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पंडित मुखराम शर्मा: जिनके नाम पर चलती थीं फिल्में, पोस्टर पर छपता था उनका नाम

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पंडित मुखराम शर्मा: जिनके नाम पर चलती थीं फिल्में, पोस्टर पर छपता था उनका नाम

सारांश

एक ऐसा दौर जब लेखक की कलम ही फिल्म का ब्रांड हुआ करती थी — पंडित मुखराम शर्मा का नाम पोस्टर पर सफलता की मोहर था। मेरठ के एक शिक्षक से हिंदी सिनेमा के सबसे सम्मानित कहानीकार तक का उनका सफर, भारतीय सिनेमा के उस स्वर्णिम अध्याय की याद दिलाता है।

मुख्य बातें

पंडित मुखराम शर्मा का जन्म 30 मई 1909 को मेरठ जिले के गाँव पूठी में हुआ था।
उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि फिल्म पोस्टर पर 'पंडित मुखराम शर्मा की फिल्म' लिखा जाता था।
1959 में यश चोपड़ा की पहली निर्देशित फिल्म 'धूल का फूल' की कहानी, पटकथा व संवाद उन्होंने लिखे।
'औलाद' , 'वचन' और 'साधना' के लिए उन्हें तीन फिल्मफेयर पुरस्कार मिले।
उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
70 वर्ष की आयु के बाद उन्होंने स्वयं फिल्म इंडस्ट्री से दूरी बनाने का संकल्प लिया और उसे निभाया।

पंडित मुखराम शर्मा हिंदी सिनेमा के उस दुर्लभ लेखक थे जिनकी पहचान पर्दे के पीछे नहीं, बल्कि फिल्म के पोस्टर पर बड़े अक्षरों में दर्ज होती थी — 'पंडित मुखराम शर्मा की फिल्म'। एक ऐसे दौर में जब हिंदी सिनेमा में कहानीकार को श्रेय देना असामान्य था, शर्मा का नाम किसी फिल्म की सफलता की अनकही गारंटी माना जाता था। 30 मई 1909 को जन्मे इस लेखक की विरासत आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक विशेष अध्याय है।

प्रारंभिक जीवन और सिनेमा की ओर रुझान

पंडित मुखराम शर्मा का जन्म 30 मई 1909 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के परीक्षितगढ़ क्षेत्र के गाँव पूठी में हुआ था। हिंदी और संस्कृत के प्रकांड जानकार शर्मा ने पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरठ में शिक्षक के रूप में अपना करियर शुरू किया। लेकिन उनका मन कहानियों और कविताओं की दुनिया में रमता था — और धीरे-धीरे फिल्मों के लिए लिखने का सपना उनके भीतर पकने लगा।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

1939 में शर्मा अपने परिवार के साथ मुंबई पहुँचे, लेकिन शुरुआती दिन कठिन रहे। काम न मिलने पर वे पुणे चले गए, जहाँ मशहूर फिल्मकार वी. शांताराम की प्रभात फिल्म कंपनी में उन्होंने कलाकारों को हिंदी उच्चारण सिखाने का काम किया। मामूली वेतन पर की गई यह नौकरी उनके फिल्मी जीवन की नींव बनी।

1942 में फिल्म 'दस बजे' के लिए गीत और संवाद लिखने का अवसर मिला — यह उनका पहला बड़ा ब्रेक था। फिल्म की सफलता के बाद काम का सिलसिला थमा नहीं। 'विष्णु भगवान', 'नल-दमयंती', 'औलाद', 'एक ही रास्ता', 'साधना', 'धूल का फूल', 'वचन', 'संतान' और 'अभिमान' जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के शीर्ष लेखकों में स्थापित कर दिया।

