<b>डेटा सुरक्षा: सीजेआई सूर्यकांत की अहम टिप्पणी, 2025 डेटा प्रोटेक्शन एक्ट पर सुनवाई</b>
सारांश
Key Takeaways
- डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2025 पर सुनवाई की जा रही है।
- मुख्य न्यायाधीश ने इसे वैश्विक चिंता बताया।
- याचिकाकर्ताओं ने मुआवजे की व्यवस्था पर सवाल उठाए।
- डेटा सुरक्षा के मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
- सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई का आश्वासन दिया।
नई दिल्ली, 12 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2025 के खिलाफ दायर विभिन्न याचिकाओं पर जल्दी सुनवाई का आश्वासन दिया है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस विषय को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि डेटा सुरक्षा वर्तमान समय का एक वैश्विक मुद्दा बन चुका है और इसके प्रति विश्वभर में गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है।
मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि आज के समय में डेटा तेजी से नई करेंसी का रूप ले रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि डेटा सुरक्षा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि यह एक वैश्विक चिंता का विषय है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि देश का बहुत सारा डेटा विदेशों में जा रहा है, और इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधि वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने अदालत में नए डेटा सुरक्षा कानून को चुनौती देने वाली याचिका को सामने रखते हुए कहा कि इस अधिनियम में 'निजी और व्यक्तिगत डेटा' की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। उन्होंने तर्क किया कि पहले इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 के तहत यदि किसी व्यक्ति की डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन होता था, तो उसे मुआवजा मांगने का अधिकार था, लेकिन नए कानून में यह प्रावधान बदल दिया गया है।
उन्होंने बताया कि नए कानून के अंतर्गत मुआवजा सीधे पीड़ित व्यक्ति को मिलने के बजाय राज्य या डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को दिया जाएगा। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि इस बोर्ड पर किसी भी प्रकार की न्यायिक निगरानी का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिससे जवाबदेही पर प्रश्न उठते हैं।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जिस भी ट्रिब्यूनल या बोर्ड की निगरानी का प्रावधान होगा, उसे अर्ध-न्यायिक निकाय होना चाहिए और वह न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगा। सुनवाई के दौरान इंदिरा जयसिंह ने यह भी कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार होना आवश्यक है, जिसमें सरकार को दी गई छूट, सरकार की किसी भी डेटा तक संभावित पहुंच (जिससे निगरानी की आशंका), पत्रकारों को छूट न दिए जाने से सूचना के अधिकार पर पड़ने वाला असर और डेटा की संप्रभुता शामिल हैं।
उन्होंने अदालत से कहा कि यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या देश का डेटा विदेशों में जा रहा है और उसे किस प्रकार सुरक्षित रखा जा रहा है। इसके अलावा डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की भूमिका और डेटा प्राइवेसी के उल्लंघन की स्थिति में मुआवज़े की व्यवस्था जैसे मुद्दों पर भी न्यायिक विचार जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और तकनीकी मुद्दा है, जिस पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जाएगी।