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केरल हाई कोर्ट ने केंद्र से कहा — पेटेंट अधिनियम धारा 100 से महंगी कैंसर दवाओं की पहुँच सुधारें

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केरल हाई कोर्ट ने केंद्र से कहा — पेटेंट अधिनियम धारा 100 से महंगी कैंसर दवाओं की पहुँच सुधारें

सारांश

केरल हाई कोर्ट ने केंद्र को एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है — पेटेंट अधिनियम की धारा 100 का उपयोग करके महंगी जीवन-रक्षक दवाओं तक पहुँच सुनिश्चित की जाए। ₹78,000 प्रति माह वाली कैंसर दवा की याचिका से शुरू यह मामला अब देशभर में दवा-मूल्य नीति पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

मुख्य बातें

केरल हाई कोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को केंद्र से पेटेंट अधिनियम धारा 100 की समीक्षा कर महंगी जीवन-रक्षक दवाओं तक पहुँच सुधारने को कहा।
न्यायमूर्ति हरिशंकर वी.
मेनन ने कहा कि जहाँ दवाएँ अत्यधिक कीमत पर बेची जाएँ, वहाँ सरकारी हस्तक्षेप पर विचार किया जा सकता है।
मामला नोवार्टिस की स्तन कैंसर दवा रिबोसिक्लिब से जुड़ा है, जिसकी कीमत ₹78,468.75 प्रति माह थी।
कैंसर उपचार संस्थानों और भारतीय औषधि नियंत्रक जनरल ने पुष्टि की कि रिबोसिक्लिब और पालबोसिक्लिब को एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता की सितंबर 2022 में मृत्यु के बावजूद हाई कोर्ट ने जनहित में सुनवाई जारी रखी।
अदालत ने केंद्र को वहनीयता आकलन के लिए डेटा संकलन और अन्य जीवन-रक्षक दवाओं में भी धारा 100 लागू करने पर विचार का निर्देश दिया।

केरल हाई कोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार से यह समीक्षा करने को कहा कि क्या पेटेंट अधिनियम की धारा 100 के तहत प्राप्त अधिकारों का उपयोग महंगी पेटेंटेड जीवन-रक्षक दवाओं तक आम मरीजों की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है। अदालत ने यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की जो मूल रूप से स्तन कैंसर की महंगी दवा रिबोसिक्लिब की किफायती उपलब्धता से जुड़ी थी।

मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने स्पष्ट किया कि धारा 100 का क्रियान्वयन अंततः एक नीतिगत निर्णय है, किंतु जहाँ दवाएँ अत्यधिक कीमतों पर बेची जा रही हों, वहाँ सरकारी हस्तक्षेप पर विचार किया जाना उचित है। अदालत ने केंद्र को इस प्रावधान को तत्काल लागू करने का कोई प्रत्यक्ष निर्देश नहीं दिया, बल्कि सरकार से वहनीयता के आकलन के लिए डेटा एकत्र करने और आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप पर विचार करने को कहा।

गौरतलब है कि पेटेंट अधिनियम की धारा 100 केंद्र सरकार को पेटेंट धारक की सहमति के बिना सरकारी प्रयोजनों के लिए पेटेंट प्राप्त आविष्कार के उपयोग को अधिकृत करने का अधिकार देती है — एक ऐसा प्रावधान जिसका भारत में अब तक बहुत सीमित उपयोग हुआ है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कार्यवाही मुख्यतः दो स्तन कैंसर दवाओं पर केंद्रित रही — नोवार्टिस द्वारा निर्मित पेटेंटेड दवा रिबोसिक्लिब और एक अन्य दवा पालबोसिक्लिब, जिसका पेटेंट समाप्त हो चुका है और जो अपेक्षाकृत कम मूल्य पर उपलब्ध है। कैंसर उपचार संस्थानों और भारतीय औषधि नियंत्रक जनरल की विशेषज्ञ राय ने पुष्टि की कि इन दोनों दवाओं को एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग नहीं किया जा सकता।

यह मामला 2022 में कैंसर के एक मरीज की याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें रिबोसिक्लिब को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने की माँग की गई थी। उस समय इस दवा की कीमत लगभग ₹78,468.75 प्रति माह थी। याचिकाकर्ता की सितंबर 2022 में मृत्यु हो गई, परंतु केरल हाई कोर्ट ने जनहित को देखते हुए इस मामले की सुनवाई जारी रखने का निर्णय लिया।

