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पी. जयराज: 70 साल के फिल्मी सफर का गिनीज़ रिकॉर्ड, जब 'सागर' ने डुबो दी थी सारी जमा पूंजी

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पी. जयराज: 70 साल के फिल्मी सफर का गिनीज़ रिकॉर्ड, जब 'सागर' ने डुबो दी थी सारी जमा पूंजी

सारांश

मूक फिल्मों के दौर से शुरू होकर 70 साल तक रुपहले पर्दे पर राज करने वाले पी. जयराज का सफर सिर्फ रिकॉर्ड नहीं, एक मिसाल है। 1951 में 'सागर' ने उनकी सारी पूंजी डुबो दी, फिर भी उन्होंने वापसी की — और इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया।

मुख्य बातें

जयराज का जन्म 28 सितंबर 1909 को करीमनगर, तेलंगाना में हुआ था।
उन्होंने लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें 160 में नायक की भूमिका रही।
70 वर्षों के सक्रिय करियर के लिए गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज।
1951 में निर्मित फिल्म 'सागर' में उन्होंने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी गँवा दी।
1980 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित; 11 अगस्त 2000 को 91 वर्ष की आयु में निधन।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में पी. जयराज एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने मूक फिल्मों के युग से अपनी यात्रा शुरू की और सात दशकों तक रुपहले पर्दे पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। 28 सितंबर 1909 को तेलंगाना के करीमनगर में जन्मे जयराज का नाम आज भी गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है — लगभग 70 वर्षों के सक्रिय फिल्मी करियर के लिए। 1980 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया।

शेक्सपियर से सिल्वर स्क्रीन तक

निजाम कॉलेज में पढ़ाई के दौरान जयराज अक्सर शेक्सपियर के नाटकों में भाग लेते थे। उनका परिवार समृद्ध था — उनके मामा की शादी著名 स्वतंत्रता सेनानी सरोजनी नायडू से हुई थी और पिता एक उच्च सरकारी पद पर आसीन थे। पड़ोसियों के फिल्म जगत से जुड़े होने के कारण उनकी सलाह पर जयराज ने सिनेमा की चकाचौंध भरी दुनिया में कदम रखा।

उन्होंने दादा साहेब फाल्के के साथ मूक फिल्मों में काम की शुरुआत की और लगभग 11 साइलेंट फिल्मों में अभिनय किया। कैमरा और एडिटिंग — सिनेमा के हर पहलू में उनकी गहरी रुचि थी। बतौर सहायक निर्देशक काम करने के बाद उनकी पहली निर्देशित फिल्म 'प्रतिभा' रही।

मुख्य फिल्मी सफर

बतौर अभिनेता उन्हें पहला ब्रेक 1929 की फिल्म 'जगमगाती जवानी' से मिला। उसी वर्ष नायक के रूप में उनकी पहली फिल्म 'रसीली रानी' प्रदर्शित हुई। 1932 में उनकी पहली बोलती फिल्म 'शिकारी' आई, जिसमें उन्होंने एक बौद्ध भिक्षु की भूमिका निभाई और सांप, बाघ तथा शेर जैसे हिंसक जानवरों के साथ दृश्य फिल्माए गए।

अपने पूरे करियर में उन्होंने लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से 160 फिल्मों में वे नायक की भूमिका में थे। तेलुगु भाषी होते हुए भी उन्होंने हिंदी, गुजराती और मराठी फिल्मों में समान दक्षता से काम किया। 'बादबान', 'हातिम ताई', 'परदेसी' और 'रजिया सुल्तान' उनकी प्रमुख फिल्मों में शामिल हैं।

ऐतिहासिक किरदारों का बेताज बादशाह

हिंदी सिनेमा में सबसे अधिक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक नायकों को पर्दे पर जीवंत करने का कीर्तिमान पी. जयराज के नाम दर्ज है। 1950 और 1960 के दशक में उन्होंने अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, शाहजहाँ, टीपू सुल्तान और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे दिग्गज किरदारों को अपनी अभिनय प्रतिभा से जीवंत किया। गौरतलब है कि वे एक बेहतरीन घुड़सवार भी थे, जो इन ऐतिहासिक भूमिकाओं को और विश्वसनीय बनाता था। बतौर नायक उनकी अंतिम फिल्म 'खूनी कौन, मुजरिम कौन' 1965 में प्रदर्शित हुई। इंडो-रशियन फिल्म 'परदेसी' में भी उन्होंने यादगार अभिनय किया।

