दवाओं की MRP पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 5 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 29 सितंबर 2026 को दवाओं की अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) निर्धारण प्रक्रिया पर गंभीर चिंता व्यक्त की और मामले को शीघ्र निपटाने की बात कही। नई दिल्ली में चली इस सुनवाई में वर्ष 2003 में दायर एक जनहित याचिका पर विचार किया गया, जिसमें जेनेरिक दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन और दवा मूल्य नियंत्रण से जुड़े अहम सवाल उठाए गए थे। अगली सुनवाई के लिए 5 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की गई है।
जनहित याचिका की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता एवं अधिवक्ता किशन चंद जैन ने अदालत को बताया कि यह याचिका 2003 में दायर की गई थी और इसमें दो केंद्रीय मुद्दे उठाए गए थे। पहला, हर पंजीकृत चिकित्सक द्वारा जेनेरिक दवाएँ लिखे जाने की अनिवार्यता, और दूसरा, दवाओं की MRP तय करने की मौजूदा प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी। गौरतलब है कि यह याचिका दो दशकों से अधिक समय से न्यायालय में लंबित है, जो दर्शाती है कि दवा मूल्य नियंत्रण का मुद्दा कितना जटिल और दीर्घकालिक रहा है।
शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल दवाओं का फर्क
ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) 2013 के तहत दवाओं को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है — शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल। शेड्यूल दवाओं की कीमत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) तय करती है, जिसमें खुदरा विक्रेता के लिए 16 प्रतिशत मार्जिन निर्धारित है। हालाँकि, जैन ने बताया कि बाज़ार में बड़ी संख्या में दवाएँ नॉन-शेड्यूल श्रेणी में आती हैं, जिन पर इस तरह का कोई कठोर मूल्य नियंत्रण लागू नहीं होता।
जैन ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई दवा बाज़ार में ₹10 में उपलब्ध है, तो उसकी MRP ₹100 तक रखी जा सकती है। उनके अनुसार यह स्थिति विशेष रूप से उन अस्पतालों में मरीजों को आर्थिक नुकसान पहुँचाती है जहाँ MRP के आधार पर बिलिंग होती है। सरकारी प्रतिपूर्ति (रीइंबर्समेंट) की स्थिति में भी अत्यधिक MRP से सार्वजनिक कोष पर अनावश्यक बोझ पड़ता है।
अदालत की टिप्पणी और सरकार का रुख
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि रिटेलर के 16 प्रतिशत मार्जिन को जोड़कर MRP निर्धारित करने की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार इस प्रस्ताव का विरोध नहीं कर रही, लेकिन संबंधित अधिकारियों से विचार-विमर्श के बाद ऐसा व्यावहारिक रास्ता निकालना चाहती है जिससे दवाओं की MRP उचित ढंग से तय हो सके।
आवश्यक वस्तु अधिनियम का तर्क
जैन ने अदालत के सामने यह भी तर्क रखा कि शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल — दोनों श्रेणियों की दवाओं को आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत आवश्यक वस्तु माना जाना चाहिए। उन्होंने ग्लव्स, इंजेक्शन और अन्य चिकित्सा उपकरणों को भी इसी दायरे में लाने की माँग की। अदालत ने इस तर्क पर सहमति जताते हुए कहा कि यदि सभी दवाएँ आवश्यक वस्तु की परिभाषा में आती हैं, तो शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल दवाओं के बीच मूल्य नियंत्रण की अलग-अलग व्यवस्था का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए।
आगे क्या होगा
मामले में 5 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में दवाओं की MRP निर्धारण व्यवस्था और व्यापक मूल्य नियंत्रण ढाँचे पर आगे की बहस होगी। अदालत ने मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए इसे शीघ्र निपटाने की प्रतिबद्धता जताई है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में दवाओं की बढ़ती कीमतें आम जनता के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं और स्वास्थ्य सेवा की सुलभता पर बहस तेज़ हो रही है।