12वें ब्रिक्स संसदीय मंच में हरिवंश का संबोधन: SDG लक्ष्यों में संसदों की भूमिका पर जोर
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए सतत और समावेशी विकास में संसदों की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया। इस सत्र का विषय था — 'निरंतरता: हमारे राष्ट्रों के लिए स्थायी और समावेशी भविष्य के निर्माण में संसद की प्रमुख भूमिका'।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता और नई दिल्ली घोषणा
हरिवंश ने कहा कि वर्ष 2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और निरंतरता के लिए निर्माण' विषय पर केंद्रित है। उन्होंने बताया कि सितंबर 2026 में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अपनाई गई नई दिल्ली घोषणा ने सतत विकास और समावेशी वृद्धि के प्रति सदस्य देशों की साझा प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित किया।
यह ऐसे समय में आया है जब ब्रिक्स समूह का विस्तार हो रहा है और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बुलंद हो रही है। भारत की अध्यक्षता में संसदीय कूटनीति को विशेष महत्व मिला है।
वैश्विक विकास की चुनौतियाँ और SDG की स्थिति
वैश्विक परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए हरिवंश ने कहा कि मानवता आज जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण, जैव विविधता को नुकसान, संसाधनों की कमी, खाद्य एवं ऊर्जा असुरक्षा तथा बढ़ती असमानताओं जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।
संयुक्त राष्ट्र की सतत विकास लक्ष्य रिपोर्ट 2026 का हवाला देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि पर्याप्त रुझान संबंधी आंकड़े उपलब्ध 139 लक्ष्यों में से केवल 15 प्रतिशत ही वर्तमान में वर्ष 2030 तक हासिल किए जाने की दिशा में सही मार्ग पर हैं। यह आँकड़ा वैश्विक नेतृत्व के लिए चेतावनी की घंटी है।
संसदों की अपरिहार्य भूमिका
राज्यसभा उपसभापति ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने में संसदों की विशिष्ट और अपरिहार्य भूमिका है। विधायी कार्यों, बजटीय निगरानी, जवाबदेही तंत्र और नागरिकों के प्रतिनिधित्व के माध्यम से संसदें सार्वजनिक नीतियों को लोकतांत्रिक वैधता प्रदान करती हैं।
उन्होंने कहा कि SDG लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संसदों को सक्षम कानून बनाने, पर्याप्त संसाधन आवंटित करने, कार्यान्वयन की निगरानी करने और समाज के सभी वर्गों की आवाज़ सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी उठानी होगी। गौरतलब है कि वैश्विक प्रतिबद्धताओं और ज़मीनी कार्रवाई के बीच की खाई को पाटने में संसदें ही सबसे प्रभावी सेतु हैं।
भारत का दृष्टिकोण: वसुधैव कुटुम्बकम और विकसित भारत-2047
हरिवंश ने कहा कि निरंतर विकास जन-केंद्रित, समावेशी और न्यायसंगत होना चाहिए। उन्होंने 'वसुधैव कुटुम्बकम' अर्थात् 'पूरा विश्व एक परिवार है' के प्राचीन भारतीय दर्शन को वैश्विक सहयोग की आधारशिला बताया।
उन्होंने बताया कि भारत में लगभग दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, इसलिए युवा सतत विकास के अनिवार्य भागीदार हैं। 'विकसित भारत युवा संसद' जैसी पहलें युवाओं को लोकतांत्रिक संस्थाओं से जोड़ने और नवोन्मेषी विचारों के माध्यम से भविष्य निर्माण में योगदान देने का अवसर प्रदान करती हैं। विकसित भारत-2047 की परिकल्पना से प्रेरित होकर भारत एक समृद्ध, सुदृढ़ और सतत राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आगे की राह
अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर बोलते हुए हरिवंश ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के लिए वैश्विक प्रतिक्रिया ज़रूरी है। उन्होंने अधिक मज़बूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वित्त तक बेहतर पहुँच, प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान और 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व' के सिद्धांत के सम्मान की वकालत की।
उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुरूप सतत विकास को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त नीतिगत स्वतंत्रता और संसाधन मिलने चाहिए। संसदीय कूटनीति और सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान से वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए एक स्थायी, समावेशी और समृद्ध विश्व का निर्माण संभव है।