27 अक्टूबर 2026
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12वें ब्रिक्स संसदीय मंच में हरिवंश का संबोधन: SDG लक्ष्यों में संसदों की भूमिका पर जोर

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12वें ब्रिक्स संसदीय मंच में हरिवंश का संबोधन: SDG लक्ष्यों में संसदों की भूमिका पर जोर

सारांश

12वें ब्रिक्स संसदीय मंच में राज्यसभा उपसभापति हरिवंश ने SDG रिपोर्ट 2026 के चौंकाने वाले आँकड़े सामने रखे — 139 में से महज 15% लक्ष्य 2030 की राह पर हैं। भारत की अध्यक्षता में 'वसुधैव कुटुम्बकम' और युवा भागीदारी को सतत विकास की धुरी बताया गया।

मुख्य बातें

राज्यसभा उपसभापति हरिवंश ने 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के पूर्ण सत्र को संबोधित किया।
संयुक्त राष्ट्र SDG रिपोर्ट 2026 के अनुसार, 139 लक्ष्यों में से केवल 15% ही 2030 तक हासिल होने की दिशा में हैं।
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ( सितंबर 2026 ) में अपनाई गई नई दिल्ली घोषणा ने सतत और समावेशी विकास के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोहराई।
भारत की दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम आयु की — हरिवंश ने युवाओं को सतत विकास का 'अनिवार्य भागीदार' बताया।
'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'विकसित भारत-2047' को भारत की वैश्विक विकास रणनीति का आधार बताया गया।

राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए सतत और समावेशी विकास में संसदों की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया। इस सत्र का विषय था — 'निरंतरता: हमारे राष्ट्रों के लिए स्थायी और समावेशी भविष्य के निर्माण में संसद की प्रमुख भूमिका'।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता और नई दिल्ली घोषणा

हरिवंश ने कहा कि वर्ष 2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और निरंतरता के लिए निर्माण' विषय पर केंद्रित है। उन्होंने बताया कि सितंबर 2026 में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अपनाई गई नई दिल्ली घोषणा ने सतत विकास और समावेशी वृद्धि के प्रति सदस्य देशों की साझा प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित किया।

यह ऐसे समय में आया है जब ब्रिक्स समूह का विस्तार हो रहा है और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बुलंद हो रही है। भारत की अध्यक्षता में संसदीय कूटनीति को विशेष महत्व मिला है।

वैश्विक विकास की चुनौतियाँ और SDG की स्थिति

वैश्विक परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए हरिवंश ने कहा कि मानवता आज जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण, जैव विविधता को नुकसान, संसाधनों की कमी, खाद्य एवं ऊर्जा असुरक्षा तथा बढ़ती असमानताओं जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।

संयुक्त राष्ट्र की सतत विकास लक्ष्य रिपोर्ट 2026 का हवाला देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि पर्याप्त रुझान संबंधी आंकड़े उपलब्ध 139 लक्ष्यों में से केवल 15 प्रतिशत ही वर्तमान में वर्ष 2030 तक हासिल किए जाने की दिशा में सही मार्ग पर हैं। यह आँकड़ा वैश्विक नेतृत्व के लिए चेतावनी की घंटी है।

संसदों की अपरिहार्य भूमिका

राज्यसभा उपसभापति ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने में संसदों की विशिष्ट और अपरिहार्य भूमिका है। विधायी कार्यों, बजटीय निगरानी, जवाबदेही तंत्र और नागरिकों के प्रतिनिधित्व के माध्यम से संसदें सार्वजनिक नीतियों को लोकतांत्रिक वैधता प्रदान करती हैं।

उन्होंने कहा कि SDG लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संसदों को सक्षम कानून बनाने, पर्याप्त संसाधन आवंटित करने, कार्यान्वयन की निगरानी करने और समाज के सभी वर्गों की आवाज़ सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी उठानी होगी। गौरतलब है कि वैश्विक प्रतिबद्धताओं और ज़मीनी कार्रवाई के बीच की खाई को पाटने में संसदें ही सबसे प्रभावी सेतु हैं।

