गंभीर निमोनिया में इंजेक्शन की जगह मुंह से एंटीबायोटिक उतनी ही कारगर — द लैंसेट में प्रकाशित पेडीकैप रिसर्च
सारांश
मुख्य बातें
द लैंसेट में प्रकाशित एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, गंभीर निमोनिया से पीड़ित बच्चों की तबीयत में प्रारंभिक सुधार के बाद इंजेक्शन वाली एंटीबायोटिक की जगह मुंह से दी जाने वाली दवा देना उतना ही सुरक्षित और प्रभावी है। सिटी सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन, यूसीएल इनोवेटिव क्लिनिकल ट्रायल्स यूनिट और अफ्रीका व यूरोप के अनेक वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए इस शोध के निष्कर्ष वैश्विक बाल-स्वास्थ्य नीति को नई दिशा दे सकते हैं।
रिसर्च की पृष्ठभूमि और ज़रूरत
निमोनिया हर साल दुनियाभर में लाखों बच्चों को अपनी चपेट में लेती है और गरीब व विकासशील देशों में यह बच्चों की मृत्यु का प्रमुख कारण बनी हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की मौजूदा गाइडलाइन के अनुसार, गंभीर निमोनिया वाले बच्चों को कम से कम पाँच दिन तक इंजेक्शन के माध्यम से एंटीबायोटिक दी जाती है। इसके चलते कई बार बच्चे की हालत पहले ही बेहतर हो जाने के बावजूद उसे अस्पताल में रोके रखना पड़ता है, जिससे इलाज का खर्च बढ़ता है, अस्पतालों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और बच्चों में अस्पताल-जनित संक्रमण का जोखिम भी बढ़ जाता है।
पेडीकैप अध्ययन: पद्धति और दायरा
इन्हीं चुनौतियों के समाधान की तलाश में वैज्ञानिकों ने पेडीकैप नाम से यह नैदानिक परीक्षण (क्लिनिकल ट्रायल) किया। इसमें दो महीने से छह वर्ष की आयु के 1,101 बच्चों को शामिल किया गया, जिन्हें गंभीर निमोनिया के कारण अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। यह अध्ययन दक्षिण अफ्रीका, युगांडा, जाम्बिया, जिम्बाब्वे और मोजाम्बिक के 13 अस्पतालों में संचालित किया गया।
शुरुआत में सभी बच्चों को WHO की गाइडलाइन के अनुसार इंजेक्शन वाली एंटीबायोटिक दी गई। तबीयत में सुधार दिखने पर बच्चों को तीन समूहों में बाँटा गया — एक समूह को मुंह से एमॉक्सिसिलिन, दूसरे को एमॉक्सिसिलिन-क्लैवुलानेट और तीसरे को पूरे पाँच दिन तक इंजेक्शन देना जारी रखा गया।
मुख्य निष्कर्ष
शोधकर्ताओं ने तीनों समूहों के बच्चों की रिकवरी, पुनः अस्पताल में भर्ती होने की दर और मृत्यु दर की तुलना की। अध्ययन के अनुसार, इलाज के 28 दिनों के भीतर पुनः भर्ती होने या मृत्यु की दर तीनों समूहों में लगभग समान रही — एमॉक्सिसिलिन समूह में 6 प्रतिशत, एमॉक्सिसिलिन-क्लैवुलानेट समूह में 7 प्रतिशत और इंजेक्शन समूह में 6 प्रतिशत।
इसके अतिरिक्त, शोध में पाया गया कि चार से पाँच दिन का एंटीबायोटिक उपचार सात से आठ दिन के उपचार जितना ही प्रभावी रहा। यानी कई मामलों में बच्चों को आवश्यकता से अधिक समय तक एंटीबायोटिक देने की ज़रूरत नहीं होती।
अस्पताल और परिवार पर असर
अध्ययन के अनुसार, जिन बच्चों को इंजेक्शन की जगह मुंह से दवा दी गई, उन्हें औसतन एक दिन पहले अस्पताल से छुट्टी मिल गई। इससे अस्पतालों में बेड जल्दी खाली हो सकते हैं, अन्य गंभीर मरीजों को समय पर इलाज मिल सकता है और परिवारों पर आर्थिक व मानसिक बोझ भी कम हो सकता है।
आगे क्या
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि भविष्य में इस अध्ययन के आधार पर उपचार-प्रोटोकॉल में बदलाव किए जाते हैं, तो दुनियाभर में लाखों बच्चों को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। यह शोध ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र अस्पतालों पर बढ़ते दबाव और एंटीबायोटिक प्रतिरोध की चुनौती से जूझ रहा है — और इन दोनों मोर्चों पर यह निष्कर्ष नीति-निर्माताओं के लिए महत्त्वपूर्ण संकेत हैं।