एनडीपीएस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बापन हलदर को जमानत दी, कहा — ट्रायल जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 5 जून 2026 को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत विचाराधीन बंदी बापन हलदर को जमानत प्रदान की। न्यायालय ने पाया कि हलदर एक वर्ष और दस महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं और निकट भविष्य में मुकदमे के पूरा होने की कोई संभावना नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर ज़िले के भीमपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर हलदर पर एनडीपीएस अधिनियम की धारा 21(सी) और धारा 29 के अंतर्गत मुकदमा चल रहा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पुलिस अधिकारियों को एक कंटेनर के बारे में सूचना प्राप्त हुई थी जिसमें कथित तौर पर प्रतिबंधित सामग्री होने की आशंका थी।
14 जुलाई 2024 को उस कंटेनर की तलाशी के दौरान हलदर सहित दो व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया और कथित तौर पर फेंसेडिल कफ सिरप की 20,000 बोतलें बरामद की गईं, जिसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की खंडपीठ ने हलदर की अपील स्वीकार करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें उनकी नियमित जमानत अर्जी खारिज की गई थी। न्यायालय ने अपने आदेश में दर्ज किया कि अभियोजन पक्ष के कुल 39 गवाहों में से अब तक केवल एक सरकारी गवाह से ही पूछताछ हो सकी है।
जस्टिस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, 'मामले पर विस्तार से विचार करने और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता पहले ही एक साल और दस महीने से अधिक समय तक जेल में रह चुका है और निकट भविष्य में ट्रायल खत्म होने की कोई संभावना नहीं है — हम मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करना उचित समझते हैं।'
बचाव पक्ष की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि इसी मामले में तीन अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। साथ ही यह भी कहा गया कि चूँकि मामले में आरोप तय किए जा चुके हैं, इसलिए हलदर से हिरासत में पूछताछ की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। न्यायालय ने इन दोनों दलीलों को संज्ञान में लिया।
उच्च न्यायालय का पूर्व आदेश
कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस तीर्थंकर घोष कर रहे थे, जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था, 'अगर मामला साबित हो जाता है और अब तक की गई जब्ती को चुनौती नहीं दी गई है, तो इसके नतीजों को देखते हुए मैं याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने के पक्ष में नहीं हूँ।' उच्च न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया था कि हलदर एक वर्ष और नौ महीने से अधिक समय से हिरासत में हैं और 39 में से केवल एक गवाह से पूछताछ हुई है — फिर भी जमानत नामंज़ूर की थी।
आगे क्या
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि हलदर को ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाए। यह फैसला एनडीपीएस मामलों में लंबे समय से विचाराधीन कैदियों की जमानत के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की उस स्थापित प्रवृत्ति की पुनरावृत्ति है, जिसमें अनिश्चितकालीन कारावास को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विरुद्ध माना जाता है।