राजस्थान: पद्मजा कुमारी परमार ने मधुमेह के खिलाफ कलंक मिटाने की अपील की

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राजस्थान: पद्मजा कुमारी परमार ने मधुमेह के खिलाफ कलंक मिटाने की अपील की

सारांश

राजकुमारी पद्मजा कुमारी परमार का जीवन मधुमेह से जूझने के साहसी सफर की कहानी है। उन्होंने जागरूकता बढ़ाने और कलंक मिटाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

मुख्य बातें

मधुमेह से जुड़े कलंक को खत्म करने का प्रयास इंसुलिन का महत्व समझाना सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के लिए कदम उठाना

जयपुर, 28 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। एक ऐसी दुनिया में जहां अक्सर राजपरिवार को विशेषाधिकार से जोड़ा जाता है, मेवाड़ राजवंश की राजकुमारी पद्मजा कुमारी परमार की कहानी इससे एकदम भिन्न है। उनकी कहानी अनुशासन, दृढ़ता और दृढ़ संकल्प से भरी हुई है।

पाँच साल की उम्र में टाइप-वन मधुमेह से ग्रसित होने के बाद, उनका जीवन उस बीमारी से शुरू हुआ जिसे वे मुश्किल से समझ पाती थीं। डर और उलझन से शुरू हुआ यह सफर जल्द ही साहस का एक आजीवन सबक बन गया।

पद्मजा ने याद करते हुए कहा कि जब मुझे मधुमेह का पता चला, तो चारों ओर डर और उलझन का माहौल था। लेकिन मेरी माँ ने मुझे कभी कमजोर महसूस नहीं करने दिया। उन्होंने मुझे सिखाया कि इंसुलिन बोझ नहीं है, यह मेरी ताकत है, मेरा जीवन है।

ऐसे समय में जब अंधविश्वास और घरेलू उपचारों का व्यापक रूप से सुझाव दिया जाता था, उनकी माँ ने इंसुलिन का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया, यह समझाते हुए कि टाइप-वन मधुमेह एक स्वप्रतिरक्षित स्थिति है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पद्मजा ने कहा कि इसी स्पष्टता ने उनके जीवन की दिशा तय की। बचपन से ही उनके मन में एक सवाल बना रहा: उन लोगों का क्या होगा जिनके पास इंसुलिन उपलब्ध नहीं है? आज यही सवाल उनके काम को प्रेरित करता है।

जयपुर में आयोजित मधुमेह कलंक को समाप्त करने के लिए वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्र प्रेस से बातचीत में उन्होंने सोच में बदलाव का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि चालीस साल बाद, हम कलंक से मुक्ति के हकदार हैं। इससे कम कुछ भी अस्वीकार्य है।

उन्होंने कहा कि उनकी दृढ़ता उनकी परवरिश में निहित है। अपने पिता, स्वर्गीय अरविंद सिंह मेवाड़ को याद करते हुए उन्होंने अपने माता-पिता को अपने दृष्टिकोण को आकार देने का श्रेय दिया। मेरा संघर्ष बचपन से ही शुरू हो गया था, लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे इससे डर से नहीं, बल्कि साहस और बुद्धिमत्ता से लड़ना सिखाया।

पद्मजा का अभियान केवल शब्दों तक सीमित नहीं है। उन्होंने हाल ही में राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री से मुलाकात कर प्रत्येक जिला स्वास्थ्य केंद्र पर इंसुलिन की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की, जिसके परिणामस्वरूप जमीनी स्तर पर पहुंच और जागरूकता बढ़ाने की प्रतिबद्धताएं सामने आईं।

उन्होंने कहा कि इसके पीछे कोई राजनीति नहीं थी, केवल उद्देश्य था, और इसलिए अनुरोध स्वीकार कर लिया गया।

राजस्थान सरकार के स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी सुनील कुमार ने पद्माजा के निरंतर प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि पद्माजा राजस्थान भर में मधुमेह के प्रति जागरूकता बढ़ाने में लगातार योगदान दे रही हैं। जन स्वास्थ्य जागरूकता पहलों में उनका निरंतर सहयोग सराहनीय और वास्तव में प्रभावशाली है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पद्मजा कुमारी परमार ने मधुमेह के प्रति जागरूकता कैसे बढ़ाई?
पद्मजा ने स्वास्थ्य मंत्री से मुलाकात कर हर जिला स्वास्थ्य केंद्र पर इंसुलिन की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की।
टाइप-वन मधुमेह क्या है?
टाइप-वन मधुमेह एक स्वप्रतिरक्षित स्थिति है जहां शरीर इंसुलिन का उत्पादन नहीं कर पाता।
पद्मजा की कहानी में क्या मुख्य संदेश है?
उनकी कहानी का मुख्य संदेश है कि मानसिक दृढ़ता और जागरूकता से हम सामाजिक कलंक को समाप्त कर सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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