24 सितंबर 2026
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दमोह विवाद: MP उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल का ऐलान — सरकारी मेडिकल कॉलेज पीपीपी मॉडल पर नहीं देंगे

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दमोह विवाद: MP उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल का ऐलान — सरकारी मेडिकल कॉलेज पीपीपी मॉडल पर नहीं देंगे

सारांश

दमोह मेडिकल कॉलेज पर ₹350 करोड़ खर्च के बाद भी पीपीपी मॉडल का प्रस्ताव BJP के भीतर से ही टकराव का कारण बना। उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना पड़ा कि सरकारी कॉलेज निजी हाथों में नहीं जाएंगे — यह सत्तारूढ़ दल की आंतरिक दरार और जन-स्वास्थ्य पर बड़े राजनीतिक दबाव को उजागर करता है।

मुख्य बातें

MP उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने 24 सितंबर 2026 को घोषित किया कि राज्य सरकार के पैसों से बने मेडिकल कॉलेज पीपीपी मॉडल पर नहीं दिए जाएंगे।
दमोह मेडिकल कॉलेज पर अब तक ₹350 करोड़ खर्च हो चुके हैं; 30 एकड़ भूमि उपलब्ध और ₹45-46 करोड़ के टेंडर फाइनल।
विरोध BJP के अपने वरिष्ठ नेता और दमोह विधायक जयंत मलैया ने उठाया, जिन्होंने CM मोहन यादव से भी मुलाकात की।
मलैया ने सवाल उठाया कि जनता के पैसे से बना संस्थान निजी मुनाफे का केंद्र क्यों बने।
मध्य प्रदेश सरकार राज्य में मेडिकल कॉलेजों का नेटवर्क विस्तारित कर रही है, विशेषकर उन जिलों में जहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित हैं।

मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने 24 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के धन से निर्मित या निर्माणाधीन किसी भी मेडिकल कॉलेज को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत निजी संस्थाओं को नहीं सौंपा जाएगा। उनका यह बयान दमोह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल को पीपीपी मॉडल पर संचालित करने के कथित प्रस्ताव को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर ही उठे विरोध की पृष्ठभूमि में आया है।

उपमुख्यमंत्री का स्पष्ट रुख

स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे राजेंद्र शुक्ल ने कहा, 'राज्य सरकार की ओर से बनाए गए या राज्य सरकार के पैसे से बनाए जा रहे मेडिकल कॉलेजों का संचालन और रखरखाव राज्य सरकार ही करेगी। इन मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल के तहत संचालन के लिए नहीं दिया जाएगा।' यह बयान उन अटकलों पर विराम लगाने का प्रयास है जो दमोह कॉलेज के प्रस्तावित प्रबंधन को लेकर पिछले कुछ समय से चल रही थीं।

दमोह मेडिकल कॉलेज विवाद की पृष्ठभूमि

BJP के वरिष्ठ नेता और दमोह विधायक जयंत मलैया ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाया। उन्होंने बताया कि उन्होंने हाल ही में मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात कर अनुरोध किया कि दमोह मेडिकल कॉलेज का संचालन सरकार स्वयं करे और इसे किसी निजी संस्था को न सौंपा जाए।

मलैया के अनुसार, इस कॉलेज का निर्माण लगभग पूर्ण हो चुका है और अब तक इस पर ₹350 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त 30 एकड़ भूमि उपलब्ध है और उपकरण व फर्नीचर के लिए करीब ₹45-46 करोड़ के टेंडर भी फाइनल किए जा चुके हैं।

BJP के भीतर से उठा सवाल

मलैया ने सीधे शब्दों में पूछा, 'जनता के पैसे से बना कॉलेज निजी मुनाफे का केंद्र क्यों बने? दमोह की जनता महंगी फीस और महंगे इलाज का बोझ क्यों उठाए?' उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि मध्य प्रदेश सरकार को यह जवाब देना चाहिए कि सरकारी संस्थान को निजी हाथों में सौंपने का फैसला आखिर किसके हित में है।

गौरतलब है कि यह विरोध विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ BJP के भीतर से ही उठा — जो इस मुद्दे की राजनीतिक संवेदनशीलता को रेखांकित करता है।

