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एआई भारत के किसानों को बदल सकता है, नौकरियों पर खतरा नहीं: वर्ल्ड बैंक प्रमुख अजय बंगा

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एआई भारत के किसानों को बदल सकता है, नौकरियों पर खतरा नहीं: वर्ल्ड बैंक प्रमुख अजय बंगा

सारांश

वर्ल्ड बैंक प्रमुख अजय बंगा का दावा — एआई भारत जैसे देशों में नौकरियाँ छीनने नहीं, बल्कि किसानों को सशक्त करने आया है। उत्तर प्रदेश में गूगल के साथ चल रही पहल इसका जीता जागता उदाहरण है, जहाँ ₹25 की दवा और एक 3जी फोन से अनपढ़ महिला किसान फसल की बीमारी पहचान लेती है।

मुख्य बातें

वर्ल्ड बैंक अध्यक्ष अजय बंगा ने कहा कि एआई भारत जैसे विकासशील देशों में किसानों की उत्पादकता बढ़ाने का बड़ा अवसर है।
उत्तर प्रदेश में गूगल के साथ मिलकर एआई एप्लिकेशन लॉन्च किए गए हैं, जो अनपढ़ महिला किसानों को 3जी फोन पर फसल की बीमारी पहचानने में मदद करते हैं।
दवा की कीमत मात्र ₹25 ; स्थानीय कोऑपरेटिव से उपलब्ध।
बंगा के अनुसार विकसित देशों में LLM से एक तिहाई नौकरियाँ प्रभावित हो सकती हैं, जबकि कम आय वाले देशों में यह संख्या शून्य के करीब है।
ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस ने चेतावनी दी कि विकसित देशों का मध्यवर्ग एआई और रोबोटिक्स, दोनों से दबाव में है।
'छोटे एआई' — यानी प्रेडिक्टिव टूल — को उभरते बाजारों के लिए कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य में सबसे तत्काल अवसर बताया गया।

वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भारत जैसे विकासशील देशों में किसानों और श्रमिकों की जिंदगी बदलने की असाधारण क्षमता रखता है — और विकसित देशों के विपरीत, यहाँ नौकरियों पर फौरी खतरा नहीं है। 5 अक्टूबर 2026 को कोलंबिया यूनिवर्सिटी में सीएनएन के पत्रकार फरीद जकारिया के साथ चर्चा में बंगा ने उत्तर प्रदेश में महिला किसानों की मदद करने वाली एक एआई पहल का विशेष उल्लेख किया।

उत्तर प्रदेश की एआई पहल: खेत से मोबाइल तक

बंगा ने बताया कि वर्ल्ड बैंक ने गूगल के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में ऐसे एप्लिकेशन लॉन्च किए हैं जो अनपढ़ महिला किसानों को एक सहकारी समिति (कोऑपरेटिव) से जोड़ते हैं। उन्होंने कहा, "हम उन्हें एक ऐसा टूल देते हैं, जिससे वे 3जी फोन पर बोल सकती हैं, कैमरे को किसी बीमार पौधे की पत्ती के पिछले हिस्से की ओर कर सकती हैं और वह टूल उन्हें बीमारी के बारे में बता देता है — साथ ही यह भी बताता है कि स्थानीय कोऑपरेटिव से ₹25 में कौन सी कीटनाशक दवा मिलेगी।"

बंगा के अनुसार, "अब आपने एक अनपढ़ महिला किसान के लिए भी बेहतरीन जानकारी तक पहुँच को आसान बना दिया है — और मेरे लिए, यह असल में एआई का ही कमाल है।" उन्होंने इसी तर्ज पर हेल्थकेयर और शिक्षा जैसे अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे अवसरों की संभावना जताई।

'छोटा एआई' बड़ा बदलाव: उभरती अर्थव्यवस्थाओं का नुस्खा

बंगा ने 'छोटे एआई' की अवधारणा पर जोर दिया — यानी ऐसे प्रेडिक्टिव टूल जो कृषि उत्पादकता, बेहतर शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य सेवा में सुधार कर सकते हैं। उनके अनुसार बड़े लैंग्वेज मॉडल (LLM) और जेनरेटिव एआई के लिए पाँच बड़ी ज़रूरतें होती हैं — अत्यधिक कंप्यूटिंग पावर, भारी ऊर्जा खपत, विशाल डेटा, कुशल जनशक्ति और पूंजी।

उन्होंने कहा, "बहुत कम उभरते बाजार ऐसे हैं जहाँ ये पाँचों चीजें एक साथ मौजूद हों।" इसीलिए, उनका तर्क है कि विकासशील देशों के लिए 'छोटे एआई' एप्लिकेशन एक अधिक व्यावहारिक और तत्काल अवसर हैं।

विकसित देशों में एआई से नौकरियों का जोखिम

बंगा ने स्पष्ट किया कि एआई का असर देशों की आय स्तर के अनुसार अलग अलग होगा। उन्होंने कहा, "विकसित देशों में लार्ज लैंग्वेज मॉडल से एक तिहाई तक नौकरियाँ प्रभावित हो सकती हैं। लेकिन जैसे ही आप मध्यम आय वाले देश में आते हैं, यह संख्या सिंगल डिजिट में आ जाती है। और जब आप कम आय वाले देश में पहुँचते हैं, तो यह शून्य हो जाती है।"