भारत का दृष्टिकोण: वसुधैव कुटुम्बकम और विकसित भारत-2047

हरिवंश ने कहा कि निरंतर विकास जन-केंद्रित, समावेशी और न्यायसंगत होना चाहिए। उन्होंने 'वसुधैव कुटुम्बकम' अर्थात् 'पूरा विश्व एक परिवार है' के प्राचीन भारतीय दर्शन को वैश्विक सहयोग की आधारशिला बताया।

उन्होंने बताया कि भारत में लगभग दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, इसलिए युवा सतत विकास के अनिवार्य भागीदार हैं। 'विकसित भारत युवा संसद' जैसी पहलें युवाओं को लोकतांत्रिक संस्थाओं से जोड़ने और नवोन्मेषी विचारों के माध्यम से भविष्य निर्माण में योगदान देने का अवसर प्रदान करती हैं। विकसित भारत-2047 की परिकल्पना से प्रेरित होकर भारत एक समृद्ध, सुदृढ़ और सतत राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आगे की राह

अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर बोलते हुए हरिवंश ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के लिए वैश्विक प्रतिक्रिया ज़रूरी है। उन्होंने अधिक मज़बूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वित्त तक बेहतर पहुँच, प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान और 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व' के सिद्धांत के सम्मान की वकालत की।

उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुरूप सतत विकास को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त नीतिगत स्वतंत्रता और संसाधन मिलने चाहिए। संसदीय कूटनीति और सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान से वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए एक स्थायी, समावेशी और समृद्ध विश्व का निर्माण संभव है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि 2030 की समय-सीमा नज़दीक है। सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स संसदीय मंच जैसे मंच केवल प्रस्ताव पारित करने की औपचारिकता से आगे बढ़कर बाध्यकारी विधायी प्रतिबद्धताओं की ओर जाएंगे। 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व' का सिद्धांत सुनने में न्यायसंगत लगता है, लेकिन अक्सर विकसित देशों को जवाबदेही से बचने का रास्ता देता है। विकसित भारत-2047 की कल्पना और वैश्विक SDG एजेंडे को एक साथ साधना — यही असली परीक्षा है।
RashtraPress
27 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

12वाँ ब्रिक्स संसदीय मंच क्या है और यह कहाँ आयोजित हुआ?
12वाँ ब्रिक्स संसदीय मंच नई दिल्ली में 27 अक्टूबर 2026 को आयोजित हुआ, जिसमें ब्रिक्स सदस्य देशों के संसदीय प्रतिनिधि शामिल हुए। इसका विषय था — सतत और समावेशी भविष्य के निर्माण में संसद की भूमिका।
हरिवंश ने SDG लक्ष्यों की प्रगति पर क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र की SDG रिपोर्ट 2026 का हवाला देते हुए हरिवंश ने कहा कि 139 लक्ष्यों में से केवल 15% ही 2030 तक हासिल होने की दिशा में सही मार्ग पर हैं। उन्होंने इसे मानवता के लिए गंभीर चेतावनी बताया।
2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का विषय क्या है?
2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का विषय 'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और निरंतरता के लिए निर्माण' है। सितंबर 2026 में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अपनाई गई नई दिल्ली घोषणा इसी प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति है।
हरिवंश ने भारत के युवाओं और सतत विकास के बारे में क्या कहा?
हरिवंश ने कहा कि भारत में लगभग दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, इसलिए युवा सतत विकास के अनिवार्य भागीदार हैं। 'विकसित भारत युवा संसद' जैसी पहलें युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने और नवोन्मेषी विचारों से भविष्य निर्माण में सहयोग देने का अवसर प्रदान करती हैं।
संसदों की भूमिका SDG लक्ष्यों में कैसे महत्वपूर्ण है?
हरिवंश के अनुसार संसदें विधायी कार्यों, बजटीय निगरानी और जवाबदेही तंत्र के ज़रिए वैश्विक प्रतिबद्धताओं और स्थानीय कार्रवाई के बीच की खाई पाटती हैं। SDG लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संसदों को सक्षम कानून बनाने, संसाधन आवंटित करने और समाज के सभी वर्गों की आवाज़ सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी निभानी होगी।
राष्ट्र प्रेस
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