दवा मूल्य नियंत्रण मामले में सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी, याचिकाकर्ता डॉ. कुलश्रेष्ठ ने बताया 10-15 गुना अधिक वसूली का सच
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को दवाओं की अत्यधिक कीमतों के विरुद्ध दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए फार्मा कंपनियों से सीधे सवाल किया कि क्या वे केवल व्यापारिक लाभ के लिए काम कर रही हैं, या जनहित और स्वास्थ्य सेवा की जिम्मेदारी भी उनकी है। याचिकाकर्ता और चिकित्सक डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने न्यायालय के समक्ष वास्तविक मरीजों के बिल प्रस्तुत किए, जिनमें दवाओं पर 10 से 15 गुना तक अधिक राशि वसूले जाने के प्रमाण दर्शाए गए।
कोर्ट की टिप्पणी और सुनवाई का मुख्य घटनाक्रम
डॉ. कुलश्रेष्ठ के अनुसार, न्यायालय ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुनाफा कमाना एक अलग बात है, परंतु असंगत मुनाफाखोरी और अत्यधिक मूल्य वसूली किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। जब कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता — जिनमें कपिल सिब्बल भी शामिल थे — बहस के लिए उपस्थित हुए, तो कोर्ट ने कहा कि डॉ. राठौर और डॉ. कुलश्रेष्ठ की याचिका में अधिकांश तथ्य स्पष्ट रूप से सामने रखे गए हैं।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने न्यायालय में मरीजों के वास्तविक बिल संलग्न करते हुए यह प्रमाणित किया कि कई दवाओं पर निर्माता मूल्य की तुलना में 10 से 15 गुना तक कीमत वसूली जा रही है। इसके अलावा उन्होंने लिखित प्रतिवेदन और रिजॉइंडर भी न्यायालय में दाखिल किया था। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय की ओर से प्रस्तुत तर्कों के जवाब में भी उन्होंने अपना पक्ष रखा।
दवाओं के वर्गीकरण पर याचिकाकर्ता की आपत्ति
डॉ. कुलश्रेष्ठ ने केवल कैंसर की दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में शामिल करने की नीति पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका तर्क है कि भारत में सर्वाधिक बिकने वाली दवाएं हृदय रोग, मधुमेह, एसिडिटी, दर्द निवारक और एंटीबायोटिक श्रेणी की हैं — इनमें से अधिकांश का कैंसर से कोई संबंध नहीं है। इसलिए उनकी माँग है कि सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाया जाए।
उन्होंने 'आवश्यक' और 'गैर-आवश्यक' दवाओं के बीच अंतर को भी तर्कसंगत रूप से चुनौती दी। उनके अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने यह वर्गीकरण मूल रूप से आपातकालीन परिस्थितियों और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विकसित किया था। व्यवहार में, जो दवा एक मरीज की जान बचाती है, वह उसके लिए अनिवार्य है — चाहे उसे 'एसेंशियल' कहा जाए या 'नॉन-एसेंशियल'।
मूल्य निर्धारण में तर्कहीनता का मुद्दा
याचिकाकर्ता ने मूल्य-आधारित वर्गीकरण को भी मनमाना करार दिया। उनका कहना है कि यह तय करने का कोई स्पष्ट मानदंड नहीं है कि कौन-सी दवा 'महंगी' है और कौन-सी 'सस्ती'। प्रत्येक दवा विक्रेता सस्ती और महंगी दोनों प्रकार की दवाएं बेचता है, और उसका कुल लाभ समग्र रूप से निकलता है। इसलिए दवाओं पर अधिक तार्किक और समान मूल्य नियंत्रण लागू किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के दो महत्त्वपूर्ण सुझाव
डॉ. कुलश्रेष्ठ ने बताया कि न्यायालय ने दो अहम सुझाव दिए। पहला, एमआरपी व्यवस्था को निर्माण स्तर पर ही लागू करने पर विचार किया जाए। दूसरा, एक वेबसाइट या मोबाइल ऐप विकसित की जाए जिसमें निर्माता, वितरक, स्टॉकिस्ट और रिटेलर स्तर पर प्रत्येक दवा का मार्जिन पारदर्शी रूप से दिखाया जाए — साथ ही यह भी स्पष्ट हो कि दवा जरूरी है या गैर-जरूरी, पेटेंटेड है या जेनेरिक।
जेनेरिक दवाओं पर डॉ. कुलश्रेष्ठ का रुख और विदेशी निवेश की चेतावनी
डॉ. कुलश्रेष्ठ ने स्पष्ट किया कि वे जेनेरिक दवाओं के विरोधी नहीं हैं — बल्कि चिकित्सक होने के नाते उनका समर्थन करते हैं। हालांकि, उन्होंने चेताया कि यदि बहुत अधिक कंपनियों को एक ही जेनेरिक दवा बनाने की अनुमति दी जाए, तो अनैतिक प्रतिस्पर्धा का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में जिस उत्पाद पर अधिक लाभ मिलता है, उसे बाजार में अनुचित बढ़ावा मिलने लगता है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब जापान, कोरिया और अन्य देशों की कंपनियां भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं और अस्पतालों के अधिग्रहण भी हो रहे हैं। डॉ. कुलश्रेष्ठ का कहना है कि यही तथ्य साबित करता है कि इस क्षेत्र में पर्याप्त लाभ की संभावना पहले से मौजूद है — और इसीलिए मूल्य नियंत्रण की माँग और भी प्रासंगिक है। आने वाले समय में सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्देश यह तय करेंगे कि करोड़ों भारतीय मरीजों को दवाओं की वाजिब कीमत मिल सकेगी या नहीं।