पश्चिम बंगाल मदरसों में 'वंदे मातरम' अनिवार्य: हुमायूं कबीर बोले — मुख्यमंत्री सबके हैं, संविधान की रक्षा होनी चाहिए
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल के मदरसों में 'वंदे मातरम' गाना अनिवार्य किए जाने के सरकारी आदेश के विरोध में अखिल भारतीय जमीयत उलेमा-ए-पश्चिम बंगाल (एजेयूपी) के अध्यक्ष हुमायूं कबीर ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। 21 मई 2026 को कोलकाता में कबीर ने कहा कि संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है और सरकार को इस अधिकार का सम्मान करना चाहिए।
हुमायूं कबीर की मुख्य आपत्तियाँ
हुमायूं कबीर ने कहा कि यदि सरकार मुसलमानों पर हिंदू धर्म की सांस्कृतिक परंपराओं को थोपती है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मदरसे किसी के विरुद्ध नहीं हैं — वे कुरान की शिक्षा के केंद्र हैं और पवित्र कुरान की हिफाज़त करना हर मुसलमान का अधिकार है।
कबीर ने कहा, 'संविधान की शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे सबके मुख्यमंत्री हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि वे इस निर्णय के विरोध में मुसलमानों को एकजुट करेंगे और यदि ज़रूरत पड़ी तो सड़क पर उतरेंगे।
सरकारी आदेश का विवरण
पश्चिम बंगाल सरकार ने 19 मई 2026 को एक आदेश जारी कर राज्य के सभी मदरसों में 'वंदे मातरम' गाना अनिवार्य कर दिया। यह आदेश सरकारी मॉडल मदरसों, सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों और बिना सहायता प्राप्त मदरसों — तीनों पर तत्काल प्रभाव से लागू है। नए नियम के तहत प्रतिदिन कक्षाएँ शुरू होने से पहले सुबह की प्रार्थना सभा में 'वंदे मातरम' गाना अनिवार्य होगा।
कबीर का मुर्शिदाबाद और कुर्बानी प्रसंग
कबीर ने कहा कि जब उन्होंने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने की बात की थी, उसी समय बहरामपुर में राम मंदिर निर्माण की माँग उठाई गई — यह उल्लेख उन्होंने सांप्रदायिक समानता के संदर्भ में किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बंगाल पुलिस कुर्बानी के लिए गाय खरीदने वालों को घर-घर जाकर चेतावनी दे रही है। कबीर ने मुख्यमंत्री से अपील की कि पुलिस को ऐसे कदम उठाने से रोका जाए।
विरोध की चेतावनी
कबीर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि उनके समुदाय पर अत्याचार हुआ तो वे एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा, 'मैं संविधान मानकर चलूँगा; मुख्यमंत्री को भी संविधान के मुताबिक चलना चाहिए।' उन्होंने मुख्यमंत्री के खिलाफ आवाज़ उठाने और सभी मुसलमानों को एकजुट कर सड़क पर विरोध करने की चेतावनी दी।
आगे क्या होगा
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब पश्चिम बंगाल में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर राजनीतिक तनाव पहले से बढ़ा हुआ है। एजेयूपी के विरोध के बाद यह देखना होगा कि राज्य सरकार अपने 19 मई के आदेश पर कायम रहती है या कोई संशोधन करती है। संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल को लेकर कानूनी चुनौती की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।