पाकिस्तान में एआरटी केंद्रों से 20,000 एचआईवी मरीज लापता, संसदीय समिति ने उठाए गंभीर सवाल
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली की स्वास्थ्य संबंधी स्थायी समिति को मंगलवार को बताया गया कि देशभर के एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) केंद्रों में पंजीकृत लगभग 20,000 एचआईवी/एड्स मरीज अब "लापता" हैं — यानी इलाज शुरू करने के बाद वे सिस्टम से पूरी तरह बाहर हो गए। 5 मई 2026 को हुई इस बैठक में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा पेश किए गए आँकड़ों ने फॉलो-अप व्यवस्था, काउंसलिंग और मरीज-प्रतिधारण तंत्र पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
संसदीय समिति में क्या सामने आया
समिति की अध्यक्षता कर रहे डॉ. महेश कुमार मलानी ने पाकिस्तान में एचआईवी/एड्स के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय से विस्तृत ब्रीफिंग की माँग की। प्रमुख दैनिक डॉन के अनुसार, मंत्रालय ने बंद कमरे (इन-कैमरा) में ब्रीफिंग देने का प्रस्ताव रखा, जिसे समिति के सदस्यों ने पारदर्शिता की ज़रूरत बताते हुए खारिज कर दिया। स्वास्थ्य मंत्री मुस्तफा कमाल ने स्वीकार किया कि देश के एचआईवी/एड्स कार्यक्रमों को सहारा मुख्यतः ग्लोबल फंड की विदेशी सहायता से ही मिलता है।
आँकड़ों की भयावह तस्वीर
आँकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में एचआईवी संक्रमण पिछले 15 वर्षों में करीब 200 प्रतिशत बढ़ा है — 2010 में जो संख्या 16,000 थी, वह 2024 में बढ़कर 48,000 नए वार्षिक मामलों तक पहुँच गई। एक अनुमान के मुताबिक कुल संक्रमितों की संख्या 3,69,000 है, जबकि पंजीकृत मामले केवल 84,000 हैं। 2025 में अकेले 14,000 नए मामले सामने आए। इन्हीं पंजीकृत मरीजों में से लगभग 20,000 ने इलाज शुरू करने के बाद एआरटी केंद्रों से संपर्क तोड़ लिया। राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार दर 0.2% है — वैश्विक औसत 0.5% से कम — लेकिन ताऊंसा, कोट मोमिन और दक्षिण पंजाब जैसे क्षेत्रों में संक्रमण की रफ्तार ज़्यादा तेज़ बताई जा रही है।
कराची में बच्चों पर असर, विशेषज्ञों की चेतावनी
कराची के तीन अस्पतालों में पिछले नौ महीनों में बच्चों में एचआईवी मामलों में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों ने इसे "खतरनाक" करार देते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने की माँग की है। यह ऐसे समय में आया है जब अस्पतालों में असुरक्षित चिकित्सा प्रथाओं को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे थे।
प्रसार की वजहें और व्यवस्थागत खामियाँ
समिति ने उन कारणों की ओर ध्यान दिलाया जो संक्रमण को और फैला रहे हैं। प्रतिबंध के बावजूद बाज़ार में असुरक्षित सिरिंज आसानी से उपलब्ध हैं। ब्लड बैंक और ट्रांसफ्यूजन सिस्टम पर पर्याप्त निगरानी नहीं रखी जा रही। जागरूकता अभियानों की कमी और सामाजिक बहिष्कार का भय मरीजों को इलाज से दूर कर रहा है। गौरतलब है कि इलाज शुरू करने के बाद मरीजों का सिस्टम से बाहर हो जाना — जिसे चिकित्सा भाषा में "लॉस टु फॉलो-अप" कहा जाता है — एचआईवी नियंत्रण कार्यक्रमों की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक माना जाता है।
विशेषज्ञों की सिफारिशें और आगे की राह
विशेषज्ञों ने सिंगल-यूज सिरिंज के सख्त पालन, सुरक्षित चिकित्सा प्रथाओं और एक राष्ट्रीय डेटा डैशबोर्ड बनाने की सिफारिश की है, जिसमें एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और अन्य संक्रामक रोगों की विश्वसनीय जानकारी एकीकृत रूप से उपलब्ध हो। यह संकट केवल स्वास्थ्य प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि जागरूकता, निगरानी और सामाजिक रवैये की समग्र चुनौती को रेखांकित करता है। 20,000 "लापता" मरीज इस बात की कड़ी चेतावनी हैं कि इलाज शुरू करना ही पर्याप्त नहीं — उसे निरंतर बनाए रखना और मरीजों को प्रणाली से जोड़े रखना उतना ही अनिवार्य है।