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एनडीपीएस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बापन हलदर को जमानत दी, कहा — ट्रायल जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं

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एनडीपीएस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बापन हलदर को जमानत दी, कहा — ट्रायल जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने एनडीपीएस मामले में बापन हलदर को जमानत देते हुए स्पष्ट किया कि लगभग दो साल की हिरासत और 39 में से केवल एक गवाह की पूछताछ के बाद ट्रायल जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं — यह फैसला लंबित मुकदमों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की प्राथमिकता को रेखांकित करता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जून 2026 को एनडीपीएस अभियुक्त बापन हलदर को जमानत प्रदान की।
हलदर एक वर्ष और दस महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में थे।
अभियोजन पक्ष के 39 गवाहों में से अब तक केवल एक से पूछताछ हो सकी थी।
14 जुलाई 2024 को फेंसेडिल कफ सिरप की 20,000 बोतलें बरामद होने के बाद मामला दर्ज हुआ था।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पहले जमानत अस्वीकार की थी; सर्वोच्च न्यायालय ने वह आदेश रद्द किया।
तीन अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 5 जून 2026 को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत विचाराधीन बंदी बापन हलदर को जमानत प्रदान की। न्यायालय ने पाया कि हलदर एक वर्ष और दस महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं और निकट भविष्य में मुकदमे के पूरा होने की कोई संभावना नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर ज़िले के भीमपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर हलदर पर एनडीपीएस अधिनियम की धारा 21(सी) और धारा 29 के अंतर्गत मुकदमा चल रहा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पुलिस अधिकारियों को एक कंटेनर के बारे में सूचना प्राप्त हुई थी जिसमें कथित तौर पर प्रतिबंधित सामग्री होने की आशंका थी।

14 जुलाई 2024 को उस कंटेनर की तलाशी के दौरान हलदर सहित दो व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया और कथित तौर पर फेंसेडिल कफ सिरप की 20,000 बोतलें बरामद की गईं, जिसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की खंडपीठ ने हलदर की अपील स्वीकार करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें उनकी नियमित जमानत अर्जी खारिज की गई थी। न्यायालय ने अपने आदेश में दर्ज किया कि अभियोजन पक्ष के कुल 39 गवाहों में से अब तक केवल एक सरकारी गवाह से ही पूछताछ हो सकी है।

जस्टिस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, 'मामले पर विस्तार से विचार करने और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता पहले ही एक साल और दस महीने से अधिक समय तक जेल में रह चुका है और निकट भविष्य में ट्रायल खत्म होने की कोई संभावना नहीं है — हम मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करना उचित समझते हैं।'

बचाव पक्ष की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि इसी मामले में तीन अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। साथ ही यह भी कहा गया कि चूँकि मामले में आरोप तय किए जा चुके हैं, इसलिए हलदर से हिरासत में पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। न्यायालय ने इन दोनों दलीलों को संज्ञान में लिया।

उच्च न्यायालय का पूर्व आदेश

कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस तीर्थंकर घोष कर रहे थे, जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था, 'अगर मामला साबित हो जाता है और अब तक की गई जब्ती को चुनौती नहीं दी गई है, तो इसके नतीजों को देखते हुए मैं याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने के पक्ष में नहीं हूँ।' उच्च न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया था कि हलदर एक वर्ष और नौ महीने से अधिक समय से हिरासत में हैं और 39 में से केवल एक गवाह से पूछताछ हुई है — फिर भी जमानत नामंज़ूर की थी।

आगे क्या

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि हलदर को ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाए। यह फैसला एनडीपीएस मामलों में लंबे समय से विचाराधीन कैदियों की जमानत के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की उस स्थापित प्रवृत्ति की पुनरावृत्ति है, जिसमें अनिश्चितकालीन कारावास को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विरुद्ध माना जाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ विशेष कानून की 'कठोर जमानत शर्तें' अक्सर अनिश्चितकालीन कारावास में बदल जाती हैं। गौरतलब है कि 39 में से एक गवाह की पूछताछ के बाद भी उच्च न्यायालय ने जमानत नामंज़ूर की थी — यह न्यायिक प्राथमिकताओं का विरोधाभास है जिसे सर्वोच्च न्यायालय को सुधारना पड़ा। असली सवाल यह है कि ऐसे मामलों में ट्रायल कोर्ट की गति इतनी धीमी क्यों है कि सर्वोच्च न्यायालय को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ता है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने बापन हलदर को जमानत क्यों दी?
सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत इसलिए दी क्योंकि हलदर एक वर्ष और दस महीने से अधिक समय से हिरासत में थे और निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की कोई संभावना नहीं थी। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि 39 में से केवल एक गवाह से पूछताछ हो सकी है।
बापन हलदर पर एनडीपीएस एक्ट की कौन-सी धाराएँ लगाई गई हैं?
हलदर पर एनडीपीएस अधिनियम की धारा 21(सी) और धारा 29 के तहत मुकदमा चल रहा है। 14 जुलाई 2024 को पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर ज़िले में कंटेनर की तलाशी के दौरान कथित तौर पर फेंसेडिल कफ सिरप की 20,000 बोतलें बरामद होने के बाद यह मामला दर्ज किया गया था।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने जमानत क्यों नामंज़ूर की थी?
जस्टिस तीर्थंकर घोष की एकल-न्यायाधीश पीठ ने कहा था कि यदि मामला साबित होता है और जब्ती को चुनौती नहीं दी गई है, तो परिणामों की गंभीरता को देखते हुए जमानत देना उचित नहीं होगा। हालाँकि उच्च न्यायालय ने लंबी हिरासत और धीमी गवाही की स्थिति स्वीकार करने के बावजूद याचिका खारिज की थी।
क्या इस मामले में अन्य आरोपियों को जमानत मिली है?
हाँ, इस मामले में तीन अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। बचाव पक्ष ने इस तथ्य को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक प्रमुख तर्क के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे न्यायालय ने संज्ञान में लिया।
एनडीपीएस मामलों में जमानत मिलना इतना कठिन क्यों होता है?
एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत जमानत के लिए अदालत को यह संतुष्ट होना पड़ता है कि आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए कोई अपराध नहीं करेगा — यह शर्त सामान्य मामलों से कहीं अधिक कठिन है। इसी कारण लंबे समय तक विचाराधीन कैद की स्थिति बनती है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में अनुचित माना।
राष्ट्र प्रेस
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