7 अगस्त 2026
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मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु से माँगी रिपोर्ट, यौन अपराध मामलों में SOP तैयार करेगी सरकार

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मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु से माँगी रिपोर्ट, यौन अपराध मामलों में SOP तैयार करेगी सरकार

सारांश

तमिलनाडु सरकार यौन अपराध मामलों में जाँच और ट्रायल की देरी दूर करने के लिए SOP तैयार कर रही है और DNA टेस्टिंग सुविधाओं का विस्तार करेगी। मद्रास हाई कोर्ट ने दो सप्ताह में विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट माँगी है।

मुख्य बातें

तमिलनाडु सरकार महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों की जाँच व सुनवाई में तेजी के लिए SOP तैयार कर रही है।
एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने बताया कि राज्य की कई फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में DNA परीक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिससे जाँच में देरी होती है।
तिरुवन्नामलाई में सितंबर 2025 में दो पुलिसकर्मियों द्वारा कथित दुष्कर्म की पीड़िता की याचिका पर सुनवाई के दौरान ये बातें सामने आईं।
ट्रायल कोर्ट ने 17 जून को आरोप तय किए; ट्रायल 24 जून से शुरू होना निर्धारित है।
मद्रास हाई कोर्ट ने सरकार और रजिस्ट्रार जनरल को दो सप्ताह में विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया।

मद्रास हाई कोर्ट को सोमवार, 22 जून को सूचित किया गया कि तमिलनाडु सरकार महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों की जाँच, अभियोजन और सुनवाई को गति देने के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार कर रही है। यह जानकारी एक 26 वर्षीय रेप सर्वाइवर की रिट याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें उन्होंने ट्रायल में हो रही देरी पर हस्तक्षेप की माँग की थी।

मुख्य घटनाक्रम

एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की डिवीजन बेंच के समक्ष बताया कि राज्य सरकार ने ऐसे मामलों के त्वरित निपटारे के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करना सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया है। उन्होंने स्वीकार किया कि यौन अपराध मामलों में जाँच के स्तर पर विलंब का एक प्रमुख कारण फोरेंसिक साइंस रिपोर्ट, विशेषकर डीएनए विश्लेषण रिपोर्ट, की देरी से प्राप्ति है।

फोरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी

एडवोकेट जनरल ने अदालत को बताया कि तमिलनाडु की कई क्षेत्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं में अभी तक डीएनए परीक्षण की क्षमता उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण चार्जशीट दाखिल करने में अनावश्यक देरी होती है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार पूरे राज्य में डीएनए टेस्टिंग सुविधाओं का विस्तार करने और मौजूदा प्रयोगशालाओं को अपग्रेड करने की योजना बना रही है।

याचिका की पृष्ठभूमि

यह याचिका उस पीड़िता ने दायर की थी जिनके साथ कथित तौर पर सितंबर 2025 में तिरुवन्नामलाई जिले में दो पुलिसकर्मियों ने दुष्कर्म किया था। एडवोकेट जनरल ने बताया कि हाई कोर्ट के एक सिंगल जज ने 4 जून को आरोपियों की बरी होने की याचिकाएँ खारिज कर दी थीं। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 17 जून को आरोपियों के विरुद्ध आरोप तय किए और ट्रायल 24 जून से प्रारंभ होना निर्धारित है।

सरकार की प्रतिक्रिया और अदालत की माँग

एडवोकेट जनरल ने यह भी आग्रह किया कि न्यायिक अधिकारी यौन अपराध मामलों में प्रतिदिन सुनवाई सुनिश्चित करें और कार्यवाही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 346(1) के अंतर्गत निर्धारित दो महीने की समय-सीमा में पूरी हो। उन्होंने हाई कोर्ट से ट्रायल जजों को इस विषय में संवेदनशील बनाने का अनुरोध किया।

हाई कोर्ट का निर्देश

डिवीजन बेंच ने तमिलनाडु सरकार और मद्रास हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को दो सप्ताह के भीतर एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। इस रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के लंबित मामलों का डेटा, मौजूदा बुनियादी ढाँचे की स्थिति और त्वरित जाँच व सुनवाई के लिए आवश्यक अतिरिक्त संसाधनों का विवरण शामिल होने की अपेक्षा है। गौरतलब है कि यह मामला न्यायिक तंत्र में महिलाओं और बच्चों के प्रति यौन अपराधों के त्वरित निपटारे की व्यापक चुनौती को उजागर करता है — एक ऐसी चुनौती जो केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह पहली बार नहीं है जब किसी राज्य ने यौन अपराध मामलों में 'त्वरित कार्रवाई' का आश्वासन दिया हो। असली परीक्षा यह होगी कि SOP में समय-सीमाओं का पालन न होने पर जवाबदेही का क्या तंत्र होगा। BNSS की धारा 346(1) पहले से दो महीने की सीमा तय करती है, फिर भी देरी जारी है — यानी समस्या कानून की नहीं, क्रियान्वयन की है। बिना स्वतंत्र निगरानी और नियमित ऑडिट के, यह SOP भी कागज़ी दस्तावेज़ बनकर रह सकती है।
RashtraPress
7 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिलनाडु सरकार यौन अपराध मामलों के लिए कौन-सी SOP तैयार कर रही है?
तमिलनाडु सरकार एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बना रही है जो महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों की जाँच, अभियोजन और सुनवाई की प्रक्रिया को गति देगी। इसमें फोरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना और DNA टेस्टिंग सुविधाओं का विस्तार शामिल है।
मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से क्या माँगा है?
मद्रास हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने तमिलनाडु सरकार और रजिस्ट्रार जनरल को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। इस रिपोर्ट में लंबित यौन अपराध मामलों का डेटा और त्वरित निपटारे के लिए आवश्यक संसाधनों का विवरण होना चाहिए।
तिरुवन्नामलाई दुष्कर्म मामला क्या है जिसकी याचिका पर यह सुनवाई हुई?
एडवोकेट जनरल के अनुसार, एक 26 वर्षीय महिला के साथ कथित तौर पर सितंबर 2025 में तिरुवन्नामलाई जिले में दो पुलिसकर्मियों ने दुष्कर्म किया था। पीड़िता ने ट्रायल में देरी के विरुद्ध हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई के दौरान ये खुलासे हुए।
DNA टेस्टिंग में देरी यौन अपराध मामलों को कैसे प्रभावित करती है?
राज्य की कई क्षेत्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में DNA परीक्षण की सुविधा न होने के कारण फोरेंसिक रिपोर्ट देर से मिलती है, जिससे जाँच पूरी करने और चार्जशीट दाखिल करने में विलंब होता है। इससे पीड़ितों को न्याय मिलने में अनावश्यक देरी होती है।
BNSS की धारा 346(1) यौन अपराध ट्रायल के बारे में क्या कहती है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 346(1) यौन अपराध मामलों में ट्रायल दो महीने की समय-सीमा के भीतर पूरा करने का प्रावधान करती है। एडवोकेट जनरल ने हाई कोर्ट से ट्रायल जजों को इस समय-सीमा के पालन के प्रति संवेदनशील बनाने का आग्रह किया।
राष्ट्र प्रेस
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