आम जनता पर असर

दमोह और आसपास के जिलों में उच्च चिकित्सा शिक्षा और विशेष स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच अब भी सीमित है। यह कॉलेज इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए विकसित किया जा रहा था। पीपीपी मॉडल लागू होने की स्थिति में शुल्क-संरचना प्रभावित होने की आशंका स्थानीय स्तर पर जताई जा रही थी, जिसे अब उपमुख्यमंत्री के बयान से कुछ राहत मिली है।

यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गया है जब मध्य प्रदेश सरकार राज्य में मेडिकल कॉलेजों का नेटवर्क लगातार विस्तारित कर रही है — विशेषकर उन जिलों में जहाँ चिकित्सा सुविधाएँ अपर्याप्त रही हैं।

आगे की दिशा

उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल के स्पष्ट बयान के बाद यह तय माना जा रहा है कि दमोह मेडिकल कॉलेज सरकारी प्रबंधन के तहत ही संचालित होगा। अब देखना यह होगा कि सरकार इस कॉलेज के शीघ्र परिचालन के लिए चिकित्सा संकाय और बुनियादी ढाँचे की व्यवस्था कब तक पूरी करती है, ताकि दमोह क्षेत्र के छात्रों और मरीजों को इसका वास्तविक लाभ मिल सके।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह इस तथ्य को नहीं छुपा सकता कि पीपीपी का प्रस्ताव कहीं न कहीं शासन-तंत्र के भीतर से ही उभरा था — अन्यथा BJP विधायक को मुख्यमंत्री के दरवाजे तक जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ₹350 करोड़ के सार्वजनिक निवेश के बाद निजी प्रबंधन का विचार इस बड़े राष्ट्रीय प्रश्न को जीवंत करता है कि सरकारी स्वास्थ्य अवसंरचना का उद्देश्य सेवा है या संपत्ति। बिना पारदर्शी जवाबदेही के, यह स्पष्टीकरण भविष्य में किसी दूसरे कॉलेज पर ऐसे प्रस्तावों को नहीं रोक सकता।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी मॉडल पर देने से क्यों इनकार किया?
उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने स्पष्ट किया कि राज्य के धन से निर्मित संस्थानों का संचालन सरकार स्वयं करेगी। यह फैसला दमोह मेडिकल कॉलेज को पीपीपी मॉडल पर देने के कथित प्रस्ताव के विरुद्ध BJP के भीतर से ही उठे विरोध के बाद आया।
दमोह मेडिकल कॉलेज पर अब तक कितना खर्च हो चुका है?
दमोह विधायक जयंत मलैया के अनुसार, इस कॉलेज पर अब तक ₹350 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त 30 एकड़ भूमि उपलब्ध है और उपकरण व फर्नीचर के लिए करीब ₹45-46 करोड़ के टेंडर भी फाइनल हो चुके हैं।
BJP विधायक जयंत मलैया ने इस विवाद में क्या भूमिका निभाई?
दमोह विधायक जयंत मलैया ने मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात कर दमोह कॉलेज का संचालन सरकार द्वारा किए जाने का अनुरोध किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि जनता के पैसे से बना संस्थान निजी मुनाफे का केंद्र क्यों बनाया जाए।
पीपीपी मॉडल लागू होने पर दमोह के मरीजों और छात्रों पर क्या असर पड़ता?
आशंका थी कि पीपीपी मॉडल लागू होने से शुल्क-संरचना और इलाज की लागत प्रभावित हो सकती थी। दमोह और आसपास के जिलों में पहले से ही उच्च चिकित्सा शिक्षा और विशेष स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सीमित है, इसलिए महंगी सेवाएँ स्थानीय जनता पर अतिरिक्त बोझ डालतीं।
क्या MP में अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों पर भी यह नीति लागू होगी?
उपमुख्यमंत्री शुक्ल ने अपने बयान में 'राज्य सरकार द्वारा बनाए गए या बनाए जा रहे' सभी मेडिकल कॉलेजों का उल्लेख किया, जिससे यह नीति केवल दमोह तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश सरकार अभी राज्य में नए मेडिकल कॉलेजों का नेटवर्क विस्तारित कर रही है।
राष्ट्र प्रेस
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