'चाइना स्क्वीज सिद्धांत' राजनीति से प्रेरित भ्रम है, आर्थिक डेटा से नहीं: कोलंबिया विश्वविद्यालय के इतिहासकार
सारांश
मुख्य बातें
कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर एडम टूज ने तथाकथित 'चाइना स्क्वीज सिद्धांत' को एक 'पूरी तरह से धोखा' करार दिया है। उनके अनुसार, यह सिद्धांत किसी ठोस आर्थिक डेटा विश्लेषण पर नहीं, बल्कि विशुद्ध राजनीतिक विचारों पर आधारित है। यह बहस ऐसे समय में उठी है जब कुछ पश्चिमी मीडिया संस्थानों और थिंक टैंकों ने यह दावा किया है कि चीन का औद्योगिक निर्यात वैश्विक बाज़ार में विकासशील देशों की जगह सिकोड़ रहा है।
सिद्धांत क्या है और इसे कैसे प्रचारित किया गया
कुछ पश्चिमी थिंक टैंकों और मीडिया संस्थानों ने हाल के वर्षों में यह तर्क प्रसारित किया है कि चीन का बढ़ता औद्योगिक निर्यात वैश्विक बाज़ार में अन्य देशों — विशेषकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं — के लिए जगह कम कर रहा है। इस कथित 'स्क्वीज' को अमेरिका के औद्योगिक पतन, यूरोप की आर्थिक मंदी और विकासशील देशों की औद्योगीकरण बाधाओं से जोड़कर पेश किया गया।
प्रोफेसर टूज के विश्लेषण के अनुसार, इस तरह के प्रचार अभियानों की एक निश्चित रणनीति होती है: पहले थिंक टैंक अवधारणाएँ गढ़ते हैं और रिपोर्टें जारी करते हैं, फिर मीडिया उन्हें व्यापक रूप से फैलाता है, और अंत में राजनेता उन्हें अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करते हैं।
विशेषज्ञ का तर्क: डेटा नहीं, राजनीति
प्रोफेसर एडम टूज ने अपने लेख में स्पष्ट किया कि पिछले एक दशक में पश्चिम में 'चीन संकट' का जो प्रचार हुआ है, वह मूलतः हर समस्या के लिए चीन को दोषी ठहराने का एक सुनियोजित प्रयास है।
उनके अनुसार, अमेरिका के औद्योगीकरण में गिरावट के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया जाता है, यूरोप की औद्योगिक रुकावट के लिए चीन को दोषी बताया जाता है, और विकासशील देशों की प्रगति में आने वाली बाधाओं के लिए भी चीन को कटघरे में खड़ा किया जाता है।
दुष्प्रचार या वैध चिंता
प्रोफेसर टूज ने यह भी कहा कि यह दावा कि 'चीन अन्य देशों को औद्योगीकरण के अवसर से वंचित करता है', एक सुनियोजित दुष्प्रचार अभियान है। उनके अनुसार इसका उद्देश्य वैश्विक व्यापार को 'सामान्य' बनाना नहीं, बल्कि चीन को 'रोगग्रस्त' देश के रूप में प्रस्तुत करना है — जो कि एक 'तथ्य-विपरीत विश्वदृष्टि' है।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी पश्चिमी विद्वान ने चीन-विरोधी आर्थिक आख्यानों पर सवाल उठाए हों, लेकिन कोलंबिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से आई यह आलोचना इस बहस को नया आयाम देती है।
आगे क्या
यह बहस वैश्विक व्यापार नीति और विकासशील देशों की औद्योगीकरण रणनीतियों के लिए महत्वपूर्ण है। आलोचकों का कहना है कि बिना ठोस आर्थिक प्रमाण के इस तरह के सिद्धांतों को नीति-निर्माण का आधार बनाना दीर्घकालिक रूप से वैश्विक व्यापार सहयोग को नुकसान पहुँचा सकता है। विशेषज्ञों की नज़र अब इस पर है कि पश्चिमी थिंक टैंक और नीति-निर्माता इस आलोचना पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।