अमेरिका-ईरान प्रथम चरण समझौता ज्ञापन पर चीन का स्वागत, इज़रायल से क्षेत्रीय शांति का आग्रह
सारांश
मुख्य बातें
चीनी विदेश मंत्रालय ने 19 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच हस्ताक्षरित प्रथम चरण के समझौता ज्ञापन (MoU) का स्वागत किया और कहा कि यह कदम क्षेत्रीय तनाव घटाने तथा युद्धविराम की गति को सुदृढ़ करने की दिशा में सकारात्मक महत्व रखता है। मंत्रालय के नियमित संवाददाता सम्मेलन में प्रवक्ता ने यह बयान दिया।
चीन की आधिकारिक प्रतिक्रिया
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि अमेरिका और ईरान सहित सभी संबंधित पक्षों को समझौते की भावना का सम्मान करते हुए अपनी प्रतिबद्धताओं को ईमानदारी से निभाना चाहिए। प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि बल प्रयोग किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है और निष्पक्ष वार्ता ही आगे बढ़ने का एकमात्र सही मार्ग है। चीन ने उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष वार्ता के दूसरे चरण के प्रति तर्कसंगत और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएंगे।
इज़रायल के सैन्य अभियान पर चिंता
रिपोर्टों के अनुसार, इज़रायल ने लेबनान में अपने सैन्य अभियान अभी तक बंद नहीं किए हैं। ईरान ने सार्वजनिक रूप से आगाह किया है कि इज़रायल की यह कार्रवाई ईरान-अमेरिका समझौता ज्ञापन के प्रथम चरण के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न कर सकती है। यह ऐसे समय में आया है जब मध्य पूर्व में कूटनीतिक प्रयास एक नाज़ुक मोड़ पर हैं।
सभी पक्षों से संयम का आह्वान
चीनी प्रवक्ता ने इस महत्वपूर्ण मोड़ पर इज़रायल सहित सभी संबंधित पक्षों से आग्रह किया कि वे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के व्यापक हितों के अनुरूप कार्य करें। उन्होंने कहा कि सभी को प्रथम चरण के समझौता ज्ञापन के सुचारु क्रियान्वयन को सुविधाजनक बनाने और वार्ता के द्वितीय चरण को आगे बढ़ाने में सहयोग देना चाहिए।
मध्य पूर्व में चीन की भूमिका
गौरतलब है कि चीन ने हाल के वर्षों में मध्य पूर्व में अपनी कूटनीतिक उपस्थिति बढ़ाई है। 2023 में सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध सामान्यीकरण में चीन की मध्यस्थ भूमिका इसका प्रमुख उदाहरण है। प्रवक्ता ने कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर मध्य पूर्व में जल्द से जल्द स्थायी शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अपने प्रभाव का उपयोग जारी रखेगा।
आगे की राह
विश्लेषकों के अनुसार, वार्ता का दूसरा चरण अधिक जटिल होगा, क्योंकि इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हो सकते हैं। इज़रायल-लेबनान संघर्ष की स्थिति इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी परीक्षा बनी हुई है।