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संयुक्त राष्ट्र चार्टर से 'शत्रु राज्य प्रावधान' नहीं हटेगा — चीन का जापान को कड़ा जवाब

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संयुक्त राष्ट्र चार्टर से 'शत्रु राज्य प्रावधान' नहीं हटेगा — चीन का जापान को कड़ा जवाब

सारांश

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में चीन ने जापान की उस माँग को सीधे खारिज किया जिसमें UN चार्टर से 'शत्रु राज्य प्रावधान' हटाने की बात थी। चीन ने जापान के 'पुनः सैन्यीकरण' को क्षेत्रीय शांति के लिए वास्तविक खतरा बताया — और यह टकराव युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की प्रासंगिकता पर एक बड़ी बहस को फिर से जीवंत करता है।

मुख्य बातें

चीन के उप स्थायी प्रतिनिधि सुन लेई ने UNGA 81वें सत्र में 29 सितंबर 2026 को जापान के बयान पर जवाबी अधिकार का प्रयोग किया।
जापान ने 22 सितंबर को UN चार्टर से 'शत्रु राष्ट्र खंड' हटाने की मांग की थी, जिसे चीन ने कड़े शब्दों में अस्वीकार किया।
चीन के अनुसार, साने ताकाइची सरकार ऐतिहासिक सैन्यवाद पर चिंतन करने के बजाय उसे छिपाने का प्रयास करती है।
चीन ने जापान के सैन्य विस्तार और आधुनिकीकरण को क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिए वास्तविक खतरा बताया।
'शत्रु राज्य प्रावधान' को फासीवाद और सैन्यवाद को रोकने की संस्थागत गारंटी बताते हुए चीन ने इसे बनाए रखने पर ज़ोर दिया।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र की आम बहस में चीन ने जापान के बयान के जवाब में 29 सितंबर 2026 को अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निहित 'शत्रु राज्य प्रावधान' को न तो हटाया जा सकता है और न ही संशोधित किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में चीन के उप स्थायी प्रतिनिधि सुन लेई ने यह बयान उस समय दिया जब जापान ने इस प्रावधान को हटाने की मांग उठाई थी।

जापान ने क्या कहा था

जापान ने 22 सितंबर को महासभा की आम बहस में अपने बयान में खुद को 'शांतिप्रिय राष्ट्र' बताते हुए कहा था कि वह 'पूरी तरह से रक्षात्मक नीति' का पालन करता है। जापान ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर से 'शत्रु राष्ट्र खंड' को हटाने की मांग की, जिस पर चीन ने कड़ा विरोध दर्ज कराया।

चीन का तर्क क्या है

सुन लेई ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान संयुक्त राष्ट्र में इस शर्त पर शामिल हुआ था कि वह अपने सैन्यवाद के अपराधों को स्वीकार करेगा और चार्टर की सभी शर्तों का पालन करेगा। उन्होंने कहा कि युद्धोत्तर जापान का 'शांतिपूर्ण राष्ट्र' का आदर्श इतिहास पर गहन चिंतन और सैन्यवाद से पूर्ण विच्छेद की नींव पर खड़ा था।

गौरतलब है कि चीन के अनुसार, 80 से अधिक वर्षों बाद साने ताकाइची सरकार न केवल ऐतिहासिक अपराधों पर चर्चा से बचती है, बल्कि कथित तौर पर उन्हें छिपाने और महिमामंडित करने का प्रयास भी करती है। चीन का आरोप है कि जापान अपने निरंतर सैन्य विस्तार और आधुनिकीकरण को उचित ठहराने के लिए पड़ोसी देशों से खतरों की मनगढ़ंत कहानियों का सहारा लेता है।

शत्रु राज्य प्रावधान का महत्व

सुन लेई के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र चार्टर का 'शत्रु राज्य प्रावधान' एक महत्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था है, जिसे फासीवाद और सैन्यवाद को अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए फिर से खतरा बनने से रोकने के लिए तैयार किया गया था। यह प्रावधान युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा के लिए एक संस्थागत गारंटी प्रदान करता है और आज भी इसका व्यावहारिक महत्व बना हुआ है।

व्यापक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब जापान और चीन के बीच ऐतिहासिक एवं सामरिक तनाव के कई मुद्दे लंबित हैं। हाल के वर्षों में जापान ने अपनी रक्षा नीति में उल्लेखनीय बदलाव किए हैं और रक्षा बजट को GDP के 2% तक बढ़ाने की घोषणा की है, जिसे चीन 'पुनः सैन्यीकरण' का संकेत मानता है। आलोचकों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में यह बयानबाज़ी व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है।

आगे की स्थिति

द्वितीय विश्व युद्ध की जीत की 80वीं वर्षगाँठ के करीब आते ही यह विवाद और गहरा होने की आशंका है। चीन और जापान के बीच संयुक्त राष्ट्र मंच पर यह टकराव दर्शाता है कि युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर वैश्विक सहमति अभी भी अधूरी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे चीन 'शत्रु राज्य प्रावधान' की आड़ में अंतरराष्ट्रीय वैधता का मुद्दा बना रहा है। विरोधाभास यह है कि जिस प्रावधान को चीन 'व्यावहारिक महत्व' वाला बता रहा है, उसे 1995 में ही संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 'अप्रचलित' घोषित कर दिया था — भले ही चार्टर से औपचारिक रूप से नहीं हटाया गया। मुख्यधारा की कवरेज इस कानूनी बारीकियत को अक्सर नजरअंदाज करती है।
RashtraPress
29 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में 'शत्रु राज्य प्रावधान' क्या है?
यह UN चार्टर के अनुच्छेद 53 और 107 में निहित वह व्यवस्था है जो द्वितीय विश्व युद्ध के शत्रु राज्यों — मुख्यतः जर्मनी और जापान — के विरुद्ध बल प्रयोग को विशेष परिस्थितियों में उचित ठहराती है। इसे फासीवाद और सैन्यवाद को फिर से उभरने से रोकने के लिए तैयार किया गया था।
जापान ने यह माँग क्यों की कि इस प्रावधान को हटाया जाए?
जापान ने 22 सितंबर 2026 को UNGA की आम बहस में खुद को 'शांतिप्रिय राष्ट्र' और 'पूरी तरह से रक्षात्मक नीति' का पालन करने वाला बताते हुए इस प्रावधान को अप्रासंगिक करार दिया और इसे हटाने की मांग की।
चीन ने जापान के बयान पर इतनी कड़ी प्रतिक्रिया क्यों दी?
चीन का कहना है कि जापान की साने ताकाइची सरकार ऐतिहासिक सैन्यवाद के अपराधों पर चिंतन करने के बजाय उन्हें छिपाने का प्रयास करती है और निरंतर सैन्य विस्तार कर रही है। चीन इसे क्षेत्रीय शांति के लिए वास्तविक खतरा मानता है।
क्या यह प्रावधान वास्तव में आज भी लागू है?
कानूनी रूप से यह प्रावधान UN चार्टर में अभी भी मौजूद है, हालाँकि 1995 में UNGA ने एक प्रस्ताव में इसे 'अप्रचलित' बताया था। औपचारिक रूप से इसे चार्टर से नहीं हटाया गया है, जिसके लिए सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों सहित व्यापक सहमति आवश्यक होगी।
इस विवाद का भारत जैसे देशों पर क्या असर हो सकता है?
यह विवाद एशिया-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिरता से जुड़ा है। भारत जापान के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी रखता है, वहीं चीन के साथ संबंध जटिल हैं। UN चार्टर संशोधन जैसे बड़े बदलाव भारत की बहुपक्षीय कूटनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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