एआई भारत के किसानों को बदल सकता है, नौकरियों पर खतरा नहीं: वर्ल्ड बैंक प्रमुख अजय बंगा
सारांश
मुख्य बातें
वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भारत जैसे विकासशील देशों में किसानों और श्रमिकों की जिंदगी बदलने की असाधारण क्षमता रखता है — और विकसित देशों के विपरीत, यहाँ नौकरियों पर फौरी खतरा नहीं है। 5 अक्टूबर 2026 को कोलंबिया यूनिवर्सिटी में सीएनएन के पत्रकार फरीद जकारिया के साथ चर्चा में बंगा ने उत्तर प्रदेश में महिला किसानों की मदद करने वाली एक एआई पहल का विशेष उल्लेख किया।
उत्तर प्रदेश की एआई पहल: खेत से मोबाइल तक
बंगा ने बताया कि वर्ल्ड बैंक ने गूगल के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में ऐसे एप्लिकेशन लॉन्च किए हैं जो अनपढ़ महिला किसानों को एक सहकारी समिति (कोऑपरेटिव) से जोड़ते हैं। उन्होंने कहा, "हम उन्हें एक ऐसा टूल देते हैं, जिससे वे 3जी फोन पर बोल सकती हैं, कैमरे को किसी बीमार पौधे की पत्ती के पिछले हिस्से की ओर कर सकती हैं और वह टूल उन्हें बीमारी के बारे में बता देता है — साथ ही यह भी बताता है कि स्थानीय कोऑपरेटिव से ₹25 में कौन सी कीटनाशक दवा मिलेगी।"
बंगा के अनुसार, "अब आपने एक अनपढ़ महिला किसान के लिए भी बेहतरीन जानकारी तक पहुँच को आसान बना दिया है — और मेरे लिए, यह असल में एआई का ही कमाल है।" उन्होंने इसी तर्ज पर हेल्थकेयर और शिक्षा जैसे अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे अवसरों की संभावना जताई।
'छोटा एआई' बड़ा बदलाव: उभरती अर्थव्यवस्थाओं का नुस्खा
बंगा ने 'छोटे एआई' की अवधारणा पर जोर दिया — यानी ऐसे प्रेडिक्टिव टूल जो कृषि उत्पादकता, बेहतर शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य सेवा में सुधार कर सकते हैं। उनके अनुसार बड़े लैंग्वेज मॉडल (LLM) और जेनरेटिव एआई के लिए पाँच बड़ी ज़रूरतें होती हैं — अत्यधिक कंप्यूटिंग पावर, भारी ऊर्जा खपत, विशाल डेटा, कुशल जनशक्ति और पूंजी।
उन्होंने कहा, "बहुत कम उभरते बाजार ऐसे हैं जहाँ ये पाँचों चीजें एक साथ मौजूद हों।" इसीलिए, उनका तर्क है कि विकासशील देशों के लिए 'छोटे एआई' एप्लिकेशन एक अधिक व्यावहारिक और तत्काल अवसर हैं।
विकसित देशों में एआई से नौकरियों का जोखिम
बंगा ने स्पष्ट किया कि एआई का असर देशों की आय स्तर के अनुसार अलग अलग होगा। उन्होंने कहा, "विकसित देशों में लार्ज लैंग्वेज मॉडल से एक तिहाई तक नौकरियाँ प्रभावित हो सकती हैं। लेकिन जैसे ही आप मध्यम आय वाले देश में आते हैं, यह संख्या सिंगल डिजिट में आ जाती है। और जब आप कम आय वाले देश में पहुँचते हैं, तो यह शून्य हो जाती है।"
इस आकलन के अनुसार, भारत और इसी तरह के देशों में एआई नौकरियों को नष्ट करने से पहले उत्पादकता और रोजगार बढ़ाने का काम करेगा — जो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में हो रही बहस से बिल्कुल उलट तस्वीर है।
ग्रीस के प्रधानमंत्री की चेतावनी: विकसित देशों का मध्यवर्ग दबाव में
इसी चर्चा में मौजूद ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस ने कहा कि विकसित देशों की स्थिति कहीं अधिक जटिल है। उन्होंने वकालत जैसे पेशों का उदाहरण दिया, जहाँ एआई तेजी से शोध और दस्तावेज़ीकरण का काम संभाल सकता है — कार्य जो परंपरागत रूप से युवा पेशेवरों को सौंपे जाते हैं।
मित्सोताकिस ने चेतावनी दी, "भारत के किसानों के लिए तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन विकसित दुनिया के मिडिल क्लास के लिए — जो पहले ही वैश्वीकरण की मार झेल चुका है — अब एआई व्हाइट कॉलर नौकरियों पर असर डाल रहा है और रोबोटिक्स मैन्युफैक्चरिंग की बची खुची नौकरियों को खत्म कर रहा है।" उनके मुताबिक इससे विकसित देशों के मध्यवर्ग के लिए भविष्य को लेकर उम्मीद की गुंजाइश सीमित हो जाती है।
आगे का रास्ता
बंगा का यह नज़रिया वैश्विक एआई बहस में एक अहम मोड़ है — जहाँ विकासशील देशों को खतरे के बजाय अवसर के चश्मे से देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश की पहल इस बात का व्यावहारिक प्रमाण है कि न्यूनतम बुनियादी ढाँचे के साथ भी 'छोटा एआई' ज़मीनी बदलाव ला सकता है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस तकनीकी बढ़त को कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा के व्यापक दायरे में कितनी तेजी से समेट पाता है।