सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को निर्देश: दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग जाँचने को बने समिति
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को आदेश दिया कि वह फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों पर वैधानिक नियंत्रण की आवश्यकता की पड़ताल के लिए एक विशेष समिति गठित करे। इस आदेश में डॉक्टरों को उत्पाद-प्रचार के बदले उपहार, आतिथ्य एवं यात्रा सुविधाएँ देने जैसी प्रथाओं की जाँच का दायरा भी शामिल है।
मुख्य घटनाक्रम
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के वैधानिक नियमन और डॉक्टरों से अनैतिक संपर्क पर रोक की माँग वाली याचिका की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार तीन सदस्यीय समिति बनाएगी, जो यह जाँचेगी कि दवा कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए स्वतंत्र वैधानिक व्यवस्था की जरूरत है या नहीं।
यह समिति हितधारकों से सुझाव और आपत्तियाँ भी लेगी तथा अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंपेगी। न्यायालय ने केंद्र सरकार को अनुपालन-शपथपत्र दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को निर्धारित की गई है।
मौजूदा नियामक ढाँचे की खामी
याचिकाकर्ता का तर्क था कि मौजूदा व्यवस्था में गंभीर असमानता है — फार्मा कंपनियों से प्रलोभन लेने वाले डॉक्टरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान तो है, लेकिन ऐसे लाभ देने वाली दवा कंपनियों को नियंत्रित या दंडित करने के लिए समकक्ष वैधानिक व्यवस्था नहीं है। केंद्र सरकार ने स्वीकार किया कि खुद दवा कंपनियों के वैधानिक नियमन का प्रश्न अभी तक अनसुलझा है और प्रस्तावित समिति इसी पर विचार करेगी।
गौरतलब है कि यह मामला दवाओं की कीमत, जेनेरिक दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और दवा-लेखन प्रथाओं से जुड़ी अलग-अलग जनहित याचिकाओं के व्यापक समूह का हिस्सा है, जिन पर इसी पीठ के समक्ष सुनवाई चल रही है।
दवा मूल्य पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी
इन मामलों की पूर्व सुनवाइयों में सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं की आपूर्ति कीमत और उनके अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच के अत्यधिक अंतर पर केंद्र से कड़े सवाल किए थे। पीठ ने एक कैंसर की दवा का उदाहरण दिया था जिसकी MRP ₹27,000 है, जबकि वह खुदरा विक्रेताओं को मात्र ₹2,700–₹3,000 में उपलब्ध कराई जाती है।
न्यायालय ने इस करीब दस गुना के अंतर को 'दिनदहाड़े डकैती' करार देते हुए कहा था कि इतने बड़े अंतराल से मरीज को दवा के नकली होने का संदेह भी हो सकता है और उपभोक्ताओं का भरोसा टूटता है। पीठ ने यह भी पूछा था कि क्या आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे के फार्मास्यूटिकल उत्पादों के लिए एकसमान मार्जिन निर्धारित किया जा सकता है।
आम जनता पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब दवाओं की बढ़ती कीमतें और अनुचित दवा-लेखन प्रथाएँ आम मरीजों के लिए बड़ी चिंता का विषय बनी हुई हैं। आलोचकों का कहना है कि फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को दिए जाने वाले प्रलोभन अंततः महँगी ब्रांडेड दवाओं की पर्ची के रूप में मरीजों की जेब पर बोझ डालते हैं।
यदि प्रस्तावित समिति वैधानिक नियमन की सिफारिश करती है, तो यह भारत के फार्मा उद्योग और स्वास्थ्यसेवा तंत्र दोनों पर दूरगामी असर डाल सकती है।
क्या होगा आगे
केंद्र सरकार को अनुपालन-शपथपत्र दाखिल करना होगा और तीन सदस्यीय समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। समिति हितधारकों से परामर्श के बाद सरकार को सिफारिशें सौंपेगी। मामले पर अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी, जब न्यायालय अनुपालन की स्थिति की समीक्षा करेगा।