जब 'सागर' ने डुबो दी सारी पूंजी

निर्माता के रूप में जयराज ने 1951 में लॉर्ड टेनीसन की कृति 'इनोच आर्डन' पर आधारित फिल्म 'सागर' का निर्माण किया, जिसमें नरगिस और भारत भूषण मुख्य भूमिकाओं में थे। यह फिल्म उनके जीवन का सबसे बड़ा झटका साबित हुई — इस प्रोडक्शन में उन्होंने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी खो दी। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी और दोबारा अभिनय की राह पकड़ी, जिससे वे अपना सब कुछ पुनः अर्जित करने में सफल रहे।

विरासत और सम्मान

लगभग 70 वर्षों के अटूट फिल्मी सफर के लिए गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराने वाले पी. जयराज को 1980 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया — वही दादा साहेब, जिनके साथ उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। 11 अगस्त 2000 को 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। भारतीय सिनेमा की जड़ों से लेकर आधुनिक युग तक फैला उनका सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

गुजराती और मराठी सिनेमा में समान दक्षता से काम करना उस दौर की भाषाई लचीलेपन की मिसाल है जो आज दुर्लभ है। 'सागर' की विफलता और उसके बाद की वापसी यह भी रेखांकित करती है कि स्वतंत्र निर्माण का जोखिम उस युग में भी उतना ही वास्तविक था — बिना किसी स्टूडियो सुरक्षा जाल के। उनकी विरासत आज के ओटीटी युग में भी प्रासंगिक है, जब 'लंबे करियर' की परिभाषा ही बदल रही है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पी. जयराज कौन थे और उन्हें क्यों याद किया जाता है?
पी. जयराज भारतीय सिनेमा के अग्रणी अभिनेता, निर्माता और निर्देशक थे, जिन्होंने मूक फिल्मों के दौर से लेकर आधुनिक सिनेमा तक लगभग 70 वर्षों तक सक्रिय रहकर गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया। 1980 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पी. जयराज ने 'सागर' फिल्म में अपनी पूंजी क्यों गँवाई?
'सागर' (1951) लॉर्ड टेनीसन की कृति 'इनोच आर्डन' पर आधारित थी, जिसे जयराज ने स्वयं निर्मित किया था। फिल्म व्यावसायिक रूप से विफल रही और इस प्रोडक्शन में उनकी जीवनभर की जमा पूंजी डूब गई, जिसके बाद उन्हें दोबारा अभिनय की राह अपनानी पड़ी।
पी. जयराज ने किन प्रमुख ऐतिहासिक किरदारों को निभाया?
पी. जयराज ने अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, शाहजहाँ, टीपू सुल्तान और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे दिग्गज ऐतिहासिक किरदारों को पर्दे पर जीवंत किया। हिंदी सिनेमा में सर्वाधिक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक नायकों को निभाने का कीर्तिमान उन्हीं के नाम है।
पी. जयराज का गिनीज़ रिकॉर्ड किस बात के लिए है?
पी. जयराज का नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में लगभग 70 वर्षों तक फिल्मों में सक्रिय रहने के लिए दर्ज है — यह किसी भी भारतीय अभिनेता का सबसे लंबा ज्ञात फिल्मी करियर माना जाता है।
पी. जयराज का निधन कब हुआ और उनकी अंतिम फिल्म कौन सी थी?
पी. जयराज का निधन 11 अगस्त 2000 को 91 वर्ष की आयु में हुआ। बतौर नायक उनकी अंतिम फिल्म 'खूनी कौन, मुजरिम कौन' 1965 में प्रदर्शित हुई थी।
राष्ट्र प्रेस
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