राजेंद्र यादव जयंती: बचपन के हादसे से टूटी टांग, कलम से बनाई अमर पहचान
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी साहित्य के नई कहानी आंदोलन के अग्रदूत और 'हंस' पत्रिका के पुनर्जीवनदाता राजेंद्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था। उनके पिता डॉ. मिश्रीलाल यादव और माँ ताराबाई थीं। आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए तक की शिक्षा पूरी करने वाले राजेंद्र यादव ने शारीरिक अक्षमता को अपनी सीमा नहीं बनने दिया और हिंदी गद्य को एक नई दिशा दी। आज, 27 अक्टूबर 2026 को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर, उनके जीवन और योगदान को स्मरण करना प्रासंगिक है।
हादसे ने बदली ज़िंदगी, हार नहीं मानी
बचपन में हॉकी खेलते समय हुए एक दुर्घटना में राजेंद्र यादव की एक टाँग टूट गई, जिसके कारण वे जीवनभर के लिए दिव्यांग हो गए। यह घटना किसी के भी मनोबल को तोड़ने के लिए पर्याप्त थी, परंतु बालक राजेंद्र ने आत्मविश्वास को अपना हथियार बनाया और साहित्य की राह चुनी। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी साहित्य की मुख्यधारा परंपरागत कथा-शैलियों से जकड़ी हुई थी और नई आवाज़ों की प्रतीक्षा में थी।
साहित्यिक योगदान और 'नई कहानी' आंदोलन
राजेंद्र यादव को हिंदी साहित्य में 'नई कहानी' आंदोलन के प्रणेताओं में गिना जाता है। उनका पहला और सर्वाधिक चर्चित उपन्यास 'सारा आकाश' था, जिस पर निर्देशक बासु चटर्जी ने 1969 में इसी नाम से हिंदी फ़िल्म बनाई। उनके अन्य प्रमुख उपन्यासों में 'उखड़े हुए लोग', 'कुलटा', 'शह और मात', 'एक इंच मुस्कान', 'अनदेखे अनजान पुल' और 'मंत्रविद्ध' शामिल हैं।
कहानी-विधा में भी उनका अवदान उल्लेखनीय है। 'देवताओं की मूर्तियाँ', 'जहाँ लक्ष्मी कैद है', 'खिलौने', 'छोटे-छोटे ताजमहल', 'मुड़ मुड़ के देखता हूँ' और 'किनारे से किनारे तक' उनकी उल्लेखनीय कहानियाँ हैं। इन रचनाओं में उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्विरोध, स्त्री-विमर्श और सामाजिक यथार्थ को केंद्र में रखा।
'हंस' पत्रिका का पुनरुद्धार
गौरतलब है कि जिस दौर में हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएँ एक-एक कर बंद हो रही थीं, उसी समय राजेंद्र यादव ने प्रेमचंद द्वारा 1930 में स्थापित प्रतिष्ठित पत्रिका 'हंस' को पुनर्जीवित किया। वे अंत तक इसके संपादक बने रहे और इस मंच को हाशिये की आवाज़ों, दलित लेखन तथा स्त्री-विमर्श का ऐतिहासिक केंद्र बनाया। यह उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रमाण था।
व्यक्तिगत जीवन
1959 में राजेंद्र यादव ने प्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी से विवाह किया। दोनों हिंदी साहित्य के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर थे और उनका साहित्यिक-दांपत्य जीवन हिंदी के पाठकों के लिए हमेशा से जिज्ञासा का विषय रहा। इस दंपती की एक पुत्री थी।
विरासत और स्मृति
राजेंद्र यादव का निधन 27 अक्टूबर 2013 को 84 वर्ष की आयु में दिल्ली में हुआ। उनके जाने के 13 वर्ष बाद भी हिंदी साहित्य में उनकी उपस्थिति अनुभव होती है — चाहे वह 'नई कहानी' की बहसों में हो, 'हंस' के पन्नों में हो, या उन लेखकों की कलम में जिन्हें उन्होंने पहला मंच दिया। एक बच्चे की टूटी टाँग ने उसे रोका नहीं, बल्कि उसे अपनी क़लम की ताक़त पहचानने पर मजबूर किया — यही राजेंद्र यादव की असली विरासत है।