सुप्रीम कोर्ट का कोविड वैक्सीन पर अहम आदेश, गंभीर दुष्प्रभावों के लिए 'नो-फॉल्ट मुआवजा' नीति की व्यवस्था
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने 'नो-फॉल्ट कंपंसेशन सिस्टम' का आदेश दिया।
- गंभीर दुष्प्रभावों को झेलने वाले व्यक्तियों को सहायता मिलेगी।
- केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के माध्यम से यह नीति लागू होगी।
- प्रभावित व्यक्तियों के लिए अन्य कानूनी उपाय उपलब्ध रहेंगे।
- मौजूदा निगरानी तंत्र जारी रहेगा।
नई दिल्ली, 10 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। कोविड-19 के टीकाकरण से संबंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि यदि किसी व्यक्ति को कोविड-19 वैक्सीन लेने के बाद गंभीर प्रतिकूल दुष्प्रभाव का सामना करना पड़ता है, तो ऐसे मामलों में राहत प्रदान करने के लिए 'नो-फॉल्ट कंपंसेशन सिस्टम' स्थापित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के माध्यम से लागू होना चाहिए। अदालत के अनुसार, इस नीति का उद्देश्य उन लोगों को सहायता प्रदान करना है, जिन्हें टीकाकरण के बाद गंभीर प्रतिकूल घटनाओं का सामना करना पड़ा है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस नई नीति में मुआवजे का प्रावधान होना चाहिए, जहाँ वैक्सीन लेने के बाद गंभीर दुष्प्रभाव सामने आए हों। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी हेतु जो मौजूदा तंत्र पहले से कार्यरत है, वह आगे भी जारी रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस निगरानी प्रणाली से संबंधित प्रासंगिक डेटा समय-समय पर सार्वजनिक किया जा सकता है, ताकि लोगों को सही जानकारी मिलती रहे और पारदर्शिता बनी रहे।
अदालत ने वैज्ञानिक आकलन से जुड़े मुद्दे पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि टीकाकरण से संबंधित मामलों की जांच और मूल्यांकन के लिए पहले से ही कई वैज्ञानिक और तकनीकी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इसलिए इस विषय में अलग से अदालत द्वारा किसी नई विशेषज्ञ समिति नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'नो-फॉल्ट कंपंसेशन फ्रेमवर्क' तैयार करने का अर्थ यह नहीं होगा कि केंद्र सरकार या अन्य प्राधिकरण अपनी किसी जिम्मेदारी या गलती को स्वीकार कर रहे हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि इस फैसले के बावजूद किसी भी व्यक्ति के लिए कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का रास्ता बंद नहीं होगा। यानी प्रभावित लोग जरूरत पड़ने पर अन्य कानूनी विकल्प भी अपना सकते हैं।