पी. जयराज: 70 साल के फिल्मी सफर का गिनीज़ रिकॉर्ड, जब 'सागर' ने डुबो दी थी सारी जमा पूंजी
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सिनेमा के इतिहास में पी. जयराज एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने मूक फिल्मों के युग से अपनी यात्रा शुरू की और सात दशकों तक रुपहले पर्दे पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। 28 सितंबर 1909 को तेलंगाना के करीमनगर में जन्मे जयराज का नाम आज भी गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है — लगभग 70 वर्षों के सक्रिय फिल्मी करियर के लिए। 1980 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया।
शेक्सपियर से सिल्वर स्क्रीन तक
निजाम कॉलेज में पढ़ाई के दौरान जयराज अक्सर शेक्सपियर के नाटकों में भाग लेते थे। उनका परिवार समृद्ध था — उनके मामा की शादी著名 स्वतंत्रता सेनानी सरोजनी नायडू से हुई थी और पिता एक उच्च सरकारी पद पर आसीन थे। पड़ोसियों के फिल्म जगत से जुड़े होने के कारण उनकी सलाह पर जयराज ने सिनेमा की चकाचौंध भरी दुनिया में कदम रखा।
उन्होंने दादा साहेब फाल्के के साथ मूक फिल्मों में काम की शुरुआत की और लगभग 11 साइलेंट फिल्मों में अभिनय किया। कैमरा और एडिटिंग — सिनेमा के हर पहलू में उनकी गहरी रुचि थी। बतौर सहायक निर्देशक काम करने के बाद उनकी पहली निर्देशित फिल्म 'प्रतिभा' रही।
मुख्य फिल्मी सफर
बतौर अभिनेता उन्हें पहला ब्रेक 1929 की फिल्म 'जगमगाती जवानी' से मिला। उसी वर्ष नायक के रूप में उनकी पहली फिल्म 'रसीली रानी' प्रदर्शित हुई। 1932 में उनकी पहली बोलती फिल्म 'शिकारी' आई, जिसमें उन्होंने एक बौद्ध भिक्षु की भूमिका निभाई और सांप, बाघ तथा शेर जैसे हिंसक जानवरों के साथ दृश्य फिल्माए गए।
अपने पूरे करियर में उन्होंने लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से 160 फिल्मों में वे नायक की भूमिका में थे। तेलुगु भाषी होते हुए भी उन्होंने हिंदी, गुजराती और मराठी फिल्मों में समान दक्षता से काम किया। 'बादबान', 'हातिम ताई', 'परदेसी' और 'रजिया सुल्तान' उनकी प्रमुख फिल्मों में शामिल हैं।
ऐतिहासिक किरदारों का बेताज बादशाह
हिंदी सिनेमा में सबसे अधिक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक नायकों को पर्दे पर जीवंत करने का कीर्तिमान पी. जयराज के नाम दर्ज है। 1950 और 1960 के दशक में उन्होंने अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, शाहजहाँ, टीपू सुल्तान और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे दिग्गज किरदारों को अपनी अभिनय प्रतिभा से जीवंत किया। गौरतलब है कि वे एक बेहतरीन घुड़सवार भी थे, जो इन ऐतिहासिक भूमिकाओं को और विश्वसनीय बनाता था। बतौर नायक उनकी अंतिम फिल्म 'खूनी कौन, मुजरिम कौन' 1965 में प्रदर्शित हुई। इंडो-रशियन फिल्म 'परदेसी' में भी उन्होंने यादगार अभिनय किया।
जब 'सागर' ने डुबो दी सारी पूंजी
निर्माता के रूप में जयराज ने 1951 में लॉर्ड टेनीसन की कृति 'इनोच आर्डन' पर आधारित फिल्म 'सागर' का निर्माण किया, जिसमें नरगिस और भारत भूषण मुख्य भूमिकाओं में थे। यह फिल्म उनके जीवन का सबसे बड़ा झटका साबित हुई — इस प्रोडक्शन में उन्होंने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी खो दी। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी और दोबारा अभिनय की राह पकड़ी, जिससे वे अपना सब कुछ पुनः अर्जित करने में सफल रहे।
विरासत और सम्मान
लगभग 70 वर्षों के अटूट फिल्मी सफर के लिए गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराने वाले पी. जयराज को 1980 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया — वही दादा साहेब, जिनके साथ उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। 11 अगस्त 2000 को 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। भारतीय सिनेमा की जड़ों से लेकर आधुनिक युग तक फैला उनका सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।