पाकिस्तान के पंजाब में 500 से अधिक लड़कियाँ लापता, लाहौर हाईकोर्ट ने आईजीपी से माँगी विस्तृत रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में फिलहाल 500 से अधिक लड़कियों के लापता होने के मामले लंबित हैं — यह चौंकाने वाला आँकड़ा पंजाब के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (आईजीपी) राव अब्दुल करीम ने स्वयं लाहौर हाईकोर्ट में स्वीकार किया। 9 अक्टूबर 2026 को हुई इस सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस की निष्क्रियता पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए विस्तृत रिपोर्ट तलब की।
मुख्य घटनाक्रम
लाहौर हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश आलिया नीलम फैसलाबाद निवासी सादिया हुसैन की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थीं, जिसमें उन्होंने अपनी लापता बेटी को बरामद करने की माँग की थी। सुनवाई के दौरान जब न्यायाधीश ने प्रांत में लंबित लापता लड़कियों के मामलों की संख्या पूछी, तो आईजीपी राव अब्दुल करीम ने स्वीकार किया कि यह आँकड़ा 500 से अधिक है।
न्यायाधीश ने यह भी पूछा कि क्या पुलिस महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में कोई विशेष तंत्र अपनाती है। आईजीपी ने बताया कि इन मामलों के लिए विशेष समितियाँ गठित की गई हैं, हालाँकि अदालत इस जवाब से संतुष्ट नहीं दिखी।
न्यायाधीश की कड़ी टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश आलिया नीलम ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस तभी सक्रिय होती है जब अदालत स्वयं किसी मामले का संज्ञान लेती है। उन्होंने एक ऐसे मामले का हवाला दिया जिसमें एक लड़की दो वर्षों तक लापता रही और अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही उसे खोजा जा सका।
न्यायाधीश ने आईजीपी को निर्देश दिया कि लापता लड़कियों की तलाश के लिए किए जा रहे प्रयासों की एक विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश की जाए। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान में महिला सुरक्षा को लेकर नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठन पहले से ही सवाल उठाते रहे हैं।
लाहौर में यौन अपराधों के आँकड़े
अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (VOPM) ने आँकड़े जारी करते हुए बताया कि लाहौर में 2026 के पहले आठ महीनों में 498 दुष्कर्म और 36 सामूहिक दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए हैं। संगठन के अनुसार, यदि अन्य यौन अपराधों को भी जोड़ा जाए तो कुल संख्या 1,108 तक पहुँचती है — यानी औसतन प्रतिदिन 4 से अधिक यौन अपराध।
संगठन ने कहा, 'कोई भी इलाका इससे अछूता नहीं है और कोई भी समुदाय पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। ये अपराध केवल सुनसान या पिछड़े इलाकों तक सीमित नहीं, बल्कि अमीर बस्तियों, भीड़भाड़ वाले बाज़ारों और शांत रिहायशी क्षेत्रों में भी हो रहे हैं।'
रिपोर्टिंग से भी बड़ी है असली समस्या
मानवाधिकार संगठनों का लंबे समय से यह कहना है कि दर्ज एफआईआर वास्तविक अपराधों की तुलना में बेहद कम होती हैं। VOPM के अनुसार सामाजिक बदनामी, शर्म, पारिवारिक दबाव, पुलिस पर भरोसे की कमी और समाज से बहिष्कृत किए जाने का डर — ये सभी कारण पीड़ितों को सामने आने से रोकते हैं।
संगठन ने कहा, 'बहुत से लोग शिकायत दर्ज नहीं कराते, कई को चुप रहने के लिए कहा जाता है और कई मामलों में पीड़ितों को ही दोषी ठहराया जाता है। दर्ज मामलों की संख्या का बढ़ना दो बातों का संकेत हो सकता है — एक ओर अपराध बढ़ रहे हैं और दूसरी ओर पीड़ितों में शिकायत दर्ज कराने का साहस भी बढ़ रहा है। लेकिन अधिक रिपोर्टिंग के बावजूद व्यवस्था अक्सर न्याय माँगने वालों को निराश करती है।'
आगे की राह
लाहौर हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप पाकिस्तान में महिला सुरक्षा के मुद्दे पर न्यायपालिका की बढ़ती सक्रियता को दर्शाता है। अदालत ने आईजीपी को जो रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है, वह आगामी सुनवाई में इस संकट की वास्तविक गहराई को सामने ला सकती है और पुलिस-सुधार पर बहस को और तेज़ कर सकती है।