चीनी ₹46 से ₹65 प्रति किलो: केजरीवाल का आरोप — इथेनॉल नीति ने बिगाड़ा रसोई का बजट
सारांश
मुख्य बातें
आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 20 अगस्त को केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति को चीनी की बढ़ती कीमतों का सीधा जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप है कि गन्ने को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने के फैसले के कारण महज 17 दिनों में चीनी की खुदरा कीमत लगभग ₹46 प्रति किलो से बढ़कर ₹65 प्रति किलो हो गई है — यानी करीब ₹20 प्रति किलो की उछाल। केजरीवाल ने इसे नीतिगत दूरदर्शिता की विफलता बताते हुए केंद्र सरकार से तत्काल समीक्षा की माँग की।
इथेनॉल नीति और चीनी संकट का संबंध
केजरीवाल के अनुसार, केंद्र सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की नीति के तहत गन्ने का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में लगाया। सरकार का तर्क था कि इससे पेट्रोलियम आयात पर विदेशी मुद्रा की बचत होगी। केजरीवाल ने कहा कि अब स्थिति यह बन गई है कि घरेलू चीनी उत्पादन में कमी को पूरा करने के लिए विदेशों से चीनी आयात करने की नौबत आ सकती है, जिससे वही विदेशी मुद्रा चीनी खरीदने में खर्च होगी जो पेट्रोलियम आयात में बचाई गई थी।
उन्होंने तर्क दिया कि भारत पहले चीनी निर्यातक देशों की अग्रिम पंक्ति में था, लेकिन अब आयात की संभावना पर विचार करने की स्थिति में पहुँच गया है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बाज़ार में चीनी की कीमतें भी ऊँची बनी हुई हैं।
इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर भी सवाल
केजरीवाल ने केवल चीनी की कीमतों तक ही अपनी आलोचना सीमित नहीं रखी। उन्होंने दावा किया कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के कारण वाहन मालिकों को इंजन संबंधी दिक्कतें और माइलेज में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है। उनके अनुसार, एक ओर वाहन चालक कथित तौर पर ईंधन की गुणवत्ता से परेशान हैं, तो दूसरी ओर आम परिवारों को रसोई में इस्तेमाल होने वाली चीनी के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।
नोटबंदी और कोरोना का संदर्भ
केजरीवाल ने इथेनॉल नीति की आलोचना को व्यापक संदर्भ देते हुए नोटबंदी और कोरोना महामारी के दौरान लिए गए फैसलों का भी उल्लेख किया। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार बड़े निर्णय लेने से पहले उनके दीर्घकालिक परिणामों का पर्याप्त आकलन नहीं करती, और इसका खामियाजा अंततः आम जनता को भुगतना पड़ता है।
आम जनता पर असर
केजरीवाल ने रेखांकित किया कि चीनी की कीमतों में अचानक वृद्धि का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं है। चाय, मिठाई, खाद्य प्रसंस्करण और छोटे कारोबारों की लागत भी इससे प्रभावित होती है, जो अंततः उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ाती है। उन्होंने केंद्र सरकार से चीनी की कीमतें नियंत्रित करने और इथेनॉल नीति के प्रभावों की समग्र समीक्षा करने की माँग की। गौरतलब है कि सरकार की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।