फार्मा कंपनियों के डॉक्टर-गिफ्ट रैकेट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र को नियामक कमेटी बनाने का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को आदेश दिया कि वह दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं — जिनमें डॉक्टरों को महंगे उपहार, विदेश यात्राएँ और नकद सुविधाएँ देना शामिल है — पर लगाम लगाने के लिए एक विशेष नियामक कमेटी का गठन करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कमेटी अपनी सिफारिशें केंद्र को सौंपेगी और सरकार को 29 जनवरी तक प्रगति रिपोर्ट के साथ हलफनामा दाखिल करना होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMRAI) की उस याचिका से उपजा है, जो 2021 में दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि अनेक दवा कंपनियाँ अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए डॉक्टरों को कथित तौर पर महंगे गिफ्ट, विदेश यात्राएँ और अन्य सुविधाएँ प्रदान करती हैं।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस अनैतिक प्रथा के चलते मरीजों को महंगी और कई बार अनावश्यक दवाएँ लिखी जाती हैं, जिससे सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य और आर्थिक हित प्रभावित होते हैं। गौरतलब है कि यह समस्या भारत में नई नहीं है — चिकित्सा क्षेत्र में फार्मा प्रमोशन के दुरुपयोग को लेकर संसदीय समितियाँ भी कई बार चिंता जता चुकी हैं।
सरकार का पिछला रुख और कोर्ट की सख्ती
पिछली सुनवाइयों में केंद्र सरकार ने अदालत से नियम बनाने के लिए अतिरिक्त समय माँगा था और कहा था कि वह इस मुद्दे पर एक नीतिगत रूपरेखा तैयार कर रही है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस टालमटोल पर असंतोष जताते हुए अब ठोस कार्रवाई का आदेश जारी किया है।
यह ऐसे समय में आया है जब देश में दवाओं की कीमतों और उनकी उचित प्रिस्क्रिप्शन को लेकर सामाजिक बहस तेज़ हो रही है। अदालत की इस सक्रियता को न्यायिक निगरानी के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।
कमेटी का दायरा और काम
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा गठित यह कमेटी निम्नलिखित कार्य करेगी: दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने के लिए कानूनी सुझाव देना; डॉक्टरों को उपहार या अन्य लाभ देने जैसी गतिविधियों पर कानूनी प्रावधानों की सिफारिश करना; और आम नागरिकों, विशेषज्ञों तथा संबंधित संस्थाओं के सुझावों व आपत्तियों पर विचार कर अंतिम सिफारिशें केंद्र को सौंपना।
इसके साथ ही, केंद्र सरकार को इस आदेश पर की गई कार्रवाई के बारे में अदालत में हलफनामा दाखिल करना होगा।
आम मरीजों पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, फार्मा-डॉक्टर उपहार प्रथा के कारण प्रिस्क्रिप्शन में उन दवाओं को प्राथमिकता दी जाती है जो ज़रूरी नहीं बल्कि महंगी होती हैं। इससे मरीज़ — विशेषकर निम्न और मध्यम वर्ग के — पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। आलोचकों का कहना है कि इस अनैतिक प्रथा ने चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुँचाया है।
आगे की सुनवाई
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को निर्धारित की है। उस तारीख तक केंद्र सरकार को यह बताना होगा कि कमेटी के गठन और नियम-निर्माण की प्रक्रिया में क्या प्रगति हुई है। यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई, तो अदालत अतिरिक्त निर्देश जारी कर सकती है।