27 अक्टूबर 2026
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कैंसर दवाओं पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: ₹11,000 का इंजेक्शन ₹1.30 लाख में, फैसला सुरक्षित

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कैंसर दवाओं पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: ₹11,000 का इंजेक्शन ₹1.30 लाख में, फैसला सुरक्षित

सारांश

₹11,000 का कैंसर इंजेक्शन अस्पताल में ₹1.30 लाख में — सर्वोच्च न्यायालय ने इस भारी अंतर पर केंद्र सरकार को घेरते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया। 90% दवाएं डीपीसीओ से बाहर, ₹8,000 करोड़ की वसूली लंबित — अदालत का सीधा सवाल: मरीजों की जान पर पूँजीवादी नीति कब तक?

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को कैंसर दवाओं की कीमतों में भारी अंतर के मामले में फैसला सुरक्षित रखा।
अदालत ने उदाहरण दिया कि ₹11,000 का कीमोथेरेपी इंजेक्शन अस्पताल में ₹1.30 लाख में वसूला गया।
लगभग 90 प्रतिशत दवाएं डीपीसीओ के दायरे से बाहर हैं; दवा कंपनियों से ₹8,000 करोड़ की वसूली लंबित।
केंद्र सरकार ने कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत सीमित करने की जानकारी हलफनामे से दी, जो एमआरपी पर लागू होगी।
अदालत ने पिछले 30 वर्षों में भारतीय फार्मा उद्योग द्वारा विकसित पाँच नए मॉलिक्यूल के बारे में सरकार से जवाब माँगा।
इस मुद्दे पर पहले ही तीन संसदीय समितियाँ बन चुकी हैं, फिर भी स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं आया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को कैंसर की दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और प्राइस टू रिटेलर (पीटीआर) के बीच भारी अंतर से जुड़े मामले में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने सभी पक्षों को लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश देते हुए केंद्र सरकार से सीधे पूछा कि जब मरीजों की जान दाँव पर हो, तो कीमतों में इतने बड़े अंतर को उचित कैसे ठहराया जा सकता है।

अदालत के सामने रखा गया चौंकाने वाला उदाहरण

सुनवाई के दौरान अदालत ने एक विशेष घटना का उल्लेख किया। कैंसर से पीड़ित एक महिला को कीमोथेरेपी के लिए एक इंजेक्शन की ज़रूरत थी। महिला के पति स्वयं मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर थे और उन्होंने संबंधित अस्पताल प्रशासन को बताया कि वह वही इंजेक्शन ₹11,000 में उपलब्ध करा सकते हैं। हालाँकि, अस्पताल ने बाहर से लाया गया इंजेक्शन लगाने से इनकार कर दिया और अपने यहाँ उसी इंजेक्शन के लिए ₹1.30 लाख का शुल्क वसूला।

यह घटना दवाओं की कीमतों में 10 गुने से अधिक के फर्क की तस्वीर पेश करती है। अदालत ने केंद्र सरकार से सीधे पूछा कि यह अतिरिक्त राशि आखिर किसकी जेब में जाती है और इसे 'समायोजन' कैसे कहा जा सकता है।

ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर पर सवाल

अदालत ने ड्रिप लाइन का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस वस्तु की रिटेलर कीमत ₹15 है, वह मरीजों को ₹250 में बेची जा रही है। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि ऐसे में ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) लागू करने का क्या औचित्य है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि लगभग 90 प्रतिशत दवाएं डीपीसीओ के दायरे से बाहर हैं और दवा कंपनियों से करीब ₹8,000 करोड़ की वसूली अब भी लंबित है। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही तीन संसदीय समितियाँ बन चुकी हैं, फिर भी स्थिति यथावत बनी है।

सरकार की दलील और अदालत की असहमति

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार इस व्यवस्था में निरंतर सुधार कर रही है और भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया के कई देशों के मुकाबले पहले से कम हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में दाखिल हलफनामे में सरकार ने कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत पर सीमित करने की जानकारी दी है — हालाँकि यह सीमा एमआरपी पर लागू होती है, पीटीआर पर नहीं।

