छांगशान द्वीपसमूह को यूनेस्को विश्व विरासत दर्जा, चीन के प्रवासी पक्षी अभयारण्य की सीमा विस्तारित
सारांश
मुख्य बातें
दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित यूनेस्को विश्व विरासत समिति के 48वें सत्र में 28 जुलाई 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया — चीन के पीले सागर और पोहाई सागर तट पर स्थित प्रवासी पक्षी अभयारण्यों की सीमा के विस्तार को मंजूरी दी गई, जिसके फलस्वरूप छांगशान द्वीपसमूह को आधिकारिक रूप से यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित कर लिया गया। चीनी राष्ट्रीय वन एवं घासभूमि प्रशासन ने इस निर्णय की पुष्टि की है।
छांगशान द्वीपसमूह: भौगोलिक महत्व
छांगशान द्वीपसमूह पूर्वोत्तर चीन के ल्याओनिंग प्रांत के ताल्येन शहर में स्थित है। यह द्वीपसमूह पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच विस्तृत प्रवासी मार्ग पर स्थित एकमात्र समुद्री गलियारा है। पोहाई सागर पार करने वाले करोड़ों प्रवासी पक्षियों के लिए यह स्थल ऊर्जा संचय का एक अपरिहार्य पड़ाव है।
नए विरासत क्षेत्र का कुल दायरा 4,900 हेक्टेयर से अधिक है। जैव विविधता की दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत समृद्ध है और यहाँ अब तक 140 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं।
विरासत विस्तार की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि वर्ष 2024 में भी इस विरासत स्थल का विस्तार किया गया था। वर्तमान विस्तार उसी क्रम में एक और महत्वपूर्ण कदम है, जिससे प्रवासी पक्षी अभयारण्यों की पूरी श्रृंखला और अधिक सुदृढ़ एवं एकीकृत हो गई है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिबद्धता बढ़ रही है।
प्रवासी पक्षियों के संरक्षण के लिए इस प्रकार के अभयारण्यों की सीमा का विस्तार न केवल पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पूर्वी एशियाई देशों के बीच पर्यावरण सहयोग का भी प्रतीक है।
पारिस्थितिक महत्व
छांगशान द्वीपसमूह का समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र जैविक संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है। यहाँ दर्ज 140 से अधिक पक्षी प्रजातियों में कई संकटग्रस्त और दुर्लभ प्रजातियाँ भी शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र को विश्व विरासत दर्जा मिलने से इसके संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय कानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी।
आगे की राह
यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल होने के बाद छांगशान द्वीपसमूह के प्रबंधन और संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप योजनाएँ तैयार करना अनिवार्य होगा। आलोचकों का कहना है कि विरासत दर्जे के साथ-साथ प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है, ताकि इस अनूठे पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक सुरक्षा मिल सके।