अदालत का आदेश और दायरा

न्यायालय ने कहा कि किफायती मूल्य का सही आकलन करने के लिए उचित डेटा-आधारित जाँच आवश्यक है। अदालत के अनुसार यदि हस्तक्षेप आवश्यक पाया जाए, तो केंद्र सरकार केवल इस मामले तक सीमित न रहे, बल्कि अन्य जीवन-रक्षक दवाओं के मामलों में भी धारा 100 लागू करने पर विचार कर सकती है। यह टिप्पणी भविष्य में दवा-मूल्य नीति के लिए एक व्यापक संकेत के रूप में देखी जा रही है।

आम जनता पर असर

भारत में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोग होने वाली पेटेंटेड दवाओं की कीमतें अधिकांश मरीजों की आर्थिक क्षमता से कहीं अधिक हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देश में स्वास्थ्य देखभाल की वहनीयता को लेकर बहस तेज हो रही है और सरकारी बीमा योजनाओं की सीमाएँ उजागर हो रही हैं। यदि केंद्र सरकार धारा 100 के तहत कदम उठाती है, तो यह लाखों कैंसर मरीजों के लिए जीवन-रक्षक उपचार को और अधिक सुलभ बना सकता है।

क्या होगा आगे

केरल हाई कोर्ट के इस निर्देश के बाद अब केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों पर यह दबाव है कि वे वहनीयता डेटा संकलन की प्रक्रिया शुरू करें। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि केंद्र इस दिशा में ठोस कदम उठाता है तो यह भारत की बौद्धिक संपदा और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका व्यावहारिक उपयोग लगभग शून्य रहा है, जो बताता है कि बौद्धिक संपदा उद्योग का दबाव नीति पर कितना भारी पड़ता है। याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद भी मामला जीवित रखना अदालत का जनहित के प्रति असाधारण प्रतिबद्धता का संकेत है। असली परीक्षा अब केंद्र सरकार की है — क्या वह फार्मा लॉबी के दबाव से इतर डेटा संकलन की ठोस प्रक्रिया शुरू करेगी, या यह निर्देश भी फाइलों में दब जाएगा।
RashtraPress
29 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पेटेंट अधिनियम की धारा 100 क्या है?
धारा 100 केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि वह पेटेंट धारक की सहमति के बिना सरकारी प्रयोजनों के लिए पेटेंट प्राप्त आविष्कार के उपयोग को अधिकृत कर सके। यह प्रावधान विशेष रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों में महंगी पेटेंटेड दवाओं की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए प्रासंगिक माना जाता है।
केरल हाई कोर्ट का यह मामला किससे जुड़ा है?
यह मामला 2022 में एक कैंसर मरीज की याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें स्तन कैंसर की पेटेंटेड दवा रिबोसिक्लिब को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने की माँग की गई थी। उस समय इस दवा की कीमत लगभग ₹78,468.75 प्रति माह थी और याचिकाकर्ता की सितंबर 2022 में मृत्यु के बाद भी हाई कोर्ट ने जनहित में सुनवाई जारी रखी।
क्या केरल हाई कोर्ट ने केंद्र को धारा 100 लागू करने का सीधा आदेश दिया?
नहीं, अदालत ने केंद्र को धारा 100 तत्काल लागू करने का प्रत्यक्ष निर्देश नहीं दिया। न्यायालय ने सरकार से वहनीयता के आकलन के लिए डेटा एकत्र करने और जहाँ आवश्यक हो, हस्तक्षेप पर विचार करने को कहा है।
रिबोसिक्लिब और पालबोसिक्लिब में क्या अंतर है?
रिबोसिक्लिब नोवार्टिस की पेटेंटेड स्तन कैंसर दवा है जो बहुत महंगी है, जबकि पालबोसिक्लिब का पेटेंट समाप्त हो चुका है और यह अपेक्षाकृत कम मूल्य पर उपलब्ध है। कैंसर उपचार संस्थानों और भारतीय औषधि नियंत्रक जनरल की राय के अनुसार, इन दोनों दवाओं को एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग नहीं किया जा सकता।
इस फैसले का कैंसर मरीजों पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि केंद्र सरकार अदालत के निर्देश के अनुरूप डेटा संकलन कर धारा 100 लागू करती है, तो यह न केवल रिबोसिक्लिब बल्कि अन्य महंगी जीवन-रक्षक दवाओं को भी अधिक किफायती बना सकता है। इससे उन लाखों मरीजों को लाभ मिल सकता है जो अभी इन दवाओं की ऊँची कीमतों के कारण उपचार से वंचित रह जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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