अदालत ने इस दलील को अपर्याप्त बताया और पूछा कि यह फैसला इतने वर्षों बाद अचानक क्यों लिया गया। कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा कि पिछले 30 वर्षों में भारतीय फार्मा उद्योग ने कौन-से पाँच नए मॉलिक्यूल विकसित किए हैं — क्योंकि इनोवेशन का हवाला देकर ऊँची कीमतों को उचित ठहराया जा रहा है।

आयुष्मान भारत और स्वास्थ्य योजनाओं पर चिंता

अदालत ने आयुष्मान भारत सहित अन्य सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत भुगतान की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि ₹5 लाख से अधिक के उपचार खर्च पर सरकारी कवरेज की सीमा होने पर अतिरिक्त भार अंततः मरीजों पर ही पड़ता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मरीजों के पास दवाओं की कीमत पर मोलभाव करने की कोई शक्ति नहीं होती और यह सवाल केवल आर्थिक नीति का नहीं, बल्कि मानवीय जीवन का है।

आगे की राह

फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद अब सभी पक्ष लिखित दलीलें दाखिल करेंगे। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब देश में कैंसर के मरीजों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और इलाज का खर्च मध्यम वर्गीय परिवारों की क्षमता से बाहर होता जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम फैसला देश की दवा मूल्य नियंत्रण नीति की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक ऐसी नियामक विफलता का है जो दशकों से जारी है। तीन संसदीय समितियाँ, एक डीपीसीओ और अनेक सरकारी हलफनामे — इसके बावजूद ₹11,000 का इंजेक्शन ₹1.30 लाख में बिकता रहा, यह बताता है कि जवाबदेही का ढाँचा बुनियादी रूप से कमज़ोर है। सरकार का 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन वाला प्रस्ताव तब तक खोखला है जब तक वह एमआरपी के बजाय पीटीआर पर लागू नहीं होता — यही वह तकनीकी खामी है जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम आदेश दवा उद्योग की लॉबिंग शक्ति और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं दोनों की असली परीक्षा होगा।
RashtraPress
27 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर दवाओं के मामले में फैसला क्यों सुरक्षित रखा?
सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को कैंसर दवाओं की एमआरपी और पीटीआर के बीच भारी अंतर के मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने सभी पक्षों को लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश दिया है।
कैंसर इंजेक्शन की कीमत में इतना अंतर कैसे होता है?
अदालत के सामने आए उदाहरण के अनुसार, एक कीमोथेरेपी इंजेक्शन डिस्ट्रीब्यूटर को ₹11,000 में मिलता है, जबकि अस्पताल उसी इंजेक्शन के लिए मरीज से ₹1.30 लाख वसूलता है। यह फर्क एमआरपी और पीटीआर के बीच अनियंत्रित ट्रेड मार्जिन के कारण उत्पन्न होता है।
डीपीसीओ क्या है और यह कैंसर की दवाओं पर लागू क्यों नहीं होता?
ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) भारत सरकार की वह नीति है जो कुछ ज़रूरी दवाओं की कीमत तय करती है। हालाँकि, अदालत ने रेखांकित किया कि लगभग 90 प्रतिशत दवाएं डीपीसीओ के दायरे से बाहर हैं, जिससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की अधिकांश दवाएं अनियंत्रित बाज़ार के हवाले हैं।
सरकार ने कैंसर दवाओं की कीमत नियंत्रण के लिए क्या कदम उठाए हैं?
केंद्र सरकार ने हाल ही में दाखिल हलफनामे में कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने की जानकारी दी है। हालाँकि अदालत ने सवाल उठाया कि यह सीमा एमआरपी पर लागू होती है, पीटीआर पर नहीं, जिससे इसकी प्रभावशीलता सीमित रहती है।
आयुष्मान भारत योजना से कैंसर मरीजों को पूरी मदद क्यों नहीं मिलती?
अदालत ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना में ₹5 लाख से अधिक के उपचार खर्च पर कवरेज की सीमा होने के कारण इससे अधिक का खर्च मरीजों को स्वयं वहन करना पड़ता है। कैंसर जैसी बीमारियों में इलाज का खर्च इस सीमा को आसानी से पार कर जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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