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बांग्लादेश आईसीटी ने तीन पत्रकारों को जेल भेजा, जुलाई 2024 विरोध-प्रदर्शन मामले में कार्रवाई

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बांग्लादेश आईसीटी ने तीन पत्रकारों को जेल भेजा, जुलाई 2024 विरोध-प्रदर्शन मामले में कार्रवाई

सारांश

बांग्लादेश के आईसीटी ने जुलाई 2024 विरोध-प्रदर्शन मामले में तीन वरिष्ठ पत्रकारों — श्यामला दत्ता, मोजम्मेल बाबू और फरजाना रूपा — को जेल भेज दिया है। सीपीजे और जेएमबीएफ ने इसे प्रेस स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताते हुए कड़ी निंदा की है।

मुख्य बातें

बांग्लादेश आईसीटी ने 25 अगस्त 2025 को तीन पत्रकारों — श्यामला दत्ता , मोजम्मेल बाबू और फरजाना रूपा — को जेल भेजने का आदेश दिया।
मामला 14 जुलाई 2024 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ा है, जिसमें कथित भड़काऊ बयानों के आधार पर 'मानवता के विरुद्ध अपराध' का आरोप लगाया गया है।
बाबू और रूपा पर 2013 की हेफाजत-ए-इस्लाम रैली कार्रवाई से जुड़ा एक अलग मामला भी चल रहा है।
प्रेस स्वतंत्रता संगठन सीपीजे ने बांग्लादेशी अधिकारियों से मामला वापस लेने की अपील की है।
जेएमबीएफ ने इसे आपराधिक न्याय प्रणाली के 'राजनीतिक प्रतिशोध' के रूप में इस्तेमाल बताते हुए कड़ी निंदा की।

बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने 25 अगस्त 2025 को जुलाई 2024 के विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े मानवता के विरुद्ध अपराध के मामले में तीन पत्रकारों को औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाते हुए जेल भेजने का आदेश दिया। इन तीनों पत्रकारों को पहले से ही हिरासत में रखा गया था और सोमवार को ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश किया गया।

कौन हैं तीनों पत्रकार

जेल भेजे गए पत्रकारों में 'भोरर कागोज' के पूर्व संपादक श्यामला दत्ता, 'एकात्तोर टीवी' के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं एडिटर-इन-चीफ मोजम्मेल बाबू और उनकी मुख्य संवाददाता फरजाना रूपा शामिल हैं। तीनों ढाका स्थित प्रमुख मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे हैं।

बाबू और रूपा पर एक अलग मामले में भी मुकदमा चल रहा है, जो 2013 में मोटिज्हील के शापला चत्तर और नारायणगंज में हेफाजत-ए-इस्लाम की रैली पर की गई कार्रवाई से संबंधित है।

अभियोजन पक्ष का तर्क

अभियोजक गाजी मोनाववर हुसैन तमीम ने आरोप लगाया कि 14 जुलाई 2024 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोपियों के कथित भड़काऊ बयानों के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 'रजाकार' वाली विवादास्पद टिप्पणी की थी, जिसके बाद व्यापक विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। आलोचकों का कहना है कि यह तर्क पत्रकारिता की सामान्य गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में रखने की कोशिश है।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया

फ्रांस स्थित 'जस्टिस मेकर्स बांग्लादेश इन फ्रांस' (जेएमबीएफ) ने इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त की। संगठन ने कहा कि पत्रकारों की बातचीत, सवाल-जवाब, टिप्पणी, संपादकीय रुख या राजनीतिक नैरेटिव पर 'मानवता के खिलाफ अपराध' जैसा अत्यंत गंभीर आरोप लगाना 'बेहद चिंताजनक' है।

जेएमबीएफ के संस्थापक अध्यक्ष शाहनूर इस्लाम ने कहा कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार के तहत पत्रकारों के खिलाफ इस तरह की कार्यवाही आपराधिक न्याय प्रणाली को 'राजनीतिक प्रतिशोध और डराने-धमकाने' के हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की गंभीर आशंका पैदा करती है। उन्होंने कहा, 'ऐसी कार्यप्रणाली बेहद परेशान करने वाली, लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ और पूरी तरह से अस्वीकार्य है।'

प्रेस स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले वैश्विक संगठन 'कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स' (सीपीजे) ने भी पिछले सप्ताह बांग्लादेशी अधिकारियों से तीनों पत्रकारों के खिलाफ नया मामला वापस लेने और समाचार रिपोर्टिंग को अपराध का दर्जा देना बंद करने की अपील की थी।

सीपीजे के एशिया-पैसिफिक प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर कुणाल मजूमदार ने कहा, 'सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने के लिए पत्रकार श्यामला दत्ता, मोजम्मेल बाबू और फरजाना रूपा पर मानवता के विरुद्ध अपराध का केस शुरू करना चौंकाने वाला और बहुत चिंताजनक है।'

व्यापक संदर्भ और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल

यह ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में जुलाई 2024 के विरोध-प्रदर्शनों के बाद से मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। गौरतलब है कि मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली पिछली अंतरिम सरकार के दौरान भी इसी प्रकार की कार्यप्रणाली देखी गई थी। जेएमबीएफ ने स्पष्ट किया कि ऐसे आरोपों के समर्थन में विश्वसनीय और ठोस सबूत होने चाहिए जो लागू आपराधिक कानून और अंतरराष्ट्रीय मानकों की कठोर शर्तों को पूरा करते हों।

संगठन का कहना है, 'पत्रकारिता कोई अपराध नहीं है। राजनीतिक असहमति कोई अपराध नहीं है। आलोचना, सवाल-जवाब, टिप्पणी और यहाँ तक कि विवादास्पद या अलोकप्रिय विचारों को केवल इसलिए मानवता के खिलाफ अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि वे विचार बाद में राजनीतिक रूप से आपत्तिजनक हो जाते हैं।'

आगे क्या होगा

तीनों पत्रकार फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं और मामले की अगली सुनवाई ट्रिब्यूनल में होनी है। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच बांग्लादेश सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। प्रेस स्वतंत्रता संगठन इस मामले पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं और कथित तौर पर आगे की कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन मीडिया को दबाने की प्रवृत्ति नहीं बदलती। बीएनपी सरकार का यह कदम उसी राजनीतिक प्रतिशोध की परंपरा को आगे बढ़ाता दिखता है जिसकी आलोचना उसने विपक्ष में रहते हुए खुद की थी। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद यदि यह मामला वापस नहीं लिया जाता, तो यह बांग्लादेश की लोकतांत्रिक साख और प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक पर दीर्घकालिक असर डालेगा।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बांग्लादेश आईसीटी ने किन तीन पत्रकारों को जेल भेजा है?
'भोरर कागोज' के पूर्व संपादक श्यामला दत्ता, 'एकात्तोर टीवी' के मैनेजिंग डायरेक्टर मोजम्मेल बाबू और मुख्य संवाददाता फरजाना रूपा को 25 अगस्त 2025 को आईसीटी ने जेल भेजने का आदेश दिया। तीनों पहले से हिरासत में थे और सोमवार को ट्रिब्यूनल के सामने पेश किए गए।
इन पत्रकारों पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि 14 जुलाई 2024 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन पत्रकारों के कथित भड़काऊ बयानों के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 'रजाकार' वाली टिप्पणी की, जिससे विरोध-प्रदर्शन भड़के। इसी आधार पर 'मानवता के विरुद्ध अपराध' का मामला दर्ज किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस मामले पर क्या कहा है?
सीपीजे ने बांग्लादेशी अधिकारियों से मामला वापस लेने की अपील की है और इसे 'चौंकाने वाला और बहुत चिंताजनक' बताया है। जेएमबीएफ ने इसे आपराधिक न्याय प्रणाली के राजनीतिक दुरुपयोग की संज्ञा दी है।
क्या इन पत्रकारों पर कोई अन्य मामला भी चल रहा है?
हाँ, मोजम्मेल बाबू और फरजाना रूपा पर 2013 में मोटिज्हील के शापला चत्तर और नारायणगंज में हेफाजत-ए-इस्लाम की रैली पर हुई कार्रवाई से जुड़ा एक अलग मानवता के विरुद्ध अपराध का मामला भी चल रहा है।
बांग्लादेश में प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति क्या है?
जुलाई 2024 के विरोध-प्रदर्शनों के बाद से बांग्लादेश में मीडिया पर दबाव बढ़ा है। मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार और अब बीएनपी सरकार के तहत पत्रकारों के खिलाफ मामलों में वृद्धि को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन गंभीर चिंता जता रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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