़गे के आरोप सही हैं, तो यह नीति खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
राष्ट्र प्रेस
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