मध्य प्रदेश के 9 सरकारी मेडिकल कॉलेज निजीकरण के कगार पर, माकपा ने मोहन यादव सरकार पर लगाए गंभीर आरोप
सारांश
मुख्य बातें
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने 17 सितंबर 2026 को मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य के नौ सरकारी मेडिकल कॉलेज निजी हाथों में सौंपे जाने की तैयारी चल रही है। इन कॉलेजों के निर्माण और संसाधन जुटाने पर सरकारी खजाने से ₹4,000 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं।
मुख्य आरोप और प्रभावित कॉलेज
माकपा के राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने बताया कि जिन नौ मेडिकल कॉलेजों को निजी हाथों में सौंपने की कोशिश हो रही है, उनमें नीमच, सिंगरौली, श्योपुर, मंडला, राजगढ़, बुदनी, दमोह और छतरपुर के मेडिकल कॉलेज शामिल हैं। उनके अनुसार, इन संस्थानों के निर्माण और संसाधन संग्रहण पर ₹4,000 करोड़ से अधिक का सार्वजनिक धन लगाया जा चुका है।
जसविंदर सिंह ने कहा कि हाल ही में बालाघाट में ढाई दर्जन से अधिक आदिवासी बच्चों की मृत्यु, शिवपुरी और रीवा अस्पतालों में दर्दनाक मौतों ने सरकार की संवेदनहीनता और सरकारी स्वास्थ्य ढाँचे की खामियों को उजागर कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कमियों को दूर करने, चिकित्सकों के रिक्त पदों को भरने और अस्पतालों को सुविधासंपन्न बनाने के बजाय सरकार पूरे सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे को ही निजी हाथों में सौंपने पर उतारू है।
पूर्व की कोशिशें और जनता का विरोध
माकपा नेता ने याद दिलाया कि यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने इस तरह का प्रयास किया हो। उनके अनुसार, मोहन यादव सरकार बनते ही 11 जिला अस्पतालों को पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) मोड पर चलाने की घोषणा की गई थी, लेकिन जनता के व्यापक विरोध के कारण सरकार को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा था।
इससे भी पहले, शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने 2021 में वर्तमान मुख्यमंत्री के गृहनगर उज्जैन के मेडिकल कॉलेज को पीपीपी मोड पर चलाने की कोशिश की थी — वह प्रयास भी विरोध के कारण रद्द करना पड़ा था। इसके अलावा, कुछ महीने पहले ही सरकार ने तीन जिलों के 19 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण का निर्णय लिया है, जिसका लगातार विरोध जारी है।
कोविड का हवाला और निजी क्षेत्र पर सवाल
जसविंदर सिंह ने कोविड महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि उस संकट के दौरान अधिकांश निजी नर्सिंग होम या तो बंद हो गए थे या मरीजों से मनमाने दाम वसूल रहे थे। उन्होंने कहा कि तब सरकारी अस्पतालों ने ही प्रदेश की जनता को महामारी से बचाया था। उनके अनुसार, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करना जनता के जीवन को ही दाँव पर लगाने के समान है।
आम जनता पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब मध्य प्रदेश के आदिवासी और ग्रामीण बहुल ज़िलों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच पहले से ही सीमित है। नीमच, मंडला, श्योपुर जैसे ज़िलों में, जहाँ ये नए कॉलेज बने हैं, सरकारी स्वास्थ्य सुविधा ही गरीब और ग्रामीण वर्ग की एकमात्र उम्मीद है। निजीकरण की स्थिति में इन तबकों के लिए इलाज की लागत बढ़ने की आशंका है।
सरकार की स्थिति और आगे की राह
गौरतलब है कि अभी तक मोहन यादव सरकार की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। माकपा ने माँग की है कि निजीकरण की इस कथित योजना को तत्काल रद्द किया जाए और रिक्त चिकित्सक पदों को भरकर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जाए। अगर सरकार इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट नहीं करती, तो विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों के विरोध के और तेज होने की संभावना है।