वैश्विक संघर्षों में हर 14 मिनट पर एक नागरिक की मौत, यूएन सुरक्षा परिषद में उठी चिंता

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वैश्विक संघर्षों में हर 14 मिनट पर एक नागरिक की मौत, यूएन सुरक्षा परिषद में उठी चिंता

सारांश

यूएन सुरक्षा परिषद में पेश आँकड़े बताते हैं कि पिछले साल हर 14 मिनट में एक नागरिक की जान गई — और असली संख्या इससे भी अधिक हो सकती है। तीन साल में 1,000 से ज़्यादा सहायताकर्मियों की मौत और जवाबदेही की अनुपस्थिति इस संकट की गहराई को उजागर करती है।

मुख्य बातें

पिछले वर्ष वैश्विक सशस्त्र संघर्षों में प्रत्येक 14 मिनट पर एक आम नागरिक की मौत हुई — ओसीएचए निदेशक एडेम वोसोरनू ने यूएन सुरक्षा परिषद में यह आँकड़ा पेश किया।
अधिकारियों के अनुसार, वास्तविक नुकसान इन आँकड़ों से भी अधिक है — कांगो , सूडान और यूक्रेन का विशेष उल्लेख किया गया।
पिछले तीन वर्षों में 1,000 से अधिक मानवीय सहायताकर्मी मारे जा चुके हैं।
यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है; अस्पताल, स्कूल और मातृत्व वार्ड तक नष्ट हो रहे हैं।
इंटर-एजेंसी स्टैंडिंग कमेटी ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के बढ़ते उल्लंघन और जवाबदेही की कमी पर गहरी चिंता जताई।

संयुक्त राष्ट्र मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओसीएचए) की संचालन और वकालत निदेशक एडेम वोसोरनू ने 21 मई को यूएन सुरक्षा परिषद में नागरिक सुरक्षा पर आयोजित खुली बहस के दौरान खुलासा किया कि पिछले वर्ष दुनियाभर के सशस्त्र संघर्षों में प्रत्येक 14 मिनट में एक आम नागरिक की जान गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आँकड़ा भी वास्तविक नुकसान से कम है।

मुख्य घटनाक्रम

वोसोरनू ने सुरक्षा परिषद को संबोधित करते हुए कहा, 'हमें पता है कि असली नुकसान इससे कहीं ज़्यादा है, चाहे वह डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो हो, सूडान, यूक्रेन या फिर अन्य जगह।' इसी बैठक में इंटर-एजेंसी स्टैंडिंग कमेटी के प्रमुखों ने भी एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि दुनियाभर के संघर्षों में अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और मानवाधिकार कानून का खुला उल्लंघन लगातार बढ़ रहा है।

आम नागरिकों पर असर

अधिकारियों के अनुसार, हर संघर्ष में बड़ी संख्या में आम लोग — जिनमें बच्चे भी शामिल हैं — मारे जा रहे हैं, घायल हो रहे हैं और अपने घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। यौन हिंसा को युद्ध के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसका सबसे अधिक असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ रहा है।

घर, स्कूल, पूजा स्थल, अस्पताल और यहाँ तक कि मातृत्व वार्ड भी नष्ट या क्षतिग्रस्त किए जा रहे हैं। पानी की व्यवस्था, परिवहन नेटवर्क, बाज़ार और खाद्य उत्पादन जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी प्रभावित हो रही हैं।

भूख और मानवीय संकट

संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों ने चेतावनी दी कि युद्धों के कारण भूख और अकाल जैसी स्थितियाँ फैल रही हैं, जो कई बार घेराबंदी और जानबूझकर भोजन रोकने की रणनीतियों से जुड़ी होती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब कई संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में मानवीय सहायता की पहुँच पहले से ही बाधित है।

सहायताकर्मियों पर खतरा

अधिकारियों ने यह भी बताया कि मानवीय सहायता कार्य करने वाले लोग भी इन संघर्षों की चपेट में आ रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में 1,000 से अधिक सहायताकर्मियों की मौत हो चुकी है — यह आँकड़ा खुद में मानवीय कार्य की बढ़ती असुरक्षा को दर्शाता है।

जवाबदेही की माँग

अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि युद्धों के भी नियम होते हैं, जो सभी पक्षों पर समान रूप से लागू होते हैं। उनके अनुसार, समस्या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके निरंतर पालन की कमी, जवाबदेही का अभाव और गंभीर अपराधों के बावजूद कार्रवाई न होना है। गौरतलब है कि सुरक्षा परिषद में नागरिक सुरक्षा पर यह बहस ऐसे समय में हुई जब एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष जारी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 से अधिक सहायताकर्मियों की मौत यह बताती है कि संघर्षों में तटस्थ मानवीय स्थान भी सुरक्षित नहीं रहा। अधिकारियों ने खुद स्वीकार किया कि समस्या कानूनों की नहीं, जवाबदेही की है — फिर भी सुरक्षा परिषद में वीटो की राजनीति इस जवाबदेही को बार-बार अवरुद्ध करती है। जब तक उल्लंघन करने वाले पक्षों पर ठोस परिणाम नहीं होते, ये बहसें नैतिक दायित्व से अधिक कुछ नहीं बन पातीं।
RashtraPress
21 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूएन के अनुसार वैश्विक संघर्षों में नागरिकों की मौत की दर क्या है?
ओसीएचए की निदेशक एडेम वोसोरनू के अनुसार, पिछले वर्ष दुनियाभर के सशस्त्र संघर्षों में हर 14 मिनट पर एक आम नागरिक की मौत हुई। अधिकारियों ने यह भी कहा कि वास्तविक संख्या इससे भी अधिक हो सकती है।
यूएन सुरक्षा परिषद में नागरिक सुरक्षा पर बहस कब और क्यों हुई?
21 मई को यूएन सुरक्षा परिषद में नागरिकों की सुरक्षा पर खुली बहस आयोजित की गई, जिसमें ओसीएचए और इंटर-एजेंसी स्टैंडिंग कमेटी के अधिकारियों ने वैश्विक संघर्षों में बढ़ते उल्लंघनों पर चिंता जताई। यह बहस ऐसे समय में हुई जब कांगो, सूडान और यूक्रेन समेत कई क्षेत्रों में संघर्ष जारी है।
पिछले तीन वर्षों में कितने मानवीय सहायताकर्मी मारे गए हैं?
संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में 1,000 से अधिक मानवीय सहायताकर्मियों की मौत हो चुकी है। यह आँकड़ा संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में मानवीय कार्य की बढ़ती असुरक्षा को दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन पर यूएन ने क्या कहा?
इंटर-एजेंसी स्टैंडिंग कमेटी के प्रमुखों ने कहा कि दुनियाभर के संघर्षों में अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और मानवाधिकार कानून का खुला उल्लंघन बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समस्या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके पालन और जवाबदेही की कमी है।
युद्धग्रस्त क्षेत्रों में आम नागरिकों पर क्या-क्या असर पड़ रहा है?
अधिकारियों के अनुसार, नागरिक मारे जाने और घायल होने के अलावा विस्थापन का शिकार हो रहे हैं। अस्पताल, स्कूल, पूजा स्थल और मातृत्व वार्ड तक नष्ट हो रहे हैं; यौन हिंसा को युद्ध के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है; और भूख व अकाल जैसी स्थितियाँ फैल रही हैं।
राष्ट्र प्रेस
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