यश चोपड़ा की पहली फिल्म और दक्षिण के बैनर

1959 में रिलीज़ हुई 'धूल का फूल' उनके करियर की एक ऐतिहासिक कड़ी रही। यह यश चोपड़ा की बतौर निर्देशक पहली फिल्म थी, और इसकी कहानी, पटकथा व संवाद पंडित मुखराम शर्मा की कलम से निकले थे। इसके अलावा उन्होंने दक्षिण भारत के बड़े निर्माण बैनरों के लिए भी कई सफल हिंदी फिल्में लिखीं — 'घराना', 'गृहस्थी', 'हमजोली', 'जीने की राह' और 'राजा और रंक' उनमें प्रमुख हैं।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में हुआ जब हिंदी और दक्षिण भारतीय सिनेमा के बीच सहयोग अभी अपने शुरुआती चरण में था। शर्मा की पारिवारिक और सामाजिक कथाओं की पकड़ ने उन्हें क्षेत्रीय सीमाओं से परे लोकप्रिय बनाया।

लेखन की विशेषता और सम्मान

शर्मा की सबसे बड़ी ताकत उनकी आम जन से जुड़ी कहानियाँ थीं — पारिवारिक रिश्ते, सामाजिक द्वंद्व और भावनात्मक सच्चाई। दर्शक उनके पात्रों में अपनी ज़िंदगी की परछाईं देखते थे। उनके इस योगदान को फिल्म जगत ने भी स्वीकार किया — 'औलाद', 'वचन' और 'साधना' के लिए उन्हें तीन फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। इसके साथ ही उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।

सादगी और विदाई

इतनी सफलता और ख्याति के बावजूद पंडित मुखराम शर्मा का जीवन बेहद सादा रहा। उन्होंने स्वयं तय किया था कि 70 वर्ष की आयु के बाद वे फिल्म इंडस्ट्री से दूरी बना लेंगे — और उन्होंने अपना यह संकल्प निभाया। आज जब हिंदी सिनेमा में लेखकों के अधिकारों और पहचान की बात होती है, तो पंडित मुखराम शर्मा का नाम उस गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है जब एक कलमकार की पहचान पर्दे पर नहीं, पोस्टर पर होती थी।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब भी पटकथा लेखकों के अधिकार और श्रेय का सवाल अनुत्तरित है। शर्मा का वह दौर एक अपवाद था, नियम नहीं — और यही इसे और भी उल्लेखनीय बनाता है। उनकी विरासत आज की फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक आईना है।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित मुखराम शर्मा कौन थे?
पंडित मुखराम शर्मा हिंदी सिनेमा के प्रख्यात कहानी, पटकथा और संवाद लेखक थे, जिनका जन्म 30 मई 1909 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हुआ था। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि फिल्मों के पोस्टर पर 'पंडित मुखराम शर्मा की फिल्म' लिखा जाता था।
पंडित मुखराम शर्मा को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
'औलाद', 'वचन' और 'साधना' फिल्मों के लिए उन्हें तीन फिल्मफेयर पुरस्कार दिए गए। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
यश चोपड़ा की पहली फिल्म में पंडित मुखराम शर्मा की क्या भूमिका थी?
1959 में रिलीज़ हुई 'धूल का फूल' यश चोपड़ा की बतौर निर्देशक पहली फिल्म थी, और इसकी कहानी, पटकथा व संवाद पंडित मुखराम शर्मा ने लिखे थे। यह फिल्म उनके करियर की महत्वपूर्ण कृतियों में से एक मानी जाती है।
पंडित मुखराम शर्मा ने फिल्मी करियर की शुरुआत कैसे की?
1939 में मुंबई आने के बाद संघर्ष के दौरान वे पुणे गए, जहाँ वी. शांताराम की प्रभात फिल्म कंपनी में कलाकारों को हिंदी उच्चारण सिखाने का काम किया। 1942 में फिल्म 'दस बजे' के लिए गीत और संवाद लिखकर उन्होंने पहली बड़ी पहचान बनाई।
पंडित मुखराम शर्मा ने फिल्म इंडस्ट्री कब छोड़ी?
उन्होंने स्वयं तय किया था कि 70 वर्ष की आयु के बाद वे फिल्म इंडस्ट्री से दूरी बना लेंगे, और उन्होंने यह संकल्प निभाया। इतनी सफलता और ख्याति के बावजूद उनका जीवन सादगीपूर्ण रहा।
राष्ट्र प्रेस
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