13 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

ऑटोइम्यून बीमारियों में महिलाओं को 46% अधिक बार 'मानसिक रोगी' कहा जाता है: द लैंसेट अध्ययन

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
ऑटोइम्यून बीमारियों में महिलाओं को 46% अधिक बार 'मानसिक रोगी' कहा जाता है: द लैंसेट अध्ययन

सारांश

कैम्ब्रिज और ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 6,607 मरीज़ों पर किए अध्ययन में पाया कि ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 46% अधिक बार 'मानसिक रोगी' कहकर टाला जाता है और सही निदान के लिए एक से दो साल इंतज़ार करना पड़ता है — यह चिकित्सा व्यवस्था में गहरे लैंगिक पूर्वाग्रह की गवाही है।

मुख्य बातें

द लैंसेट ईक्लिनिकलमेडिसिन में 13 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अध्ययन में 6,607 ऑटोइम्यून मरीज़ों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया।
43% महिलाओं के लक्षणों को मनोरोग से जोड़ा गया, पुरुषों में यह आँकड़ा 33% था।
महिलाओं के लक्षणों को मनोदैहिक बताने की संभावना पुरुषों से 74% और मनोरोग से जोड़ने की संभावना 46% अधिक पाई गई।
पुरुषों को तीन महीने में सही निदान मिला, जबकि महिलाओं को एक से दो वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।
अध्ययन की प्रमुख लेखिका मेलानी स्लोन ने कहा कि इससे महिलाओं का डॉक्टरों पर भरोसा और खुद के अनुभवों पर विश्वास कमज़ोर होता है।
शोधकर्ताओं ने चिकित्सा प्रशिक्षण में लैंगिक पूर्वाग्रह पर जागरूकता बढ़ाने की सिफारिश की।

द लैंसेट ईक्लिनिकलमेडिसिन में 13 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार, ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित महिलाओं के लक्षणों को पुरुषों की तुलना में 46 प्रतिशत अधिक बार मनोरोग से जोड़ा जाता है, जबकि उन्हें मनोदैहिक समस्या बताने की संभावना 74 प्रतिशत अधिक पाई गई। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में 6,607 प्रतिभागियों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया। यह शोध बताता है कि चिकित्सा क्षेत्र में गहरी जड़ें जमाए लैंगिक पूर्वाग्रह महिलाओं के सही इलाज में गंभीर बाधा बन रहे हैं।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

शोध में 43 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनके लक्षणों को शुरुआत में मानसिक या मनोरोग संबंधी कारणों से जोड़ दिया गया, जबकि पुरुषों में यह अनुभव 33 प्रतिशत को हुआ। इसी तरह, 34 प्रतिशत महिलाओं के शारीरिक लक्षणों को मनोदैहिक समस्या बताया गया, जबकि पुरुषों में यह आँकड़ा केवल 22 प्रतिशत था।

गौरतलब है कि ये आँकड़े उम्र, बीमारी के प्रकार, महाद्वीप और घरेलू आर्थिक स्थिति जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी समान रूप से लागू पाए गए। अध्ययन में शामिल अधिकांश प्रतिभागी महिलाएँ और ब्रिटेन के निवासी थे।

निदान में देरी — महिलाओं का एक से दो साल का इंतज़ार

अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों में लक्षण सामने आने के तीन महीने के भीतर बीमारी की सही पहचान हो जाती है, जबकि महिलाओं को सही निदान के लिए प्रायः एक से दो वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। इस अवधि में उन्हें बार-बार डॉक्टरों के पास जाना पड़ा, जिससे मानसिक थकान और स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसे में कमी आई।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जनस्वास्थ्य एवं प्राथमिक देखभाल विभाग की शोधकर्ता और अध्ययन की प्रमुख लेखिका मेलानी स्लोन ने कहा कि इस तरह के गलत निदान का महिलाओं पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। उनके अनुसार, 'इससे डॉक्टरों पर उनका भरोसा और खुद के अनुभवों पर उनका विश्वास कमज़ोर हो सकता है।' स्लोन ने यह भी कहा कि कई महिलाओं को सही बीमारी का पता चलने से पहले वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जिससे इलाज में भी देरी होती है।

ऑटोइम्यून बीमारियाँ और उनके भ्रामक लक्षण

शोधकर्ताओं के अनुसार, ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला करने लगती है। इससे थकान, मांसपेशियों में दर्द, त्वचा पर चकत्ते और नींद संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं — ऐसे लक्षण जो कई अन्य स्थितियों में भी दिखाई देते हैं और बीमारी के शुरुआती चरण में स्पष्ट नहीं हो पाते।

अध्ययन की महिला प्रतिभागियों में लगभग एक चौथाई को ऑटोइम्यून थायरॉयड रोग था, जिसमें हाशिमोटो रोग और ग्रेव्स रोग प्रमुख हैं। लगभग सात में से एक महिला को सिस्टमिक ल्यूपस था। पुरुष प्रतिभागियों में रूमेटॉइड आर्थराइटिस, वैस्कुलाइटिस और एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम अधिक सामान्य पाए गए।

