26 अगस्त 2026
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मध्य प्रदेश में खसरे का प्रकोप: माकपा ने मोहन यादव सरकार पर लगाया आपराधिक लापरवाही का आरोप

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मध्य प्रदेश में खसरे का प्रकोप: माकपा ने मोहन यादव सरकार पर लगाया आपराधिक लापरवाही का आरोप

सारांश

मध्य प्रदेश में खसरे का प्रकोप फैलते देख माकपा ने मोहन यादव सरकार पर निशाना साधा है। स्वास्थ्य विभाग के अपने आँकड़े बताते हैं कि तीन साल में मामले बढ़े हैं। भोपाल से लेकर आदिवासी इलाकों तक फैली बीमारी ने टीकाकरण के सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मुख्य बातें

माकपा राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने 26 अगस्त को मोहन यादव सरकार पर खसरे के प्रकोप को लेकर आपराधिक लापरवाही का आरोप लगाया।
स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों के अनुसार पिछले तीन वर्षों में खसरे के मरीज़ों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ी है।
उत्तरी मध्य प्रदेश और राजधानी भोपाल दोनों प्रकोप की चपेट में हैं; आदिवासी क्षेत्रों में स्थिति अधिक गंभीर होने की आशंका।
जिन क्षेत्रों में टीकाकरण 90% से कम है, वहाँ विशेष अभियान न चलाना सरकार की बड़ी चूक बताई गई।
माकपा ने व्यापक टीकाकरण अभियान, रोकथाम उपाय और बीमार बच्चों के उपचार की माँग की है।

मध्य प्रदेश में खसरे का प्रकोप तेज़ी से फैलने के बीच मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने 26 अगस्त को राज्य की मोहन यादव सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 'बीमारू प्रदेश से विकसित प्रदेश' बनाने के दावे बच्चों की जान पर पड़ रहे इस संकट के सामने खोखले साबित हो रहे हैं।

माकपा का आरोप: दो स्तरीय आपराधिक लापरवाही

माकपा के राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने एक बयान में कहा कि पूरे प्रदेश में एक साथ खसरे के प्रकोप ने मासूम बच्चों को अपनी चपेट में ले लिया है। उनके अनुसार, इस स्थिति से सरकार की दो तरह की आपराधिक लापरवाही उजागर होती है — पहली, टीकाकरण कार्यक्रम की विफलता; और दूसरी, स्वास्थ्य ढाँचे का जर्जर होना।

सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के अपने आँकड़ों के अनुसार पिछले तीन वर्षों में खसरे के मरीज़ों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है, जिससे स्पष्ट है कि सरकारी टीकाकरण अभियान कागज़ों तक सीमित रहा है।

उत्तरी मध्य प्रदेश से भोपाल तक फैला संकट

माकपा नेता ने कहा कि यदि तुलनात्मक रूप से विकसित माने जाने वाले उत्तरी मध्य प्रदेश में खसरा सबसे अधिक पाँव पसार रहा है और राजधानी भोपाल भी इसकी चपेट में है, तो आदिवासी क्षेत्रों की स्थिति कहीं अधिक भयावह होगी। उनके अनुसार, कुपोषण के कारण आदिवासी और गरीब बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता पहले से कमज़ोर होती है, जिससे वे बीमारी का पहला शिकार बनते हैं।

टीकाकरण की खामियाँ और स्वास्थ्य ढाँचे की कमज़ोरी

जसविंदर सिंह के अनुसार, जिन क्षेत्रों में टीकाकरण 90 प्रतिशत से कम होता है, वहाँ विशेष अभियान चलाने की ज़रूरत होती है, लेकिन सरकार 'कागज़ी खानापूरी' को ही अभियान की सफलता मान लेती है। उन्होंने यह भी कहा कि बारिश के मौसम में खसरे के साथ-साथ हैजा, उल्टी-दस्त और मलेरिया जैसी बीमारियाँ भी फैलती हैं, और सरकार को इनकी रोकथाम के लिए पहले से तैयारी करनी होती है — जो इस बार नहीं हुई।

