दमोह विवाद: MP उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल का ऐलान — सरकारी मेडिकल कॉलेज पीपीपी मॉडल पर नहीं देंगे
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने 24 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के धन से निर्मित या निर्माणाधीन किसी भी मेडिकल कॉलेज को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत निजी संस्थाओं को नहीं सौंपा जाएगा। उनका यह बयान दमोह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल को पीपीपी मॉडल पर संचालित करने के कथित प्रस्ताव को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर ही उठे विरोध की पृष्ठभूमि में आया है।
उपमुख्यमंत्री का स्पष्ट रुख
स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे राजेंद्र शुक्ल ने कहा, 'राज्य सरकार की ओर से बनाए गए या राज्य सरकार के पैसे से बनाए जा रहे मेडिकल कॉलेजों का संचालन और रखरखाव राज्य सरकार ही करेगी। इन मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल के तहत संचालन के लिए नहीं दिया जाएगा।' यह बयान उन अटकलों पर विराम लगाने का प्रयास है जो दमोह कॉलेज के प्रस्तावित प्रबंधन को लेकर पिछले कुछ समय से चल रही थीं।
दमोह मेडिकल कॉलेज विवाद की पृष्ठभूमि
BJP के वरिष्ठ नेता और दमोह विधायक जयंत मलैया ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाया। उन्होंने बताया कि उन्होंने हाल ही में मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात कर अनुरोध किया कि दमोह मेडिकल कॉलेज का संचालन सरकार स्वयं करे और इसे किसी निजी संस्था को न सौंपा जाए।
मलैया के अनुसार, इस कॉलेज का निर्माण लगभग पूर्ण हो चुका है और अब तक इस पर ₹350 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त 30 एकड़ भूमि उपलब्ध है और उपकरण व फर्नीचर के लिए करीब ₹45-46 करोड़ के टेंडर भी फाइनल किए जा चुके हैं।
BJP के भीतर से उठा सवाल
मलैया ने सीधे शब्दों में पूछा, 'जनता के पैसे से बना कॉलेज निजी मुनाफे का केंद्र क्यों बने? दमोह की जनता महंगी फीस और महंगे इलाज का बोझ क्यों उठाए?' उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि मध्य प्रदेश सरकार को यह जवाब देना चाहिए कि सरकारी संस्थान को निजी हाथों में सौंपने का फैसला आखिर किसके हित में है।
गौरतलब है कि यह विरोध विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ BJP के भीतर से ही उठा — जो इस मुद्दे की राजनीतिक संवेदनशीलता को रेखांकित करता है।
आम जनता पर असर
दमोह और आसपास के जिलों में उच्च चिकित्सा शिक्षा और विशेष स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच अब भी सीमित है। यह कॉलेज इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए विकसित किया जा रहा था। पीपीपी मॉडल लागू होने की स्थिति में शुल्क-संरचना प्रभावित होने की आशंका स्थानीय स्तर पर जताई जा रही थी, जिसे अब उपमुख्यमंत्री के बयान से कुछ राहत मिली है।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गया है जब मध्य प्रदेश सरकार राज्य में मेडिकल कॉलेजों का नेटवर्क लगातार विस्तारित कर रही है — विशेषकर उन जिलों में जहाँ चिकित्सा सुविधाएँ अपर्याप्त रही हैं।
आगे की दिशा
उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल के स्पष्ट बयान के बाद यह तय माना जा रहा है कि दमोह मेडिकल कॉलेज सरकारी प्रबंधन के तहत ही संचालित होगा। अब देखना यह होगा कि सरकार इस कॉलेज के शीघ्र परिचालन के लिए चिकित्सा संकाय और बुनियादी ढाँचे की व्यवस्था कब तक पूरी करती है, ताकि दमोह क्षेत्र के छात्रों और मरीजों को इसका वास्तविक लाभ मिल सके।