इस आकलन के अनुसार, भारत और इसी तरह के देशों में एआई नौकरियों को नष्ट करने से पहले उत्पादकता और रोजगार बढ़ाने का काम करेगा — जो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में हो रही बहस से बिल्कुल उलट तस्वीर है।

ग्रीस के प्रधानमंत्री की चेतावनी: विकसित देशों का मध्यवर्ग दबाव में

इसी चर्चा में मौजूद ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस ने कहा कि विकसित देशों की स्थिति कहीं अधिक जटिल है। उन्होंने वकालत जैसे पेशों का उदाहरण दिया, जहाँ एआई तेजी से शोध और दस्तावेज़ीकरण का काम संभाल सकता है — कार्य जो परंपरागत रूप से युवा पेशेवरों को सौंपे जाते हैं।

मित्सोताकिस ने चेतावनी दी, "भारत के किसानों के लिए तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन विकसित दुनिया के मिडिल क्लास के लिए — जो पहले ही वैश्वीकरण की मार झेल चुका है — अब एआई व्हाइट कॉलर नौकरियों पर असर डाल रहा है और रोबोटिक्स मैन्युफैक्चरिंग की बची खुची नौकरियों को खत्म कर रहा है।" उनके मुताबिक इससे विकसित देशों के मध्यवर्ग के लिए भविष्य को लेकर उम्मीद की गुंजाइश सीमित हो जाती है।

आगे का रास्ता

बंगा का यह नज़रिया वैश्विक एआई बहस में एक अहम मोड़ है — जहाँ विकासशील देशों को खतरे के बजाय अवसर के चश्मे से देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश की पहल इस बात का व्यावहारिक प्रमाण है कि न्यूनतम बुनियादी ढाँचे के साथ भी 'छोटा एआई' ज़मीनी बदलाव ला सकता है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस तकनीकी बढ़त को कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा के व्यापक दायरे में कितनी तेजी से समेट पाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसमें एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रहता है — भारत में डिजिटल बुनियादी ढाँचे की असमानता। उत्तर प्रदेश की पहल एक प्रभावशाली पायलट है, पर पायलट से नीति तक की यात्रा में हमेशा सबसे बड़ी खाई रहती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि 'छोटा एआई' का उपयोग जहाँ आज लाभकारी है, वहीं डेटा की निर्भरता और कॉर्पोरेट प्लेटफार्मों पर किसानों की बढ़ती निर्भरता भविष्य में नई असमानताओं को जन्म दे सकती है। मुख्यधारा की कवरेज इस पहलू को अक्सर नज़रअंदाज करती है।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वर्ल्ड बैंक और गूगल की उत्तर प्रदेश एआई पहल क्या है?
वर्ल्ड बैंक और गूगल ने मिलकर उत्तर प्रदेश में ऐसे एप्लिकेशन लॉन्च किए हैं जो अनपढ़ महिला किसानों को 3जी फोन पर बोलकर और कैमरे से बीमार पौधे की पत्ती की तस्वीर लेकर फसल की बीमारी पहचानने में मदद करते हैं। यह टूल बीमारी के साथ साथ स्थानीय कोऑपरेटिव से ₹25 में उपलब्ध कीटनाशक दवा की जानकारी भी देता है।
क्या एआई भारत में नौकरियाँ छीन लेगा?
वर्ल्ड बैंक प्रमुख अजय बंगा के अनुसार, कम आय वाले और विकासशील देशों में एआई से नौकरियों पर तत्काल खतरा शून्य के करीब है। विकसित देशों में LLM से एक तिहाई नौकरियाँ प्रभावित हो सकती हैं, लेकिन भारत जैसे देशों में एआई पहले उत्पादकता बढ़ाएगा।
'छोटा एआई' क्या होता है और यह उभरते देशों के लिए क्यों उपयोगी है?
'छोटा एआई' से आशय उन प्रेडिक्टिव टूल्स से है जो कृषि उत्पादकता, शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य सेवा सुधारने में काम आते हैं। बड़े लैंग्वेज मॉडल के विपरीत इनके लिए विशाल कंप्यूटिंग पावर, ऊर्जा, डेटा और पूंजी की जरूरत नहीं होती, इसलिए ये उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए व्यावहारिक हैं।
ग्रीस के प्रधानमंत्री ने एआई पर क्या चेतावनी दी?
ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस ने कहा कि विकसित देशों का मध्यवर्ग एआई और रोबोटिक्स दोनों से एकसाथ दबाव में है। एआई व्हाइट कॉलर नौकरियों पर और रोबोटिक्स मैन्युफैक्चरिंग की नौकरियों पर असर डाल रहे हैं, जिससे भविष्य को लेकर उम्मीद की गुंजाइश सीमित होती जा रही है।
अजय बंगा ने यह बातें कहाँ और कब कहीं?
अजय बंगा ने 5 अक्टूबर 2026 को कोलंबिया यूनिवर्सिटी में सीएनएन के पत्रकार फरीद जकारिया के साथ एक चर्चा के दौरान ये विचार साझा किए। इस चर्चा में ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस भी मौजूद थे।
राष्ट्र प्रेस
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