माकपा का कहना है कि प्रभावित क्षेत्रों में अब तक युद्धस्तरीय अभियान चलाकर जाँच करने की कोई पहल नज़र नहीं आ रही है, जबकि स्वास्थ्य विभाग का पूरा ढाँचा चरमरा रहा है।

माकपा की माँगें

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने राज्य सरकार से तीन ठोस माँगें रखी हैं: खसरे के विरुद्ध व्यापक टीकाकरण अभियान चलाया जाए, बीमारी की रोकथाम के लिए समुचित व्यवस्था की जाए, और बीमार बच्चों के उपचार की पर्याप्त सुविधाएँ सुनिश्चित की जाएँ।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब मध्य प्रदेश में मानसून का मौसम चल रहा है और मौसमी बीमारियों का ख़तरा स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। गौरतलब है कि खसरा एक अत्यंत संक्रामक वायरल बीमारी है और कम टीकाकरण वाले क्षेत्रों में यह तेज़ी से फैल सकती है। यदि सरकार ने तत्काल कदम नहीं उठाए, तो आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अपने आँकड़े — जो तीन वर्षों में बढ़ते मामले दिखाते हैं — इस आलोचना को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल बनाते हैं। असली सवाल यह है कि जब 90% से कम टीकाकरण वाले क्षेत्रों की पहचान सरकार के पास है, तो विशेष अभियान क्यों नहीं चले। आदिवासी और कुपोषित बच्चों पर खसरे का असंगत बोझ एक पुरानी संरचनात्मक विफलता को उजागर करता है — जो किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि दशकों की उपेक्षा की देन है। मानसून के बीच युद्धस्तरीय अभियान की अनुपस्थिति, यदि सत्यापित हो, तो यह महज़ राजनीतिक चूक नहीं — सार्वजनिक स्वास्थ्य की विफलता है।
RashtraPress
26 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मध्य प्रदेश में खसरे का प्रकोप कितना गंभीर है?
स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों के अनुसार पिछले तीन वर्षों में खसरे के मरीज़ों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ी है। उत्तरी मध्य प्रदेश और राजधानी भोपाल दोनों प्रभावित हैं, और आदिवासी क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर होने की आशंका जताई जा रही है।
माकपा ने मोहन यादव सरकार पर क्या आरोप लगाए हैं?
माकपा राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने सरकार पर दो स्तरीय आपराधिक लापरवाही का आरोप लगाया है — टीकाकरण अभियान की विफलता और स्वास्थ्य ढाँचे का चरमराना। उनका कहना है कि सरकार कागज़ी खानापूरी को ही अभियान की सफलता मान लेती है।
आदिवासी बच्चों पर खसरे का अधिक खतरा क्यों है?
माकपा के अनुसार कुपोषण के कारण आदिवासी और गरीब बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है, जिससे वे खसरे जैसी संक्रामक बीमारियों का पहला शिकार बनते हैं। दूरदराज़ के इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी स्थिति को और जटिल बनाती है।
माकपा ने सरकार से क्या माँगें रखी हैं?
पार्टी ने तीन माँगें रखी हैं: खसरे के विरुद्ध व्यापक टीकाकरण अभियान, बीमारी की रोकथाम के लिए समुचित व्यवस्था, और बीमार बच्चों के उपचार की पर्याप्त सुविधाएँ। साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में युद्धस्तरीय जाँच अभियान चलाने की भी माँग की गई है।
बारिश के मौसम में खसरे के साथ और कौन-सी बीमारियाँ खतरनाक होती हैं?
माकपा नेता जसविंदर सिंह के अनुसार मानसून में खसरे के अलावा हैजा, उल्टी-दस्त और मलेरिया का भी प्रकोप बढ़ता है। इन सभी बीमारियों की रोकथाम के लिए बारिश से पहले विशेष स्वास्थ्य प्रबंध ज़रूरी होते हैं, जो इस बार नहीं किए गए।
राष्ट्र प्रेस
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