लैंगिक पूर्वाग्रह और चिकित्सा व्यवस्था

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही लैंगिक धारणाएँ आज भी निदान की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। महिलाओं के लक्षणों को अधिक भावनात्मक मानना या उनकी शिकायतों को कम विश्वसनीय समझना सही बीमारी की पहचान में बाधक बन सकता है।

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं में लैंगिक समानता को लेकर बहस तेज़ हो रही है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि पुरुषों में किसी दूसरी शारीरिक बीमारी का गलत निदान होने की रिपोर्ट महिलाओं से कुछ अधिक थी — पुरुषों में 48 प्रतिशत और महिलाओं में 44 प्रतिशत — जो यह दर्शाता है कि ऑटोइम्यून बीमारियों की पहचान में कठिनाइयाँ दोनों लिंगों को प्रभावित करती हैं, किंतु मानसिक कारणों से जोड़ने का बोझ महिलाओं पर अधिक पड़ता है।

आगे क्या होना चाहिए

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि मरीज़ों के अनुभवों को सुनना और उन्हें महत्व देना बेहतर इलाज की दिशा में निर्णायक कदम है। महिलाओं की शारीरिक शिकायतों को समय रहते गंभीरता से लेना और उचित जाँच सुनिश्चित करना बीमारी की पहचान में होने वाली देरी को कम कर सकता है। चिकित्सा प्रशिक्षण में लैंगिक पूर्वाग्रह पर जागरूकता बढ़ाना इस समस्या के दीर्घकालिक समाधान की कुंजी हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और यह शोध बताता है कि वह पूर्वाग्रह आधुनिक क्लिनिक में भी जीवित है। चिंताजनक बात यह है कि उम्र, बीमारी के प्रकार और आर्थिक स्थिति जैसे कारकों को नियंत्रित करने के बाद भी यह असमानता बनी रहती है, यानी यह केवल जनसांख्यिकीय संयोग नहीं है। भारत में, जहाँ महिलाओं की स्वास्थ्य शिकायतें पहले ही पारिवारिक और सामाजिक उपेक्षा का शिकार होती हैं, इस शोध का संदेश और भी तीखा है — बिना व्यवस्थागत बदलाव के, जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं होंगे।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऑटोइम्यून बीमारियों में महिलाओं के गलत निदान पर यह अध्ययन क्या कहता है?
द लैंसेट ईक्लिनिकलमेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित महिलाओं के लक्षणों को पुरुषों की तुलना में 46% अधिक बार मनोरोग से और 74% अधिक बार मनोदैहिक समस्या से जोड़ा जाता है। कैम्ब्रिज और ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 6,607 मरीज़ों पर यह अध्ययन किया।
ऑटोइम्यून बीमारी का सही निदान होने में महिलाओं को कितना समय लगता है?
अध्ययन के अनुसार, पुरुषों को आमतौर पर लक्षण सामने आने के तीन महीने के भीतर सही निदान मिल जाता है, जबकि महिलाओं को अक्सर एक से दो वर्ष तक इंतज़ार करना पड़ता है। इस दौरान उन्हें बार-बार डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है और उनकी शिकायतों को अनदेखा किया जाता है।
ऑटोइम्यून बीमारी क्या होती है और इसके लक्षण क्या हैं?
ऑटोइम्यून बीमारी में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला करने लगती है। इससे थकान, मांसपेशियों में दर्द, त्वचा पर चकत्ते और नींद संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं, जो कई अन्य बीमारियों में भी दिखती हैं और शुरुआती चरण में भ्रम पैदा करती हैं।
महिलाओं में सबसे आम ऑटोइम्यून बीमारियाँ कौन सी हैं?
अध्ययन में शामिल महिलाओं में लगभग एक चौथाई को ऑटोइम्यून थायरॉयड रोग था, जिसमें हाशिमोटो और ग्रेव्स रोग प्रमुख हैं। लगभग सात में से एक महिला को सिस्टमिक ल्यूपस था। पुरुषों में रूमेटॉइड आर्थराइटिस, वैस्कुलाइटिस और एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम अधिक सामान्य पाए गए।
इस गलत निदान का महिलाओं पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है?
अध्ययन की प्रमुख लेखिका मेलानी स्लोन के अनुसार, गलत निदान से महिलाओं का डॉक्टरों पर भरोसा और खुद के अनुभवों पर विश्वास कमज़ोर हो सकता है। इसके अलावा, सही इलाज में देरी के कारण बीमारी की गंभीरता बढ़ सकती है और उपचार अधिक जटिल हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 महीने पहले
  2. 5 महीने पहले
  3. 6 महीने पहले
  4. 12 महीने पहले
  5. 1 साल पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले