बांग्लादेश का 'साइबर प्रोटेक्शन एक्ट 2026' ड्राफ्ट वापस लो — अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की माँग
सारांश
मुख्य बातें
चार प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने 24 सितंबर 2026 को बांग्लादेश सरकार से 'साइबर प्रोटेक्शन (संशोधन) एक्ट 2026' के ड्राफ्ट को तत्काल वापस लेने की माँग की है। उनका कहना है कि इस प्रस्तावित कानून के व्यापक प्रावधान इस दक्षिण एशियाई देश में मौलिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक स्वतंत्रता को गंभीर रूप से बाधित कर सकते हैं।
संयुक्त बयान और मुख्य चिंताएँ
सीआईवीआईसीयूएस, रॉबर्ट एंड एथेल कैनेडी ह्यूमन राइट्स सेंटर, फ्रंट लाइन डिफेंडर्स और साउथ एशियन्स फॉर ह्यूमन राइट्स ने एक संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि प्रस्तावित संशोधनों से मीडिया की स्वतंत्रता सिकुड़ने और जनहित से जुड़ी रिपोर्टिंग पर अंकुश लगने का गंभीर खतरा है। संगठनों ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'डिजिटल सुरक्षा बढ़ाने के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की स्वतंत्रता या संविधान तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित अन्य अधिकारों पर अनुचित प्रतिबंध नहीं लगने चाहिए।'
अस्पष्ट परिभाषाएँ — दुरुपयोग का खतरा
संगठनों ने ड्राफ्ट में इस्तेमाल किए गए कई शब्दों — जैसे 'अफवाह', 'गलत जानकारी', 'डिजिटल मानहानि', 'अपमान', 'बुलिंग' और 'फेक न्यूज' — पर विशेष आपत्ति जताई। उनका तर्क है कि इन शब्दों की कोई स्पष्ट और सटीक परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इनकी मनमानी व्याख्या और चुनिंदा अनुप्रयोग की पूरी संभावना बनती है। बयान में कहा गया, 'स्पष्ट परिभाषाओं की कमी से गलत इस्तेमाल और मनमाने ढंग से कानून लागू किए जाने की काफी गुंजाइश रहती है।'
कड़ी सज़ाएँ और गिरफ्तारी से पहले हिरासत का प्रावधान
मानवाधिकार समूहों ने संशोधन के तहत प्रस्तावित नए अपराधों पर गहरी चिंता जताई, जिनमें लंबी जेल की सज़ा, भारी जुर्माना और ऑनलाइन अभिव्यक्ति से संबंधित मामलों में मुकदमे से पहले हिरासत में रखने के प्रावधान शामिल हैं। संगठनों ने कहा, 'ऐसे प्रावधान किसी का आरोप सिद्ध होने से पहले ही उसे अपराधी ठहराए जाने की आशंका पैदा करते हैं। ये व्यापक और दंडात्मक शर्तें अधिकारियों को असीमित विवेकाधिकार देती हैं, जिससे अधिकारों के दुरुपयोग का जोखिम बढ़ जाता है।' यह भी चिंता जताई गई कि संशोधन के बाद डिजिटल कंटेंट को ब्लॉक करने की शक्ति और अधिक लोगों तक विस्तारित हो जाएगी तथा कुछ अपराध गैर-जमानती हो जाएंगे।
परामर्श प्रक्रिया पर सवाल
संगठनों ने 10 सितंबर 2026 को हुई परामर्श प्रक्रिया की विश्वसनीयता को भी चुनौती दी। उनका आरोप है कि बांग्लादेश सरकार ने केवल कुछ चुनिंदा मीडिया पेशेवरों को उस बैठक में आमंत्रित किया, जबकि नागरिक समाज के संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पूरी तरह बाहर रखा गया। यह ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में डिजिटल स्वतंत्रता पहले से ही दबाव में है और पिछले कई वर्षों से नागरिक समाज कड़े साइबर कानूनों के खिलाफ आवाज़ उठाता रहा है।
समावेशी संवाद की माँग
मानवाधिकार संगठनों ने बांग्लादेश के अधिकारियों से आग्रह किया कि वे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज, मीडिया पेशेवरों, तकनीकी विशेषज्ञों, कानूनी विशेषज्ञों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ एक वास्तविक, समावेशी और समयबद्ध संवाद प्रक्रिया शुरू करें। उनका कहना है, 'यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि कोई भी संशोधन बांग्लादेश की संवैधानिक गारंटियों तथा उसके अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों और मानकों के अनुरूप हो।' गौरतलब है कि बांग्लादेश पहले भी साइबर कानूनों के दुरुपयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करता रहा है। आने वाले हफ्तों में इस मसले पर बांग्लादेश सरकार की प्रतिक्रिया और ड्राफ्ट की आगे की नियति पर नज़रें टिकी रहेंगी।