8 अक्टूबर 2026
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फार्मा कंपनियों के डॉक्टर-गिफ्ट रैकेट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र को नियामक कमेटी बनाने का आदेश

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फार्मा कंपनियों के डॉक्टर-गिफ्ट रैकेट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र को नियामक कमेटी बनाने का आदेश

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग पर लगाम लगाने के लिए एक नियामक कमेटी बनाई जाए। 2021 से लंबित FMRAI याचिका पर यह बड़ा कदम है, जो सीधे मरीज़ों की जेब और स्वास्थ्य से जुड़ा है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को फार्मा मार्केटिंग प्रथाओं पर नियामक कमेटी गठित करने का आदेश दिया।
FMRAI की 2021 में दायर याचिका पर यह फैसला आया; याचिका में डॉक्टरों को उपहार देने वाली दवा कंपनियों की जवाबदेही की माँग थी।
कमेटी आम नागरिकों, विशेषज्ञों और संस्थाओं के सुझाव लेकर कानूनी सिफारिशें केंद्र को सौंपेगी।
केंद्र सरकार को कार्रवाई पर हलफनामा दाखिल करना होगा; अगली सुनवाई 29 जनवरी को।
इस प्रथा से मरीज़ों को कथित तौर पर महंगी और अनावश्यक दवाएँ लिखी जाती थीं, जिससे आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ता था।

सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को आदेश दिया कि वह दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं — जिनमें डॉक्टरों को महंगे उपहार, विदेश यात्राएँ और नकद सुविधाएँ देना शामिल है — पर लगाम लगाने के लिए एक विशेष नियामक कमेटी का गठन करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कमेटी अपनी सिफारिशें केंद्र को सौंपेगी और सरकार को 29 जनवरी तक प्रगति रिपोर्ट के साथ हलफनामा दाखिल करना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMRAI) की उस याचिका से उपजा है, जो 2021 में दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि अनेक दवा कंपनियाँ अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए डॉक्टरों को कथित तौर पर महंगे गिफ्ट, विदेश यात्राएँ और अन्य सुविधाएँ प्रदान करती हैं।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस अनैतिक प्रथा के चलते मरीजों को महंगी और कई बार अनावश्यक दवाएँ लिखी जाती हैं, जिससे सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य और आर्थिक हित प्रभावित होते हैं। गौरतलब है कि यह समस्या भारत में नई नहीं है — चिकित्सा क्षेत्र में फार्मा प्रमोशन के दुरुपयोग को लेकर संसदीय समितियाँ भी कई बार चिंता जता चुकी हैं।

सरकार का पिछला रुख और कोर्ट की सख्ती

पिछली सुनवाइयों में केंद्र सरकार ने अदालत से नियम बनाने के लिए अतिरिक्त समय माँगा था और कहा था कि वह इस मुद्दे पर एक नीतिगत रूपरेखा तैयार कर रही है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस टालमटोल पर असंतोष जताते हुए अब ठोस कार्रवाई का आदेश जारी किया है।

यह ऐसे समय में आया है जब देश में दवाओं की कीमतों और उनकी उचित प्रिस्क्रिप्शन को लेकर सामाजिक बहस तेज़ हो रही है। अदालत की इस सक्रियता को न्यायिक निगरानी के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।

कमेटी का दायरा और काम

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा गठित यह कमेटी निम्नलिखित कार्य करेगी: दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने के लिए कानूनी सुझाव देना; डॉक्टरों को उपहार या अन्य लाभ देने जैसी गतिविधियों पर कानूनी प्रावधानों की सिफारिश करना; और आम नागरिकों, विशेषज्ञों तथा संबंधित संस्थाओं के सुझावों व आपत्तियों पर विचार कर अंतिम सिफारिशें केंद्र को सौंपना।

इसके साथ ही, केंद्र सरकार को इस आदेश पर की गई कार्रवाई के बारे में अदालत में हलफनामा दाखिल करना होगा।

आम मरीजों पर असर

विशेषज्ञों के अनुसार, फार्मा-डॉक्टर उपहार प्रथा के कारण प्रिस्क्रिप्शन में उन दवाओं को प्राथमिकता दी जाती है जो ज़रूरी नहीं बल्कि महंगी होती हैं। इससे मरीज़ — विशेषकर निम्न और मध्यम वर्ग के — पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। आलोचकों का कहना है कि इस अनैतिक प्रथा ने चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुँचाया है।

आगे की सुनवाई

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को निर्धारित की है। उस तारीख तक केंद्र सरकार को यह बताना होगा कि कमेटी के गठन और नियम-निर्माण की प्रक्रिया में क्या प्रगति हुई है। यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई, तो अदालत अतिरिक्त निर्देश जारी कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि एक और कमेटी क्या बदलेगी जब इस समस्या पर संसदीय समितियाँ भी वर्षों से रिपोर्टें दे चुकी हैं। भारत में फार्मा-डॉक्टर संबंधों को नियंत्रित करने वाला 'यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज़' (UCPMP) लंबे समय से स्वैच्छिक रहा है — अनिवार्य नहीं — और यही इसकी सबसे बड़ी खामी है। जब तक कमेटी की सिफारिशों को बाध्यकारी कानूनी दर्जा नहीं मिलता और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान नहीं होता, तब तक यह आदेश भी पिछले प्रयासों की तरह कागज़ी साबित हो सकता है। मरीज़-केंद्रित स्वास्थ्य नीति के लिए नियामक दाँत ज़रूरी हैं, केवल सुझाव देने वाली कमेटी नहीं।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने फार्मा कंपनियों और डॉक्टरों के मामले में क्या आदेश दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को एक विशेष कमेटी बनाने का आदेश दिया है, जो दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं — जैसे डॉक्टरों को उपहार और विदेश यात्राएँ देना — पर कानूनी नियम बनाने की सिफारिशें करेगी। सरकार को अगली सुनवाई 29 जनवरी तक हलफनामा भी दाखिल करना होगा।
FMRAI की याचिका में क्या माँग की गई थी?
फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMRAI) ने 2021 में दायर याचिका में माँग की थी कि डॉक्टरों को उपहार देने वाली दवा कंपनियों की जवाबदेही तय की जाए और इस अनैतिक मार्केटिंग प्रथा पर सख्त कानून बनाया जाए। याचिका में कहा गया था कि इससे मरीज़ों को महंगी और अनावश्यक दवाएँ लिखी जाती हैं।
यह मामला आम मरीज़ों को कैसे प्रभावित करता है?
आरोप है कि फार्मा कंपनियों के उपहारों के कारण डॉक्टर महंगी और कभी-कभी ग़ैर-ज़रूरी दवाएँ लिखते हैं, जिससे मरीज़ — विशेषकर कम आय वर्ग के — पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। यह प्रथा सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सकीय नैतिकता दोनों को प्रभावित करती है।
नई कमेटी क्या काम करेगी और कब तक रिपोर्ट देगी?
कमेटी दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने के लिए कानूनी सुझाव तैयार करेगी, आम नागरिकों और विशेषज्ञों के सुझाव लेगी और अंतिम सिफारिशें केंद्र को सौंपेगी। 29 जनवरी को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार को कमेटी गठन की प्रगति बतानी होगी।
इससे पहले केंद्र सरकार का क्या रुख था?
पिछली सुनवाइयों में केंद्र सरकार ने अदालत से नियम बनाने के लिए अतिरिक्त समय माँगा था और कहा था कि वह इस मुद्दे पर एक नीतिगत रूपरेखा तैयार कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस देरी पर असंतोष जताते हुए अब ठोस कार्रवाई का आदेश जारी किया है।
राष्ट्र प्रेस
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