एनडीपीएस मामलों में त्वरित जांच की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व सभी राज्यों को भेजा नोटिस
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अगस्त 2026 को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया। यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को निर्धारित की गई है।
पीठ और याचिका का विवरण
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की तीन सदस्यीय पीठ ने इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए नोटिस जारी किया। याचिका में मांग की गई है कि सरकारें NDPS अधिनियम, 1985 के तहत दर्ज सभी मामलों में फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए अनिवार्य समय-सीमा निर्धारित करें। इसके साथ ही, कम और मध्यम मात्रा के मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में तलाशी, जब्ती और नमूना लेने की प्रक्रिया के लिए एकसमान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने का भी अनुरोध किया गया है।
मुख्य मांगें और प्रस्तावित सुधार
याचिका में न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंसेस (NPS) — जिनमें सिंथेटिक ओपिओइड भी शामिल हैं — की समय पर पहचान और सूचीबद्धता के लिए एक स्थायी विशेषज्ञ समिति गठित करने की माँग की गई है। याचिकाकर्ता ने NDPS अधिनियम की धारा 36 और 36ए के तहत विशेष अदालतों के गठन और एक समान SOP तैयार करने पर भी ज़ोर दिया है। इसके अतिरिक्त, तलाशी, जब्ती और नमूना लेने की प्रक्रिया की अनिवार्य डिजिटल रिकॉर्डिंग और वीडियोग्राफी की भी माँग की गई है, ताकि पारदर्शिता बढ़े और प्रक्रियागत खामियों के कारण होने वाले बरी के मामले कम हों।
नशा मुक्ति, पुनर्वास और दंड नीति
याचिका में नशा मुक्ति और पुनर्वास केंद्रों की स्थापना की माँग के साथ-साथ NDPS अधिनियम की धारा 39 और 64ए के प्रभावी क्रियान्वयन पर बल दिया गया है — ये धाराएँ स्वेच्छा से उपचार लेने वाले कुछ नशा पीड़ितों को अभियोजन से राहत प्रदान करती हैं। याचिकाकर्ता ने एक ऐसी दंड नीति की भी माँग की है जो ड्रग तस्करों और वित्तपोषकों पर कठोर कार्रवाई करे, जबकि व्यक्तिगत उपयोग या नशे के शिकार लोगों के प्रति अलग और मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए। ड्रग तस्करों और उनके वित्तपोषकों की संपत्तियों के समयबद्ध आकलन और जब्ती के लिए NDPS अधिनियम, धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), बेनामी संपत्ति कानून और ब्लैक मनी कानून का हवाला दिया गया है।
ड्रग मामलों के आँकड़े और संवैधानिक आधार
याचिका में उद्धृत नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के आँकड़ों के अनुसार, 2025 में ड्रग्स से जुड़े मामलों में 53 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई — इस दौरान 1,48,063 मामले दर्ज हुए और 1,240 टन मादक पदार्थ जब्त किए गए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जांच, अभियोजन, पुनर्वास और कानून प्रवर्तन की व्यवस्था में मौजूदा कमियाँ संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं, और यह अनुच्छेद 47 के तहत राज्य के दायित्वों से भी जुड़ा विषय है। याचिका में विधि आयोग को इस विषय पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश देने की भी माँग की गई है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों से 28 सितंबर तक जवाब माँगा है। यह मामला ऐसे समय में आया है जब सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन के ज़रिए कथित तस्करी की घटनाएँ बढ़ रही हैं और अलग-अलग राज्यों में NDPS कानून के असमान क्रियान्वयन पर चिंता जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यायालय व्यापक दिशानिर्देश जारी करता है, तो यह देश भर की ड्रग अदालतों की कार्यप्रणाली को मौलिक रूप से बदल सकता है।