राज्यसभा में राघव चड्ढा का 'कट मनी' पर प्रहार: डॉक्टर-डायग्नोस्टिक सेंटर गठजोड़ से मरीजों का बिल 20% तक बढ़ता है
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने 6 अगस्त 2026 को संसद के शून्यकाल में कुछ डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच कथित 'कट मनी' यानी रेफरल कमीशन की व्यवस्था का मुद्दा उठाया और चेतावनी दी कि इस अनौपचारिक तंत्र का पूरा आर्थिक बोझ अंततः मरीजों पर पड़ता है। उनके अनुसार, इस व्यवस्था के कारण चिकित्सा खर्च 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
संसद में क्या कहा चड्ढा ने
चड्ढा ने राज्यसभा में कहा कि कुछ डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच एक समानांतर प्रोत्साहन अर्थव्यवस्था विकसित हो गई है, जिसमें मरीज को जांच के लिए रेफर करने पर डॉक्टर को ₹3,000 तक का कमीशन दिया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह भुगतान इलाज की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि रेफरल की संख्या से जुड़ा है।
उन्होंने कहा, 'मरीज का इलाज करने के लिए नहीं, बल्कि उसे रेफर करने के लिए डॉक्टर को ₹3,000 तक दिए जाते हैं। इसके लिए तय कमीशन रेट, एजेंट और समानांतर इंसेंटिव इकोनॉमी काम कर रही है।'
कैसे छुपाई जाती है यह व्यवस्था
चड्ढा ने आरोप लगाया कि डायग्नोस्टिक सेंटर इन भुगतानों को अपने खातों में 'मार्केटिंग एक्सपेंस' के रूप में दर्ज करते हैं, जबकि डॉक्टर इसे 'रेफरल कमीशन' बताते हैं। वास्तव में यह पूरी राशि मरीज के बिल में जोड़ दी जाती है। उनके अनुसार, इस व्यवस्था से गैर-ज़रूरी जांच और अनावश्यक रेफरल को भी बढ़ावा मिलता है, जो मरीज की चिकित्सा आवश्यकता के बजाय व्यावसायिक हित से प्रेरित होते हैं।
नियम क्या कहते हैं
गौरतलब है कि नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) — जो पूर्ववर्ती मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का उत्तराधिकारी है — के नियमों के तहत फीस साझा करना और रेफरल कमीशन लेना-देना प्रतिबंधित है। ऐसे मामलों में दोषी डॉक्टरों के खिलाफ निलंबन सहित अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद, आलोचकों का कहना है कि इन नियमों का प्रवर्तन अत्यंत कमज़ोर रहा है।
मरीजों से चड्ढा की अपील
चड्ढा ने मरीजों से अनुरोध किया कि वे कोई भी मेडिकल जांच कराने से पहले इस तरह के 'रेड फ्लैग' के प्रति सतर्क रहें। उन्होंने अपने संसदीय भाषण का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा करते हुए लिखा, 'यह इलाज नहीं, बल्कि मरीज को किसने रेफर किया, उससे जुड़ा लेन-देन है। अगली बार कोई मेडिकल टेस्ट कराने से पहले इसे ज़रूर देखें।'
आगे क्या होगा
चड्ढा के इस बयान ने चिकित्सा नैतिकता से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे सवालों को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श में ला दिया है। अब मांग तेज हो रही है कि NMC और राज्य चिकित्सा परिषदें ऐसे मामलों में सख्त प्रवर्तन सुनिश्चित करें और मरीजों को व्यावसायिक हितों के बजाय चिकित्सा आवश्यकता के आधार पर इलाज मिले। यह देखना होगा कि स्वास्थ्य मंत्रालय इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाता है या नहीं।