भारत-जापान वन प्रबंधन प्रोजेक्ट लॉन्च: ₹537 करोड़ की साझेदारी, 2031 तक फ्रंटलाइन वन कर्मियों की क्षमता होगी मजबूत
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए) के सहयोग से 'प्रभावी वन प्रबंधन के लिए क्षमता वृद्धि' प्रोजेक्ट की लॉन्च वर्कशॉप का उद्घाटन किया। ₹537.10 करोड़ के कुल बजट वाला यह प्रोजेक्ट 2025-26 से 2031-32 तक लागू रहेगा और देश के सभी राज्यों में फ्रंटलाइन वन कर्मियों की तकनीकी एवं व्यावहारिक क्षमता को बढ़ाने का लक्ष्य रखता है।
प्रोजेक्ट का ढाँचा और बजट
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एडीजी (वन्यजीव) रमेश पांडे के अनुसार, कुल ₹537.10 करोड़ के बजट में से ₹440.42 करोड़ जेआईसीए और ₹96.68 करोड़ भारत सरकार वहन करेगी। यह प्रोजेक्ट सभी राज्यों को कवर करेगा, जिसमें नए भाग लेने वाले राज्यों को प्राथमिकता दी जाएगी।
प्रोजेक्ट के दो प्रमुख चरण हैं — पहला, फ्रंटलाइन वन कर्मियों की क्षमता वृद्धि; और दूसरा, लकड़ी के परिवर्तन व आजीविका सृजन, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और संयुक्त अकादमिक शोध पर केंद्रित।
मंत्री भूपेंद्र यादव का संबोधन
वर्कशॉप को संबोधित करते हुए यादव ने कहा कि जलवायु कार्रवाई, जैव विविधता संरक्षण और वनों पर निर्भर समुदायों की आजीविका के लिए वन बेहद ज़रूरी हैं। उन्होंने जंगल की आग के प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में वन कर्मियों की तकनीकी एवं फील्ड-स्तरीय क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
मंत्री ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए कहा, 'फ्रंट-लाइन कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाना सिर्फ़ समय-समय पर क्लासरूम में दी जाने वाली ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वे फील्ड में वैज्ञानिक जानकारी, नई टेक्नोलॉजी और व्यावहारिक कौशल का इस्तेमाल कर सकें।' उन्होंने क्षेत्र-विशिष्ट प्रशिक्षण मॉड्यूल की माँग भी की, जिनमें पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक तरीकों और आधुनिक तकनीकों का समन्वय हो।
जेआईसीए की भूमिका और तीन दशकों की साझेदारी
जेआईसीए इंडिया के सीनियर प्रतिनिधि ईजी वाकामात्सु ने बताया कि यह प्रोजेक्ट वैश्विक चुनौतियों के समाधान विकसित करने के लिए भारतीय और जापानी अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग को और गहरा करेगा। गौरतलब है कि भारत के साथ जेआईसीए की वानिकी साझेदारी लगभग तीन दशकों से जारी है और इससे अब तक 7 लाख से अधिक लोगों को लाभ मिल चुका है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपने वन क्षेत्र विस्तार के लक्ष्यों और अंतर्राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की दिशा में तेज़ी से काम कर रहा है। रिसर्च और डेवलपमेंट, पायलट प्रोजेक्ट और वानिकी प्रशिक्षण संस्थानों को मज़बूत करना भी इस पहल के अहम घटक हैं।
आम जनता और वन समुदायों पर असर
इस प्रोजेक्ट का सीधा असर उन लाखों लोगों पर पड़ेगा जिनकी आजीविका वनों पर निर्भर है। बेहतर प्रशिक्षित फ्रंटलाइन कर्मी जंगल की आग, अवैध कटाई और वन्यजीव-मानव संघर्ष जैसी समस्याओं से अधिक प्रभावी ढंग से निपट सकेंगे। डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन घटक वन निगरानी की सटीकता और पारदर्शिता को बढ़ाने में भी सहायक होगा।
आगे की राह
प्रोजेक्ट का दूसरा चरण लकड़ी के ट्रांसफॉर्मेशन, आजीविका सृजन और संयुक्त अकादमिक शोध पर केंद्रित रहेगा। 2031-32 तक चलने वाली इस पहल के तहत वानिकी प्रशिक्षण संस्थानों को अत्याधुनिक बनाने की भी योजना है, ताकि भारत जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न नई चुनौतियों के लिए अपने वन बल को तैयार रख सके।