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क्या बजट 2026-27 से पहले व्यापारियों की मांग, दवाओं से लेकर सोने तक जीएसटी घटाने की अपील की जा रही है?

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क्या बजट 2026-27 से पहले व्यापारियों की मांग, दवाओं से लेकर सोने तक जीएसटी घटाने की अपील की जा रही है?

सारांश

बजट 2026-27 से पहले व्यापारियों ने जीएसटी में कटौती की मांग की है, जिसमें दवाओं और सोने के दामों में वृद्धि का मुख्य कारण बताया जा रहा है। क्या सरकार इस पर ध्यान देगी?

मुख्य बातें

दवाओं की कीमतों में वृद्धि पर जीएसटी घटाने की मांग हो रही है।
सोने और चांदी पर जीएसटी कम करने की आवश्यकता है।
सरकार को डॉक्टरों की फीस की सीमा तय करनी चाहिए।
महंगाई के कारण गरीब जनता को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
बजट में गरीबों की भलाई का ध्यान रखना चाहिए।

झांसी, 23 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आम बजट 2026-2027 के आने में केवल कुछ दिन बचे हैं। ऐसे में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े व्यापारियों ने दवाओं से लेकर सोने तक जीएसटी घटाने की मांग की है।

मेडिसिन ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र अग्रवाल ने कहा कि सरकार को दवाओं, डॉक्टरों की फीस और नर्सिंग चार्ज पर एक स्पष्ट सीमा तय करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह निर्धारित होना चाहिए कि कोई व्यक्ति अधिकतम कितना शुल्क ले सकता है।

अग्रवाल ने समाचार एजेंसी राष्ट्र प्रेस से बातचीत में उदाहरण देते हुए कहा कि जो दवाएं जन औषधि केंद्रों पर 8 रुपए में उपलब्ध हैं, वही खुले बाजार में 150 रुपए तक बिक रही हैं, जबकि दोनों कीमतें सरकार द्वारा स्वीकृत हैं। उन्होंने मांग की कि गरीब जनता को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए हर दवा पर कीमत की कैपिंग की जाए और डॉक्टरों की फीस भी उनकी डिग्री के अनुसार तय की जाए। साथ ही उन्होंने स्वास्थ्य विभाग में व्याप्त अनियमितताओं को गंभीर बताते हुए उसमें सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया।

वहीं, सर्राफा कारोबारी उदय सोनी ने कहा कि व्यापारियों को इस बार के बजट से बड़ी उम्मीदें हैं। उन्होंने बताया कि सोने-चांदी के दामों में जबरदस्त तेजी के कारण स्वर्णकार काफी परेशान हैं। उदय सोनी ने उम्मीद जताई कि सरकार सर्राफा कारोबारियों की समस्याओं पर ध्यान देगी।

उन्होंने कहा कि फिलहाल सोने और चांदी पर 3 प्रतिशत जीएसटी लगाया जा रहा है, जिसे घटाकर 2 प्रतिशत या आधा किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कारीगरों के हितों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सर्राफा उद्योग लेबर पर निर्भर है। ऐसे में लेबर पर लगने वाला जीएसटी पूरी तरह समाप्त किया जाना चाहिए।

कारोबारी मेहताब आलम ने कहा कि यदि बजट गरीबों की भलाई को ध्यान में रखकर बनाया जाए तो यह एक अच्छी पहल होगी। उन्होंने महंगाई का जिक्र करते हुए कहा कि बढ़ती कीमतों के कारण गरीब आदमी अब सोना नहीं खरीद पा रहा है।

उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि पहले जहां एक लाख रुपए में शादी हो जाया करती थी। वहीं आज उसी रकम में एक तोला सोना भी मुश्किल से आता है। मेहताब आलम ने मांग की कि सोने पर लगने वाला जीएसटी काफी कम किया जाना चाहिए और घर निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सामानों पर भी जीएसटी घटाई जानी चाहिए।

इससे पहले ट्रेडर नवाब कुरैशी ने सरकार की जीएसटी नीति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार अपनी मर्जी से जनता पर जीएसटी थोप रही है, जबकि आम लोग पहले से ही हर तरफ महंगाई से जूझ रहे हैं। नवाब कुरैशी ने आरोप लगाया कि सरकार ने शिक्षा पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाया है, जबकि दावा किया जा रहा है कि नोटबुक, पेंसिल और अन्य वस्तुओं पर जीएसटी 12 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दी गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह के फैसलों से आम जनता को वास्तविक रूप से कोई खास राहत नहीं मिल रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह स्पष्ट है कि जीएसटी में कटौती की मांग करने वाले व्यापारी देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठा रहे हैं। सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ताकि आम जनता को राहत मिल सके।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बजट 2026-27 में जीएसटी में कटौती की मांग क्यों की जा रही है?
व्यापारी महंगाई के कारण दवाओं और सोने के दामों में वृद्धि के चलते जीएसटी में कटौती की मांग कर रहे हैं।
सरकार को दवाओं की कीमतों पर क्या कदम उठाने चाहिए?
सरकार को दवाओं पर कीमत की कैपिंग और डॉक्टरों की फीस की एक स्पष्ट सीमा तय करनी चाहिए।
सोने और चांदी पर जीएसटी घटाने की मांग कब से की जा रही है?
व्यापारी लंबे समय से सोने और चांदी पर जीएसटी घटाने की मांग कर रहे हैं, विशेषकर बढ़ती कीमतों के चलते।
क्या सरकार ने शिक्षा पर जीएसटी में कटौती की है?
सरकार ने शिक्षा सामग्री पर जीएसटी को 18 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत करने का दावा किया है, लेकिन वास्तविक राहत नहीं मिली है।
क्या बजट में गरीबों की भलाई का ध्यान रखा जाएगा?
यदि बजट गरीबों की भलाई को ध्यान में रखकर बनाया जाए तो यह एक सकारात्मक पहल होगी।
राष्ट्र प्रेस
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