ऑटोइम्यून बीमारियों में महिलाओं को 46% अधिक बार 'मानसिक रोगी' कहा जाता है: द लैंसेट अध्ययन
सारांश
मुख्य बातें
द लैंसेट ईक्लिनिकलमेडिसिन में 13 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार, ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित महिलाओं के लक्षणों को पुरुषों की तुलना में 46 प्रतिशत अधिक बार मनोरोग से जोड़ा जाता है, जबकि उन्हें मनोदैहिक समस्या बताने की संभावना 74 प्रतिशत अधिक पाई गई। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में 6,607 प्रतिभागियों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया। यह शोध बताता है कि चिकित्सा क्षेत्र में गहरी जड़ें जमाए लैंगिक पूर्वाग्रह महिलाओं के सही इलाज में गंभीर बाधा बन रहे हैं।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
शोध में 43 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनके लक्षणों को शुरुआत में मानसिक या मनोरोग संबंधी कारणों से जोड़ दिया गया, जबकि पुरुषों में यह अनुभव 33 प्रतिशत को हुआ। इसी तरह, 34 प्रतिशत महिलाओं के शारीरिक लक्षणों को मनोदैहिक समस्या बताया गया, जबकि पुरुषों में यह आँकड़ा केवल 22 प्रतिशत था।
गौरतलब है कि ये आँकड़े उम्र, बीमारी के प्रकार, महाद्वीप और घरेलू आर्थिक स्थिति जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी समान रूप से लागू पाए गए। अध्ययन में शामिल अधिकांश प्रतिभागी महिलाएँ और ब्रिटेन के निवासी थे।
निदान में देरी — महिलाओं का एक से दो साल का इंतज़ार
अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों में लक्षण सामने आने के तीन महीने के भीतर बीमारी की सही पहचान हो जाती है, जबकि महिलाओं को सही निदान के लिए प्रायः एक से दो वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। इस अवधि में उन्हें बार-बार डॉक्टरों के पास जाना पड़ा, जिससे मानसिक थकान और स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसे में कमी आई।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जनस्वास्थ्य एवं प्राथमिक देखभाल विभाग की शोधकर्ता और अध्ययन की प्रमुख लेखिका मेलानी स्लोन ने कहा कि इस तरह के गलत निदान का महिलाओं पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। उनके अनुसार, 'इससे डॉक्टरों पर उनका भरोसा और खुद के अनुभवों पर उनका विश्वास कमज़ोर हो सकता है।' स्लोन ने यह भी कहा कि कई महिलाओं को सही बीमारी का पता चलने से पहले वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जिससे इलाज में भी देरी होती है।
ऑटोइम्यून बीमारियाँ और उनके भ्रामक लक्षण
शोधकर्ताओं के अनुसार, ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला करने लगती है। इससे थकान, मांसपेशियों में दर्द, त्वचा पर चकत्ते और नींद संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं — ऐसे लक्षण जो कई अन्य स्थितियों में भी दिखाई देते हैं और बीमारी के शुरुआती चरण में स्पष्ट नहीं हो पाते।
अध्ययन की महिला प्रतिभागियों में लगभग एक चौथाई को ऑटोइम्यून थायरॉयड रोग था, जिसमें हाशिमोटो रोग और ग्रेव्स रोग प्रमुख हैं। लगभग सात में से एक महिला को सिस्टमिक ल्यूपस था। पुरुष प्रतिभागियों में रूमेटॉइड आर्थराइटिस, वैस्कुलाइटिस और एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम अधिक सामान्य पाए गए।
लैंगिक पूर्वाग्रह और चिकित्सा व्यवस्था
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही लैंगिक धारणाएँ आज भी निदान की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। महिलाओं के लक्षणों को अधिक भावनात्मक मानना या उनकी शिकायतों को कम विश्वसनीय समझना सही बीमारी की पहचान में बाधक बन सकता है।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं में लैंगिक समानता को लेकर बहस तेज़ हो रही है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि पुरुषों में किसी दूसरी शारीरिक बीमारी का गलत निदान होने की रिपोर्ट महिलाओं से कुछ अधिक थी — पुरुषों में 48 प्रतिशत और महिलाओं में 44 प्रतिशत — जो यह दर्शाता है कि ऑटोइम्यून बीमारियों की पहचान में कठिनाइयाँ दोनों लिंगों को प्रभावित करती हैं, किंतु मानसिक कारणों से जोड़ने का बोझ महिलाओं पर अधिक पड़ता है।
आगे क्या होना चाहिए
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि मरीज़ों के अनुभवों को सुनना और उन्हें महत्व देना बेहतर इलाज की दिशा में निर्णायक कदम है। महिलाओं की शारीरिक शिकायतों को समय रहते गंभीरता से लेना और उचित जाँच सुनिश्चित करना बीमारी की पहचान में होने वाली देरी को कम कर सकता है। चिकित्सा प्रशिक्षण में लैंगिक पूर्वाग्रह पर जागरूकता बढ़ाना इस समस्या के दीर्घकालिक समाधान की कुंजी हो सकता है।