दवाओं की कीमतों में करोड़ों का गठजोड़, अपोलो जैसे कॉर्पोरेट अस्पतालों को 50% तक कमीशन: जसवंत पटेल
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन के प्रमुख जसवंत पटेल ने 23 सितंबर 2026 को अहमदाबाद में देश की दवा मूल्य निर्धारण व्यवस्था में चल रहे कथित करोड़ों रुपये के गठजोड़ का पर्दाफाश किया। उनके अनुसार दवा कंपनियाँ, कॉर्पोरेट अस्पताल और डॉक्टर मिलकर आम मरीज़ को लूट रहे हैं, जबकि छोटे केमिस्ट को उचित मार्जिन तक नहीं मिल पाता।
मार्जिन का दोहरा खेल
पटेल ने आरोप लगाया कि दवा कंपनियाँ एक छोटे केमिस्ट को 2 प्रतिशत अतिरिक्त मार्जिन देने में भी आनाकानी करती हैं। इसके विपरीत, अपोलो जैसे बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों और चेन स्टोर्स को 30 से 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त कमीशन दिया जाता है। उनका कहना है, 'हमारा मार्जिन तो सेंट्रल ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के तहत फिक्स है, लेकिन बड़ी चेन को मनमाना लाभ मिलता है।'
नियमानुसार रिटेल मार्जिन 20 प्रतिशत और होलसेल मार्जिन 10 प्रतिशत तय है। लेकिन पटेल का दावा है कि ज़मीनी हक़ीक़त इससे कोसों दूर है — उन्होंने उदाहरण दिया कि ₹27 की एमआरपी वाली दवा बाज़ार में कथित तौर पर ₹27,000 में बिक रही है।
कैंसर और आपातकालीन दवाओं में भारी अंतर
पटेल के अनुसार, कैंसर की दवाओं में एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) और पीटीएस (प्राइस टू स्टॉकिस्ट) के बीच बेहद बड़ा अंतर होता है, जिसमें करोड़ों रुपये का घोटाला होता है। डिस्ट्रीब्यूटर को इस पूरे अंतर में से 5 प्रतिशत भी नहीं मिलता। हृदय संबंधी इंजेक्शन, नेफ्रो इंजेक्शन और अन्य आपातकालीन दवाओं की एमआरपी भी लागत के मुकाबले अनुपातहीन रूप से ऊँची रखी जाती है।
उन्होंने बताया कि ज़्यादातर कैंसर में उपयोग होने वाली एक डोज़ की कीमत ₹80,000 से ₹1 लाख तक होती है, और बॉडी की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए मरीज़ को 5-6 डोज़ लेनी पड़ती हैं। यह आम और मध्यमवर्गीय परिवारों की क्षमता से बाहर है।
डॉक्टरों और अस्पतालों के अंदरूनी नेटवर्क का आरोप
पटेल का आरोप है कि देशभर में लगभग 200 विशेष डिस्ट्रीब्यूटर हैं, जो स्पेशियलिटी दवाओं में सीधे डॉक्टरों के साथ जुड़े हैं। कई डॉक्टरों के अपने रिश्तेदारों के मेडिकल स्टोर हैं, और अस्पतालों के अंदर मौजूद फार्मेसी स्टोर्स में भी कथित तौर पर अनुचित वसूली हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि कोरोना काल में इस्तेमाल हुई कई एंटीबायोटिक दवाएँ सीधे अस्पतालों को आपूर्ति की गईं, जहाँ पारदर्शिता न के बराबर थी।
पटेल ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के प्रति आभार व्यक्त किया, यह संकेत देते हुए कि यह मामला न्यायपालिका के संज्ञान में भी है।
सरकार और एनपीपीए से माँग
पटेल ने कहा कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए — NPPA) को ही इस व्यवस्था को सुधारना होगा। उनकी माँग है कि सरकार एक एमएपीई (MAPE) यानी अधिकतम अनुमत व्यापार मार्जिन तय करे, और पीटीएस, पीटीआर तथा एमआरपी के बीच के अंतर को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए। पेटेंटेड उत्पादों की मनमानी एमआरपी पर भी नियंत्रण आवश्यक बताया।
उन्होंने कहा कि एमआरपी से ज़्यादा लेना अपराध है, लेकिन एमआरपी की सीमा में रहकर की जा रही लूट को रोकने का कोई कानून अभी नहीं है। उन्होंने सीबीआई जाँच की माँग करते हुए कहा कि इससे अपोलो सहित कई बड़ी कॉर्पोरेट हॉस्पिटल चेन का नेटवर्क सामने आएगा।
आम जनता पर असर
गौरतलब है कि यह खुलासा ऐसे समय में आया है जब देश में स्वास्थ्य खर्च परिवारों की आय का सबसे बड़ा बोझ बन चुका है। पटेल ने कहा कि मध्यम और गरीब वर्ग के लोग इलाज के लिए अपनी ज़मीन-जायदाद तक बेचने को मजबूर हो रहे हैं। दवाओं के बढ़े हुए बिल इस संकट को और गहरा कर रहे हैं। जब तक मूल्य निर्धारण की पूरी शृंखला — निर्माता से लेकर मरीज़ तक — पारदर्शी और जवाबदेह नहीं बनाई जाती, इस गठजोड़ को तोड़ना मुश्किल होगा।