22 सितंबर 2026
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कैंसर दवाओं की कीमत में 10 गुना अंतर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, MRP तय करने की व्यवस्था पर उठाए तीखे सवाल

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कैंसर दवाओं की कीमत में 10 गुना अंतर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, MRP तय करने की व्यवस्था पर उठाए तीखे सवाल

सारांश

कैंसर की दवा थोक में ₹2,700 और MRP ₹27,000 — सुप्रीम कोर्ट ने इस 10 गुना अंतर पर सरकारी अथॉरिटी की चुप्पी तोड़ने की माँग की। 82% दवाएँ मूल्य नियंत्रण से बाहर हैं, और 60,000 ब्रांडों में से नियमन सिर्फ 5,000 पर लागू है — यही वह खाई है जिस पर कोर्ट ने सवाल खड़े किए।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 22 सितंबर 2026 को कैंसर दवाओं की थोक कीमत ( ₹2,700 ) और MRP ( ₹27,000 ) के बीच 10 गुना अंतर पर कड़ी आपत्ति जताई।
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने पूछा कि मूल्य नियंत्रण अथॉरिटी इस मामले में क्यों निष्क्रिय है।
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन के अनुसार, बाज़ार की लगभग 82% दवाएँ मूल्य नियंत्रण सूची से बाहर हैं; 60,000 ब्रांडों में से केवल 5,000 से कम पर नियमन लागू।
IPA की ओर से कपिल सिब्बल ने रिटेलरों को ज़िम्मेदार ठहराया, जिस पर कोर्ट ने कहा कि MRP निर्माता ही तय करते हैं।
मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने 22 सितंबर 2026 को कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं की कीमतों में 10 गुना तक के अंतर पर कड़ी नाराज़गी जताई और दवा कीमत नियंत्रण तंत्र की निष्क्रियता पर तीखे सवाल उठाए। नई दिल्ली में एक याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि जब कोई दवा निर्माता दुकानदार को ₹2,700 में बेचता है, तो उसी दवा पर ₹27,000 का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) क्यों अंकित किया जाता है। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।

मुख्य घटनाक्रम

जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दवाओं की कीमतों और उनकी बिक्री से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ₹2,700 में थोक में बिकने वाली दवा पर ₹27,000 का MRP एक 'बहुत बड़ा अंतर' है और यह जानना ज़रूरी है कि इतनी ऊँची कीमत तय कौन कर रहा है।

कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि दवाओं की कीमत पर नज़र रखने वाली सरकारी अथॉरिटी इस मामले में मूकदर्शक क्यों बनी हुई है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में दवाओं की महँगाई मध्यम-वर्गीय और निम्न-आय परिवारों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।

याचिकाकर्ता के तर्क

याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने पीठ को बताया कि दवा (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के अंतर्गत केवल लगभग 1,000 दवाओं की कीमत पर सीधा सरकारी नियंत्रण है। जो दवाएँ इस सूची में नहीं आतीं, उनकी शुरुआती कीमत निर्माता कंपनी स्वयं तय करती है। एक बार कीमत तय हो जाने के बाद उसमें सालाना 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी नहीं की जा सकती।

जैन के अनुसार, बाज़ार में उपलब्ध लगभग 82 प्रतिशत दवाएँ मूल्य नियंत्रण सूची से बाहर हैं। उन्होंने यह भी बताया कि बाज़ार में करीब 60,000 ब्रांड मौजूद हैं, जबकि मूल्य नियंत्रण व्यवस्था केवल 5,000 से कम दवाओं पर लागू होती है। यह आँकड़ा नीतिगत खाई की गहराई को उजागर करता है।

फार्मा उद्योग की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस (IPA) की ओर से तर्क दिया कि ऊँची दवा कीमतों के लिए निर्माता नहीं, बल्कि रिटेलर ज़िम्मेदार हैं जो अत्यधिक मुनाफा कमा रहे हैं। इस पर जस्टिस मेहता ने पलटवार करते हुए कहा कि MRP तो निर्माता ही तय करते हैं — यदि MRP इतनी ऊँची है, तो उसकी ज़िम्मेदारी भी निर्माता की ही बनती है।

गौरतलब है कि यह बहस दशकों पुरानी है — निर्माता रिटेलर पर दोष मढ़ते हैं, रिटेलर निर्माता की MRP नीति को घेरता है, और मरीज़ बीच में पिसता रहता है।

आम जनता पर असर और आगे की राह

जस्टिस मेहता ने एक व्यावहारिक पहलू उठाते हुए कहा कि जब कोई मरीज़ आपातकाल में दवा लेने जाता है, तो उसका परिवार दुकान-दुकान जाकर कीमतों की जाँच करने की स्थिति में नहीं होता। इस टिप्पणी ने 'कीमत पारदर्शिता' के तर्क की सीमाओं को रेखांकित किया।

कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि दवाओं की कीमत-जानकारी दुकानदारों के पास उपलब्ध रहने से मरीज़ को व्यावहारिक रूप से कितना लाभ होगा। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को निर्धारित है, जिसमें सरकारी अथॉरिटी का पक्ष भी अपेक्षित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

2013 की सीमाओं को जानते हुए भी इसे व्यापक क्यों नहीं बनाया। मुख्यधारा की कवरेज कोर्ट की तल्खी पर टिकी है, लेकिन वह यह नहीं पूछती कि जब 60,000 ब्रांड बाज़ार में हों और नियमन 5,000 से कम पर लागू हो, तो क्या कोई भी अथॉरिटी वास्तव में 'नज़र रख' सकती है। जब तक मूल्य नियंत्रण की परिधि नहीं बढ़ती, न्यायिक फटकार महज़ सुर्खियाँ बनती रहेंगी।
RashtraPress
22 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर दवाओं की कीमतों पर क्या कहा?
सर्वोच्च न्यायालय ने 22 सितंबर 2026 को कड़ी टिप्पणी करते हुए पूछा कि जब कोई दवा थोक में ₹2,700 में बिकती है तो उसका MRP ₹27,000 क्यों रखा जाता है। कोर्ट ने मूल्य नियंत्रण अथॉरिटी की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए।
भारत में दवाओं की MRP कौन तय करता है?
दवा (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत लगभग 1,000 दवाओं की कीमत सरकार तय करती है। इस सूची से बाहर की दवाओं की शुरुआती कीमत निर्माता कंपनी स्वयं तय करती है, जिसके बाद सालाना 10% से अधिक वृद्धि नहीं की जा सकती।
कितनी दवाएँ मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर हैं?
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन के अनुसार, बाज़ार की लगभग 82% दवाएँ मूल्य नियंत्रण सूची में नहीं हैं। बाज़ार में करीब 60,000 ब्रांड हैं, जबकि मूल्य नियंत्रण केवल 5,000 से कम दवाओं पर लागू होता है।
इस मामले में फार्मा उद्योग का क्या पक्ष है?
इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस (IPA) की ओर से अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि ऊँची कीमतों के लिए निर्माता नहीं, बल्कि रिटेलर ज़िम्मेदार हैं जो अत्यधिक मुनाफा कमा रहे हैं। हालाँकि कोर्ट ने इस दलील को चुनौती दी और कहा कि MRP निर्माता ही तय करते हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई कब है?
सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को निर्धारित है, जिसमें सरकारी मूल्य नियंत्रण अथॉरिटी का पक्ष भी सुने जाने की संभावना है।
राष्ट्र प्रेस
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