वॉर पावर्स रेजोल्यूशन: अमेरिका में सैन्य कार्रवाई पर नियंत्रण की आवश्यकता क्यों है?
सारांश
Key Takeaways
- युद्ध शक्ति संकल्प राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों पर नियंत्रण रखने का एक साधन है।
- राष्ट्रपति को 48 घंटे के भीतर कांग्रेस को सूचित करना आवश्यक है।
- यदि 60 दिन के भीतर अनुमति नहीं मिलती, तो सैन्य कार्रवाई समाप्त करनी होती है।
- कांग्रेस की आपत्तियों ने कई मामलों में अमेरिकी सैन्य भूमिका को सीमित किया है।
- यह कानून राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
नई दिल्ली, 5 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका की राजनीति में गुरुवार को 'युद्ध शक्ति संकल्प' (वॉर पावर्स रेजोल्यूशन) का जोरदार चर्चा हुई। यह एक ऐसा कानून है, जिसे अक्सर तब याद किया जाता है जब राष्ट्रपति औपचारिक युद्ध की घोषणा किए बिना सैन्य कार्रवाई करते हैं। 4 मार्च को अमेरिकी सीनेट ने एक प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसका उद्देश्य डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के खिलाफ की जा रही सैन्य कार्रवाई से रोकना था। इस बहस ने वॉर पावर्स रेजोल्यूशन को फिर से चर्चा का विषय बना दिया है। आखिरकार, यह क्या है?
यह कानून 1973 में पारित किया गया था और इसे रिचर्ड निक्सन के कार्यकाल के दौरान लागू किया गया। उस वक्त अमेरिका वियतनाम युद्ध में गहराई से उलझा हुआ था और कांग्रेस को लगा कि राष्ट्रपति युद्ध से संबंधित निर्णयों में अधिक स्वतंत्रता ले रहे हैं।
इस कानून के अनुसार, यदि राष्ट्रपति किसी देश में अमेरिकी सेना को भेजते हैं, तो उन्हें 48 घंटे के भीतर कांग्रेस को सूचित करना आवश्यक है। इसके अलावा, यदि 60 दिनों के भीतर कांग्रेस से औपचारिक मंजूरी नहीं मिलती है, तो राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई समाप्त करनी पड़ती है (कुछ विशेष परिस्थितियों में 30 दिन की अतिरिक्त छूट मिल सकती है)।
सरल शब्दों में, यह कानून राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों पर “निगरानी और नियंत्रण” का एक साधन है।
इतिहास बताता है कि वॉर पावर्स रेजोल्यूशन का उपयोग कई बार किया गया है, लेकिन इसे पूरी तरह से “सफल” कहना मुश्किल है।
कई राष्ट्रपति—चाहे वे डेमोक्रेट हों या रिपब्लिकन—ने अक्सर यह तर्क किया है कि यह कानून राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों को सीमित नहीं कर सकता। उन्होंने कांग्रेस को रिपोर्ट तो दी, लेकिन 60 दिन की समयसीमा का सख्ती से पालन करने की बजाय अपनी कार्रवाई को “सीमित ऑपरेशन” या “रक्षात्मक कदम” बताकर आगे बढ़ते रहे।
फिर भी, कुछ उदाहरण ऐसे हैं जब कांग्रेस के दबाव का असर हुआ। 1980 और 1990 के दशकों में लेबनान और सोमालिया जैसे मामलों में कांग्रेस की आपत्तियों और जनमत के दबाव के चलते अमेरिकी सैन्य भूमिका को सीमित किया गया।
हाल का एक महत्वपूर्ण उदाहरण 2019 में यूनाइटेड स्टेट्स कांग्रेस द्वारा यमन युद्ध में अमेरिकी समर्थन समाप्त करने का प्रस्ताव था, जो सऊदी अरब के पक्ष में चल रहा था। यह प्रस्ताव दोनों सदनों से पारित हुआ, लेकिन तब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे वीटो कर दिया। यानी कि कांग्रेस ने प्रस्ताव पास करने में सफलता तो प्राप्त की, लेकिन अंतिम प्रभाव राष्ट्रपति के वीटो के कारण लागू नहीं हो सका।
जब सीनेट ने ईरान पर लाए गए प्रस्ताव को खारिज किया, तो इसका मतलब है कि राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई पर तत्काल कानूनी रोक नहीं लगेगी। हालाँकि, बहस जारी है कि क्या राष्ट्रपति को बिना औपचारिक युद्ध घोषणा के लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई जारी रखनी चाहिए।
कुल मिलाकर, वॉर पावर्स रेजोल्यूशन एक संवैधानिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश है—जहाँ राष्ट्रपति “कमांडर-इन-चीफ” हैं, वहीं युद्ध की घोषणा का अधिकार कांग्रेस के पास है।